अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें362 अपराजितपृच्छा समविषमवृत्तानि — समारक्षरपदं वृत्तं यत्तच्छुद्धसमं भवेत्। असमाक्षरपादं च भवेद् विषमसंज्ञकम् ॥ 32 ॥ समान अक्षरों वाले चारों पाद के जो वृत्त हैं, उन्हें शुद्ध सम वृत्त कहते हैं। असमानक्षरों वाले पद के वृत्तों को विषम वृत्त नाम दिया गया है। समपादं तु पूर्वार्द्धमुत्तरार्द्धं च वृद्धिगम्। समविषमं तु तन्नाम अन्तपादोऽधिको भवेत् ॥ 33 ॥ पूर्वार्द्धे च भवेद् वृद्धिः समवच्चोत्तरं समम्। पूर्ववच्चान्यविषमं विषमविषमं च तत् ॥ 34 ॥ आदिस्तृतीया विषमां द्वितीयो वा चतुर्थकः। एकवर्णगतावेवं सम्पुटं च दिशन्ति तत् ॥ 35 ॥ यदि पहला पाद तो सम अक्षरों वाला हो और उसका उत्तरार्ध पाद अधिक अक्षरों वाला हो तो उसे 'समविषम वृत्त नाम दिया गया है, जिसका अन्त पाद अधिक होता है। परन्तु, जिस वृत्त के पूर्वार्ध में अक्षर अधिक हो और उत्तरार्ध में समान अक्षर हो तो उसे समवच्चोत्तर समवृत्त कहते है। जिस वृत्त में पहला पद भी विषम हो और उत्तरपद भी विषम हो, दूसरा पद विषम हो या चौथा पद विषम हो— ये एक वर्णगत इस तरह होने पर सम्पुट और दिशन्ति कहलाते हैं। अष्टाविंशत्यक्षरतः सप्तत्रिंशत्तथान्ततः। भवत्यक्षरवृद्ध्या तद् गद्यानां दशकं तथा ॥ 36 ॥ अट्ठाईस (28) अक्षरों से लेकर सैंतीस (37) अक्षरों के अन्त तक अक्षर वृद्धि होते-होते उस गद्य को (पद्य को ?) दशक नाम दिया गया है। आर्यावृत्तमाह — यदा वृत्तेषु पूर्वार्द्धमुत्तरार्द्धसमं न हि। ह्रस्व-लघु (ल या ।), दीर्घ अथवा गुरु (ग या ऽ)। इससे इनको बनाना आसान हो जाता है। उदाहरण— यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण, (।ऽ।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), सगण (।।ऽ)। इन्हीं गणों को पहचानने का अन्य सूत्र इस प्रकार है— आदि मध्या वसानेषु यरता यान्ति लाघवम्। भजसा गौरवं यान्ति मनो तु गुरु लाघवम् ॥ अर्थात्— यगण (। ऽऽ) में आदि, रगण (ऽ।ऽ) रगण में मध्य, तगण में (ऽऽ।) में अन्त में लघु रहता है। भगण (ऽ।।) जगण में (।ऽ।), सगण में (।।ऽ) क्रमशः गुरु रहता है तथा मगण (ऽऽऽ) और नगण (।।।) पूरे गुरु और पूरे लघु युक्त होते हैं। छन्दशास्त्रों में यह वर्णन विशिष्ट रूप से मिलता है। विशेष जानकारी के लिए पुराणों में नारदपुराण, अग्नि और गरुडपुराण में छन्दशास्त्र द्रष्टव्य है।