अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
364 अपराजितपृच्छा गृहप्रासादसम्भृताश्छन्दाः षटसञ्ज्ञकाः स्मृताः। कथयस्व प्रसादेन तेषां निर्णयमादितः॥ २॥ मेरुश्च खण्डमेरुश्च पताका सूचिका तथा। उद्दिष्टं नष्टमित्युक्ताश्छन्दाः षड्बुधसम्मिताः॥ ३॥ गृह-प्रासाद के बनने के छह प्रकार की संज्ञा के छन्द कहे गए हैं। अस्तु, कृपा करके आप उनका निर्णय आरम्भ से ही कहिए। वे छन्द क्रमशः 1. मेरु, 2. खण्डमेरु, 3. पताका, 4. सूचिका 5. उद्दिष्ट तथा 6. नष्ट छन्द— छह प्रकार के बुद्धिमानों ने स्वीकृत किए हैं। एषां प्रस्तारसन्दोहं मम भ्रान्तिहरं परम्। त्वत्प्रसादेन देवेश छन्दशास्त्रसमुद्भवम्॥ ४॥ हे देवेश! इस सब का प्रस्तार-सन्दोह (प्रस्तार समुच्चयक्रम) बताकर मेरी परम् भ्रान्ति का निवारण आप छन्दशास्त्र का उद्भव बताकर कृपापूर्वक कीजिए। विश्वकर्मोवाच — प्रोक्ता भेदाश्छन्दसां षट् रिपुरान्तवेदोद्भवाः( ?)। भेदे शून्यं त्रयशून्यं वेदाशू ^1उपाङ्गषडध्वः॥ ५॥ खशून्या भवेद्मुक्ता सङ्ख्यामिति छन्दोद्भवा ?। प्रयुक्तशास्त्रछन्देषु भेदाश्च षड्विधाः क्रमात्॥ ६॥ विश्वकर्मा बोले कि छन्दों के छह भेद कहे गए हैं। (आगे का अनुमानित अर्थ है कि षड्रिपु— काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य है, भेद से शून्य, तीन से शून्य, वेद के उपरान्त उपाङ्गों और षडध्व हैं— कलाध्व, तत्त्वाध्व, भुवनाध्व, वर्णाध्व, पदाध्व तथा मन्त्राध्व; वैसे ही शून्य या आकाश से उत्पन्न स्वर-संख्या से निष्पन्न छन्दों के) शास्त्र में प्रयुक्त छन्दों के क्रमशः छह प्रकार के भेद होते हैं। लक्षणालङ्कारयुता भिन्ना अर्थार्थतस्तथा। भिन्नास्तथैकाक्षरत इत्थं छन्दसमुद्भवः॥ ७॥ लक्षण अलङ्कारों से युक्त और अर्थ भिन्न-भिन्न अर्थों युक्त— इस तरह एक अक्षर से लेकर भिन्न तरह-तरह के छन्द निर्मित करते हैं। श्रुतिस्मृतिपुराणानि मन्त्रमुद्राक्षराणि च। मेरुच्छन्दसमुत्पन्नमाब्रह्मभुवनान्तकम्॥ ८॥
- उपाङ्गवध्रकशवः ? इति प्रकाशित पाठः।
सूत्र-६८ 365 श्रुतियों में, स्मृतियों में, पुराणों में, मन्त्रों में व मुद्राओं में मेरुछन्द से उत्पन्न हुए छन्द पूरे ब्रह्म और भुवनों अर्थात् चौदह भुवनों के अन्त तक भी व्याप्त है। माड-मौड-शुद्ध-शृङ्ग-तुङ्गार-सिंहकादिकाः । प्रोक्ता च राजवेश्मादौ मेरुच्छन्दसमुद्भवाः ॥ 9 ॥ उनके विविध नाम हैं— माड, मौड़, शुद्ध, शृङ्ग, तुङ्गार, सिंह आदि। अब मेरु छन्द से बनने वाले राजवेश्म अर्थात् राजभवनों, महल व प्रासादों के बारे में सबसे पहले कहता हूँ। आनकणाभि सङ्घाटा गृहमालाकूटपञ्जरम्। सम्भूता मेरुच्छन्दाच्च गृहा हर्म्यादिसञ्ज्ञकाः ॥ 