अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६७ ३०१ त्रयोदशा कर्णराज्यं वसन्ततिलकेन्द्रतः । मालिनी पञ्चदशतः षोडशतिलगर्जितम् ॥ २७ ॥ तेरह अक्षर वाले पद से कर्णराज्य वृत्त बनता है। चौदह अक्षरों के पद से बसन्ततिलक वृत्त बनता है। पन्द्रह अक्षर वाले पद से मालिनी वृत्त बनता है। सोलह अक्षरों वाले पद से तिलगर्जत वृत्त बनता है। अद्भुतं सप्तदशभिर्गिरिरष्टादशाक्षरैः । शार्दूलादि दिगङ्कैश्च विंशत्याश्वातिवृत्तकम् ॥ २८ ॥ इसी प्रकार सत्रह अक्षरों वाले पद से अद्भुत नामक वृत्त बनता है और अठारह अक्षर वाले पद से गिरिकर्णिका वृत बनता है। इसी में दिशा के अङ्क या उन्नीस अक्षरों वाले पद से शार्दूलविक्रीडित वृत्त और बीस अक्षरों वाले पद से अतिवृत्तक बनता है। स्रग्धरा चैकविंशत्या मदना द्वाविंशतिभिः । त्रयोविंशत्या मदन-लता मधुकरोऽर्कयोः ॥ २९ ॥ इक्कीस अक्षरों वाले पद से स्रग्धरा वृत्त बनता है और बाईस अक्षरों वाले पद से मदना वृत्त बनता है। तेईस अक्षरों वाले पद से मदन-लता वृत्त बनता है। चौबीस अक्षर वाले पद से मधुकर वृत्त बनता है। निबन्धः पञ्चविंशत्या गोविन्दश्च षड्विंशत्या । सप्तविंशतिभिर्मुक्ताफलेत्थं वृत्तकानि च ॥ ३० ॥ पच्चीस अक्षरों के पद से निबन्ध वृत्त बनता है। छब्बीस अक्षरों के पद से गोविन्द वृत्त बनता है। इसी तरह से सत्ताईस अक्षरों वाले पद से मुक्ताफल वृत्त बनता है— इतने सब वृत्त कहे गए हैं। इत्यमनन्तर गणश्छन्दमाह — मयौ रसौ तजौ भो नो गणाश्चाष्टौ लघुर्गुरुः । छन्दस्सुदशकं चेति प्रोक्तं वै शास्त्रकौशलैः ॥ ३१ ॥ अब मैं गण और छन्द के बारे में कहता हूँ। गण आठ होते है उनमें लघु और गुरु दो भेद हैं। (म-य-र-स-त-ज-भ-न ये आठगण हैं। यथा— मगण, यगण, रगण, सगण, तगण, जगण, भगण और नगण) ।¹ इसी तरह छन्द दस कह गए हैं, शास्त्र के कुशल जानकारों द्वारा ऐसा कहा गया है।
- छन्दोमञ्जर्यामप्येवमुक्तम्— मस्त्रिगुरुस्त्रिलघुश्च नकारो भादिगुरुः भादिगुरुः पुनरादिलघुर्यः । जो गुरुमध्यगतो रलमध्यः सोऽन्तगुरुः कथितोऽन्तलघुस्तः ॥ गुरेरेको गकारस्तु लकारो लघुरेककः । क्रमेण चैषां रेखाभिः संस्थानं दर्श्यते यथा ॥ गण पहचानने का सरल सूत्र है 'यमाताराजभानसलगा' इस सूत्र में