भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 535 में से

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पृष्ठ 409

364 अपराजितपृच्छा गृहप्रासादसम्भृताश्छन्दाः षटसञ्ज्ञकाः स्मृताः। कथयस्व प्रसादेन तेषां निर्णयमादितः॥ २॥ मेरुश्च खण्डमेरुश्च पताका सूचिका तथा। उद्दिष्टं नष्टमित्युक्ताश्छन्दाः षड्बुधसम्मिताः॥ ३॥ गृह-प्रासाद के बनने के छह प्रकार की संज्ञा के छन्द कहे गए हैं। अस्तु, कृपा करके आप उनका निर्णय आरम्भ से ही कहिए। वे छन्द क्रमशः 1. मेरु, 2. खण्डमेरु, 3. पताका, 4. सूचिका 5. उद्दिष्ट तथा 6. नष्ट छन्द— छह प्रकार के बुद्धिमानों ने स्वीकृत किए हैं। एषां प्रस्तारसन्दोहं मम भ्रान्तिहरं परम्। त्वत्प्रसादेन देवेश छन्दशास्त्रसमुद्भवम्॥ ४॥ हे देवेश! इस सब का प्रस्तार-सन्दोह (प्रस्तार समुच्चयक्रम) बताकर मेरी परम् भ्रान्ति का निवारण आप छन्दशास्त्र का उद्भव बताकर कृपापूर्वक कीजिए। विश्वकर्मोवाच — प्रोक्ता भेदाश्छन्दसां षट् रिपुरान्तवेदोद्भवाः( ?)। भेदे शून्यं त्रयशून्यं वेदाशू ^1उपाङ्गषडध्वः॥ ५॥ खशून्या भवेद्मुक्ता सङ्ख्यामिति छन्दोद्भवा ?। प्रयुक्तशास्त्रछन्देषु भेदाश्च षड्विधाः क्रमात्॥ ६॥ विश्वकर्मा बोले कि छन्दों के छह भेद कहे गए हैं। (आगे का अनुमानित अर्थ है कि षड्रिपु— काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य है, भेद से शून्य, तीन से शून्य, वेद के उपरान्त उपाङ्गों और षडध्व हैं— कलाध्व, तत्त्वाध्व, भुवनाध्व, वर्णाध्व, पदाध्व तथा मन्त्राध्व; वैसे ही शून्य या आकाश से उत्पन्न स्वर-संख्या से निष्पन्न छन्दों के) शास्त्र में प्रयुक्त छन्दों के क्रमशः छह प्रकार के भेद होते हैं। लक्षणालङ्कारयुता भिन्ना अर्थार्थतस्तथा। भिन्नास्तथैकाक्षरत इत्थं छन्दसमुद्भवः॥ ७॥ लक्षण अलङ्कारों से युक्त और अर्थ भिन्न-भिन्न अर्थों युक्त— इस तरह एक अक्षर से लेकर भिन्न तरह-तरह के छन्द निर्मित करते हैं। श्रुतिस्मृतिपुराणानि मन्त्रमुद्राक्षराणि च। मेरुच्छन्दसमुत्पन्नमाब्रह्मभुवनान्तकम्॥ ८॥

  1. उपाङ्गवध्रकशवः ? इति प्रकाशित पाठः।
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