भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 402

सूत्र-६७ 357 शास्त्रच्छन्दनिर्णयोनाम सप्तषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६७ ॥ अपराजित उवाच - छन्दश्च क्रमशः प्रोक्तं शाश्वतं शास्त्रकौशलम्। तदनुक्रमयुक्तीश्च कथयस्व प्रसादतः ॥ १ ॥ अपराजित बोले कि हे प्रभु! कृपा करके शाश्वत शास्त्र कौशल में बताए गए सभी छन्दों को क्रमवार बताएँ और उनकी अनुक्रम से युक्ति भी कहें। विश्वकर्मावाच - एकाक्षरा क्षरे भिन्नं व्याप्तं चैतच्चराचरम्। त्रैलोक्यस्योत्पत्तिकरं छन्दो मेरुसृष्ट्युद्भवम् ॥ २ ॥ विश्वकर्मा बोले कि एक तो अक्षर और दूसरे क्षर इन भिन्न-भिन्नौं से चराचर व्याप्त है। इनसे तीनों लोकों की उत्पत्ति करने वाले सभी छन्द मेरुसृष्टि से उद्भूत हैं। तथा शम्भुश्च-मेरुश्च-चिन्तामणि-वृत्तार्णवः। चतुर्विधं छन्दशास्त्रमेकाद्याक्षरतः क्रमात् ॥ ३ ॥ अस्तु, एक छन्दशास्त्र से, एकाक्षर से क्रमानुसार चार प्रकार के छन्द उत्पन्न हुए यथा, १. शम्भु, २. मेरु, ३. चिन्तामणि और ४. वृत्तार्णव। एकाक्षरोद्भवः शम्भुस्तथामेरुश्च युग्मतः। चिन्तामणिस्त्रिभिश्चैव वेदैर्वृत्तार्णवः स्मृतः ॥ ४ ॥ एकाक्षर से उत्पन्न मेरु तथा शम्भु का युग्म तथा चिन्तामणि तीन से और वृत्तार्णव चार अक्षर से बने माने जाते हैं। छन्दश्चतुर्विधमाह - छन्दांश्चतुर्विधाः प्रोक्ता वेदान्ताश्चैकतः पृथक्। गुरुलघूद्भवा मात्रा प्लुतह्रस्वादि सञ्ज्ञकाः ॥ ५ ॥ छन्द भी चार प्रकार के कहे गए हैं। एक से चार तक अलग-अलग इनकी गुरु [ ऽ ] और लघु मात्रा [ । ] को प्लुत और ह्रस्व संज्ञा दी गई है। सानुस्वारा विसर्गान्ता वेदान्तोद्भवकल्पना। भिन्नाभिन्नास्तथानेके भेदाश्छन्दसमुद्भवाः ॥ ६ ॥ अनुस्वार से विसर्गान्त तक चार प्रकार की उत्पत्ति की कल्पना की गई है। इनको भिन्न-भिन्न स्थान पर रखते जाने से कई भेदों की उत्पत्ति होती है।