10 ॥ आनक या सेना के काम आने वाले दुन्दुभि नगाड़े, घण्टादिकों की जोड़ी तथा सैनिकों के छावनी- गृहमाला के कूट, किले पञ्जर आदि और हर्म्यादि नाम के भवन सभी मेरुछन्द से ही बने हैं। तृणपट्टवाजिपूर्णखण्डपाण्डव एव च। प्रयुक्ता मेरुच्छन्दादौ वास्तुविद्भिरुदाहृताः ॥ 11 ॥ इसी तरह वास्तुविदों ने मेरुछन्द के प्रयोग से तृण, पट्ट, वाजि (बाण या अश्व), पूर्ण, खण्ड, पाण्डव आदि भेद भी बनाएँ।¹ लतिना नागरा भौमा द्राविडाश्च विराट्का। सावन्धारा विमानाख्या मेरुच्छन्दसमुद्भवाः ॥ 12 ॥ इन्ही की तरह लतिन, नागर, भौम, द्राविड़, विराट, सावन्धार, विमान के नाम की निर्मितियाँ भी मेरुछन्द से समुद्भूत है। स्तम्भगर्भतीर्यमाना खण्डा वेणुकलादिकम्। मेरुच्छन्दोद्भवा रेखाः प्रोक्ताश्च सुरवेश्मनाम् ॥ 13 ॥ स्तम्भ गर्भ से निकलने वाली खण्ड, वेणु-पर्व, कलादि भी मेरु छन्दोद्भव ही है जो रेखा देव मन्दिरों के शिखरों पर बनती है।
- वास्तुमण्डनम् में कहा गया है कि पट्टछन्द के अनुसार विविध भेदों वाली शालाएँ व अलिन्दादि होते हैं तथा इसके विपरीत तृणछन्द से सोलह अन्य भेद होते हैं। जिसमें उदयमान न्यून होता है उसकी संज्ञा पाण्डु हैं तथा इनमें वाजन विस्तृत होता है। इसी प्रकार जिसमें फलक के अंत का उच्छ्रेय चार हाथ तक हो, वह शेष छन्द होता है— पट्टच्छन्दे यथा भेदा शालाऽलिन्दादिका मताः। विपरीतास्तृणछन्दे षोडशैवं प्रकीर्तिताः॥ हीनोदयाः पाण्डुसञ्ज्ञा वाजिनस्तु बुयेऽधिकाम्। फलकान्ते चतुर्हस्ता शेष छन्देष्ववोच्छ्रयः॥ (वास्तुमण्डनम् 6, 6-7)
366 अपराजितपृच्छा तथैक-त्रि-पञ्च-सप्त-नवशाखसमुद्भवम्। प्रयुक्तं द्वारविधानं वास्तूपदेशका विदुः ॥ 14 ॥ प्रासादों के द्वार पर बनने वाली रेखाएँ एक, तीन, पाँच, सात, नौ शाखा तक बनती है, ऐसा विद्वान वास्तुशास्त्रोपदेशकों ने द्वार-विधान में प्रयुक्त किया है। अथ मण्डपानि — गूढो नृत्यश्चन्द्रालोको भद्रावलोकनादिकाः। चतुःषष्टिः⁶⁴ समाख्याता मण्डपा मेरुछन्दतः॥ 15 ॥ अब मण्डपों के बारे में कहता हूँ जो गूढ मण्डप, नृत्य, चन्द्रावलोकन, भद्रावलोकन आदि नामों से चौंसठ प्रकार के मेरुछन्द से बनने वाले कहे गए हैं। वितानानि — पद्मनाभिसभामार्गमन्दारभिन्नमिश्रकम्। षड्विधं च वितानं स्यान् मेरुच्छन्दादुदाहृतम्॥ 16 ॥ इसी तरह सभामण्डपों के वितान भी यथा— पद्म, नाभि, सभा-मार्ग, मन्दार, भिन्न, मिश्रक ये छह प्रकार के वितान मेरुछन्दानुसार बनते हैं। शाला नामानि — कर्णजा भ्रमजाश्चैव भद्रजा गर्भजास्तथा। मध्यजाः पार्श्वजाः ख्याताः शालाश्च मेरुछन्दतः॥ 17 ॥ कर्णजा, भ्रमजा, भद्रजा, गर्भजा, मध्यजा, पार्श्वजा नाम वाली शालाएँ भी मेरुछन्द से बनती हैं। पीठानि — वेदीबन्धं श्रीबन्धाख्यं पङ्कजं भद्रकं तथा। सुभद्रं तारकं पीठं मेरुच्छन्दोविनिर्गतम्॥ 18 ॥ इसी प्रकार वेदीबन्ध, श्रीबन्ध, पङ्कज, भद्रक, सुभद्र और तारक इन नामों की पीठ भी मेरुछन्द से ही निकली हुई है। विविध लिङ्गनामानि — सुरार्चितं चाद्यनादि स्वभु बाणं चतुर्थकम्। शक्त्याख्यं वर्धमानं च लिङ्गं मेरुविनिःसृतम्॥ 19 ॥ सुरार्चितलिङ्ग, आद्यनादिलिङ्ग, स्वभुलिङ्ग, बाणलिङ्ग, शक्त्यालिङ्ग और वर्धमानलिङ्ग नाम के लिङ्ग भी मेरुछन्द से बने हैं।
सूत्र-६८ ३६७ वेदाश्रादि पीठिकाः — वेदाश्रा वर्तुलाख्या त्रिकोणा तु षडंशका। वेदिका पद्मका चैव पीठिका मेरुच्छन्दतः ॥ २० ॥ चतुरस्र, वर्तुल, त्रिकोण, षट्कोण, वेदिका, पद्मका जैसी पीठिकाएँ भी मेरुछन्द से चली हुई हैं। अथार्चा — सीमा गर्भस्तथा द्वारं तलकोर्ध्वविभक्तिकम्। अर्चा च षड्विधा प्रोक्ता मेरुच्छन्दसमुद्भवा ॥ २१ ॥ सीमा, गर्भ, द्वार, तलक, ऊर्ध्व, विभक्तिक— ये अर्चा भी छह प्रकार की कही गई हैं जो मेरुछन्द से ही बनती हैं। नगरादीनां — नगरं च पुरं ग्रामः खेटः कूटश्च कर्वटः। एते च षड्विधा ज्ञेया मेरुच्छन्दविनिर्गताः ॥ २२ ॥ इसी प्रकार नगर, पुर, ग्राम, खेट, कूट, कर्व्वट— ये छहों भी मेरुछन्द से बने कहे गए हैं। जलस्रोतादीनां — वापीकूपतडागं च रथयन्त्रचक्रादिकम्। प्रयुक्तं मेरुच्छन्देषु वास्तुविद्भिरुदाहृतम् ॥ २३ ॥ वापी, कूप, तड़ाग, रथ, यन्त्र, चक्रादिक— ये भी सब छहों वास्तुविदों ने मेरुछन्द से ही बने कहे हैं। वेदीसिंहासनं छत्रं शय्याकवचमायुधम्। वास्तुवेदे समाख्यातं मेरुच्छन्दसमुद्भवम् ॥ २४ ॥ वेदी (बाजोट), सिंहासन, छत्र, शय्या, कवच, आयुध— इन छहों को भी वास्तुवेद में मेरुछन्द से बने कहा गया है। रथवीथ्यन्तरमार्गाश्च षट् पन्थान एव च। प्रयुक्ता वास्तुविद्भिश्च मेरुच्छन्दसमुद्भवाः ॥ २५ ॥ इति छन्दादिनिकाशसङ्ख्याधिकारः। रथवीथिका, अन्तरमार्ग और अन्य षट् पन्थान (भ्रमर, पुर, प्राकार, तोरण, अट्ट, अट्टालक व संबाध- ये षट्पद) आदि भी वास्तुविदों ने मेरुछन्द से बने कहा है।
368 अपराजितपृच्छा मेरुच्छन्दवर्णनं — पृथ्व्याकारो यथा छन्दो मेर्वाकारसमुद्भवः । षड्विधं मेरुच्छन्दश्च षडत्रिंशच्छन्दभेदकाः ३६ ॥ २६ ॥ पृथ्वी के आकार का जो छन्द है वह भी मेरु के आकार से ही बना है। इस तरह मेरुछन्द छह प्रकार का होता है जिसके भी छत्तीस भेद के छन्द होते हैं। भेदैस्तत्र त्र्यष्टशतैर्दशभिर्गुणितेस्ततः । चतुर्विंशत्सहस्त्राणि छन्दभेदाश्च सङ्ख्यया ॥ २७ ॥ इन भेदों से भी चौबीस सौ के दशगुणे अर्थात् चौबीस हजार (24000) छन्दों के भेदों की संख्या बन जाती है। इन्द्रोद्भवक्षमावृद्धी भूतकोणान्तमध्यमैः ? । इषु प्राणेषु भक्षन्ती प्रत्येकविषमेपदम् ? ॥ २८ ॥ इन्द्रोद्भव, क्षमावृद्धि, पञ्चकोण, अन्त और मध्यम पञ्चप्राणों (संभवतः 14 से आरम्भ कर एक की शुद्धि करते हुए ?) से भक्षण.. प्रत्येक विषम पदस्थ होने पर ? षड्भिर्नभशब्दैः¹ कोटिमेरुच्छन्दे तु सङ्ख्यया । तत्रोक्तमेवप्रमाणं सृष्टाऽम्भोजप्रकाशिना ॥ २९ ॥ नाभिकमल से उद्भूत सृष्टा ब्रह्माजी ने तीन सौ साठ कोटि (षड्भि₆र्नभ₀शब्दैः₃ कोटिमेरु ?) मेरुछन्द संख्या वाले ये सब प्रमाण सहित प्रकाशित किए हैं। मेरुर्मेरूपमः कार्यः शरावस्येव चाकृतिः । सृष्टिस्तदुद्भवा सूत्र पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ ३० ॥ मेरु को मेरु रूप में ही करना चाहिए। उसकी आकृति शराव (सकोरे) के समान होती है। सारी सृष्टि उसी मेरु से उत्पन्न हुई है और ऐसे प्रतीत होती है जैसे कि घड़े पर घड़ा रखा गया हो। षट् छन्दभेदाः — मेरुश्च खण्डमेरुश्च पताका सूचिका तथा । उद्दिष्टं नष्टमिति षट् छन्दांसीह प्रचक्षते ॥ ३१ ॥ परम्परा में 1. मेरु, 2. खण्डमेरु, 3. पताका, 4. सूचिका, 5. उद्दिष्ट और 6. नष्ट—ये छह छन्द कहे गए हैं।²
- 'षड्भिर्नभशब्दैः' इति प्रकाशित पाठः। यहाँ ब्रह्मा के किसी आद्यशास्त्र का वर्णन है। बृहत्संहिता के वास्तुविद्याध्याय में वराहमिहिर ने 'कमलभवान्मुनिपरम्परायातम्' कहकर इसकी ओर सङ्केत किया है।
- नारदपुराण के पूर्वभाग के द्वितीय पादस्थ अध्याय 57 और गरुडपुराण के 212वें अध्याय में छन्दशास्त्र
सूत्र-६८ 369 छन्दस्य पुराख्यानमाह — मृत्युभीतैः पुरा देवैरात्मनश्छन्दनायकः । संस्मृतानीह छन्दांसि छादितैस्तैस्ततो ¹महीः ॥ ३२ ॥ पूर्वकाल में मृत्यु के भय से आक्रान्त देवताओं ने अपने छन्दनायक के पास जाकर इन छन्दों का स्मरण दिलाया था। तब उसने इनको छाया देकर इस भूमि पर रहने के योग्य बनाया। छन्दे-छन्दं समुद्दिष्टं वाससी कृतिरेव च। छन्दोभिरावृतं सर्वं वन्द्यं सर्वत्र नान्यथा ॥ ३३ ॥ तब छन्दों में छन्दों का प्रयोग करते हुए भवनों का निर्माण करके उन्हें उन्नत किया। अस्तु, सर्वत्र वे सभी छन्दों से आवृत्त होकर वन्दनीय बन गए, इसमें कोई भी बात अन्यथा नहीं है। व्योम्नः पतते बिन्दु ?पतितो स बिन्दुगर्भातो भवेत्। गुरुर्लघुर्लतायाश्च तस्य चाष्टौ समुद्भवाः ॥ ३४ ॥ व्योम से जो बिन्दु भूमि पर गिरता है,
