अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६८ 363 आर्याभिधानकं तच्च भिन्नं वृत्तं च पादतः ॥ ३७ ॥ जब वृत्तों का पूर्वार्ध उत्तरार्ध के समान नहीं होता, तो उसे 'आर्या' नामक वृत्त कहते हैं क्योंकि उसके पाद भिन्न-भिन्न अक्षरों में होते हैं। कलिकाद्ये च नवमं मुक्ताफलकमन्ततः । त्यक्त्वा समानाक्षराणि शेषवृत्तानि सन्ति च ॥ ३८ ॥ एतानि वर्णवृत्तानि मात्रावृत्तं तु शेषकमू। नवें कलिकादि से लेकर मुक्ताफल तक के छोड़कर शेष वृत्त समान अक्षरों के होते हैं। इतने वर्णिक वृत्त हैं, मात्रिक वृत्त शेष होते हैं। द्विमात्रको गुरु ज्ञेय एकमात्रो लघुर्भवेत् ॥ ३९ ॥ सानुस्वारो विसर्गान्तो दीर्घो युक्तः परश्च यः । गुरुर्वा तु पदान्तस्थो द्विमात्रश्च लघुस्तथा ॥ ४० ॥ दो मात्रा को गुरु (ऽ) एक मात्रा को लघु ( । ) कहते हैं। अनुस्वार सहित विसर्ग के अन्त तक के स्वर दीर्घ (ऽ) कहे जाते हैं। पदों के अन्त में दो मात्रा गुरु या लघु होते हैं। गुरोर्लघुगता मात्रा सूर्यभेदसमुद्भवा₁₂ । एवं छन्दोगणाः प्रोक्ताः विज्ञेयाः शास्त्रकोविदैः ॥ ४१ ॥ गुरु और लघु मात्रा के बारह प्रकार होते हैं। इस तरह छन्दों और गणों को शास्त्रकोविद् पण्डितों ने जाना और कहा है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां शास्त्रच्छन्दनिर्णयाधिकारो नाम सप्तषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६७ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में शास्त्रच्छन्दनिर्णयाधिकार नामक सड़सठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६७ ॥ गृहप्रासादसम्भूतच्छन्दभेदो नामाष्टषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६८ ॥ अपराजित उवाच — छन्दश्च कथितं देव सर्वशास्त्राद्यसम्भवम्। अन्यत्र छन्दभेदांश्च कथयस्व परमेश्वर ॥ १ ॥ अपराजित बोले कि हे देव ! आपने सर्वशास्त्रों के आदि में सम्भव होने वाले छन्दों के बारे में अब तक कहा। अब हे परमेश्वर ! अन्यत्र छन्दभेदों को भी कहिए।