370 अपराजितपृच्छा अङ्कभिः पूरयेत् पश्चाद् यावत् सर्वहतं पदम् ॥ 35 ॥ पहला गुरु है। उसके नीचे ह्रस्व या लघु हो, पुनः जो शेष बचे वह ऊपर हो, इनको अङ्कों से बाद में पूरा करें जब तक कि सभी पद गुणित न हो जाए। गुरोरधस्ताच्च गुरुं निधाय शेषं समानं परिलक्ष्य सम्यक्। खण्डं प्रकुर्याद् गुरुपूरणार्थं यावत्पदं सर्वलघुस्थमेते ॥ 36 ॥ गुरु के नीचे गुरु रखें, शेष को ठीक तरह से समान परिलक्ष्य करें। गुरु पूरण हेतु उसके खण्ड करते जाएँ जब तक कि सभी लघुत्व तक न पहुँच जाएँ। भवन्ति प्रस्तारगताश्च ¹एते षट् सप्तमीप्रत्यय वै गृहाणाम् ?। ये नैव जानन्ति गुरुपदिष्टान् ते सूत्रधारा रिपवः प्रजानाम् ॥ 37 ॥ इस तरह प्रस्तार करते जाने से— (छियोत्तर प्रत्यय ?) गृहों के बनते हैं, इस गणित को जो गुरु के उपदेश से नहीं जानते, उन सूत्रधारों को प्रजाजनों का शत्रु ही मानना चाहिए। एकाद्येकोत्तरान् कोष्ठान् विन्यसेदिच्छयात्मनः। आद्यादारभ्य तद्वृद्धिर्यथास्यात्पार्श्वयोः समम् ॥ 38 ॥ एक से एक उत्तर कोष्ठों को अपनी इच्छानुसार न्यसित करें। पहले से आरम्भ करके फिर उसे बढ़ाते हुए सभी दोनों पास वालों को एक जैसा समान बनाएँ। मेरोरेकाधिका सङ्ख्या शरावस्येव चाकृतिः। प्रथमे कोष्ठके रूपमन्तं यावच्च पार्श्वयोः ॥ 39 ॥ मेरु की एक से अधिक संख्या होती है और उनकी आकृति शराव (सकोरे) के समान है। प्रथम कोष्ठक का जो स्वरूप है, वह अन्त तक होगा और इसमें पार्श्ववर्ती के आकार को भी वैसा ही करना चाहिए। आसनोध्र्वस्थयोर्न्स्येन्मध्ये सङ्कलितं पृथक्। तस्मिन्निष्टविकल्पानां सङ्ख्या स्यादन्त्यपङ्क्तिगा ॥ 40 ॥ इति मेरुछन्दः। यह स्मरणीय है कि ऊर्ध्वस्थित इन दोनों के मध्य में अलग सङ्कल्पित स्वरूप
- यह श्लोक ग्रन्थान्त के 236वें सूत्र में त्रुटितपाठ के रूप में जुड़ गया है : (चत्वार आद्यास्सुरवेश्मनां च) कर्तारएवामरवेश्मनां च दक्षाअपि प्रत्ययकान् षडेतान्। ये वै न जानन्ति गुरुपदिष्टास्ते सूत्रधारा रिपवः प्रजानाम्॥ यह माना जाए कि इन छन्दों में से आरम्भ के चार छन्द देवताओं के लिए मंदिरों हेतु होते हैं। कर्ता को इन छहों की गणित में दक्ष होना चाहिए। गुरु के उपदेश से जो इनका ज्ञान नहीं रखते, वे मानों जनता के वैरी ही सिद्ध होते हैं।
सूत्र-६८ 371 हो जाता है, पुनः इच्छित क्रिया-परिकल्पनाओं की वैकल्पिक संख्या अन्त की पङ्कि , में मिल जाती है।¹ अथ खण्डमेरु वर्णनं — खण्डमेरुं तु विन्यस्येत् तद्वदेवैकपार्श्ववतः । प्रवृद्धैः कोष्ठकैस्तत्राप्यङ्काः प्राग्वत् फलं यथा ॥ 41 ॥ अब खण्डमेरु के लिए कहते हैं कि उसी प्रकार से पार्श्व से खण्डमेरु का विन्यास करना चाहिए। उसके कोष्ठक प्रवृद्ध हों और अङ्क दूसरी पङ्कि में छोर तक, पहलों में शून्य रखें और अन्य कोष्ठों में भी पूर्व की भाँति, फल में भी वैसा ही करें। तथा चान्यं खण्डमेरु (पताकाच्छन्दश्च) — अथापरः खण्डमेरुः कोष्ठांस्तत्रेष्टसङ्ख्यया । कृत्वैकापचितान् वामविभागापचितानधः ॥ 42 ॥ इसके उपरान्त, दूसरे खण्डमेरु के विषय में कहा जा रहा है। वहाँ पर कोष्ठों को आठ की संख्या में रखना चाहिए। इस प्रकार इसमें नीचे से ऊपर कोष्ठ आठ होते हैं। इसके बाद (सम्भवतः पताका छन्दार्थ) एक-एक कम करते हुए नीचे के बायें भागों में भी कमी करते जाएँ। एकाद्येकोत्तरानङ्कानाद्यपङ्क्तौ निवेशयेत् । अन्यासु पङ्क्तिष्वाप्रान्तं शून्यानाद्येषु कल्पयेत् ॥ 43 ॥ द्वितीयेषु च कोष्ठेषु तासामेकैकं साधयेत् । द्वितीयायां तृतीयादिकोष्ठकेषु यथाक्रमम् ॥ 44 ॥ विकर्णयोगजानन्यानूर्ध्वाधोयोगसम्भवान् । फलं विकर्णयोगात्थमेकस्मिन् परिकल्पयेत् ॥ 45 ॥²
- यह मत समराङ्गणसूत्रधार से प्रेरित है। इसे इस तरह भी स्पष्ट किया जा सकता है—आगे से आगे एक एक कोष्ठों को इच्छानुसार विन्यसित करें, आदि से प्रारम्भ कर तदनन्तर बढ़ते जाएँ, जब तक दोनों पार्श्वों का एक समान सम्पादन हो जाए तब मेरुछन्द निष्पन्न होता है। मेरु की एक से अधिक संख्या होती है और शराव के सदृश्य उसकी आकृति होती है। प्रथम कोष्ठ का जो रूप होता है, वही पार्श्वों का रूप बन जाता है। ऊर्ध्वस्थित इन दोनों के मध्य में पृथक् सङ्कलित रूप हो जाता है, दुबारा इच्छित क्रिया कल्पनाओं की संख्या अन्तिम पङ्क्ति से संयुक्त हो जाती है— एकाद्येकोत्तरान् कोष्ठान् विन्यसेदिच्छयात्मनः। आद्यादारभ्य तद्वृद्धिर्यथा स्यात् पार्श्वयोः समम्॥ मेरोरेकाधिका सङ्ख्या शरावस्येव चाकृतिः। प्रथमे कोष्ठके रूपमन्तं यावच्च पार्श्वयोः॥ आसनोर्ध्वस्थयोर्नास्येन्मध्ये सङ्कलितं पृथक्। तस्मिंस्त्रिंशद्विकल्पनां सङ्ख्या स्यादन्त्यपङ्क्तिगा॥ (समराङ्गण. 26, 61-63)
- ये श्लोक ज्यों के त्यों समराङ्गण. में आए हैं— खण्डमेरुं तु विन्यस्येत् तद्वदेवैकपार्श्वतः। प्रवृद्धैः कोष्ठकैस्तत्राप्यङ्काः प्राग्वत् फलं तथा॥ अथापरः खण्डमेरुः कोष्ठांस्तत्रेष्टसङ्ख्यया। कृत्वैकापचितान्
372 अपराजितपृच्छा इति खण्डमेरुः ?। एक से आरम्भ करके उनके बाद के अङ्कों को पहली पङ्क्ति में रखें, दूसरों को पङ्क्ति के किनारे आदि से शून्यों की कल्पना करें। दूसरे कोष्ठक में भी उनको एक- एक करके, दूसरे को तीसरे कोष्ठक में क्रमशः रखते जाएँ। अब विकर्ण का योग जानने हेतु और ऊपर नीचे के योग लाने के लिए विकर्ण योग के फल को एक जगह कल्पित कर लेना चाहिए। इसका आशय है कि एक जिनके आरम्भ में है और एक ही जिनके अन्त में है, इस प्रकार के अङ्कों की पहली पङ्क्ति में रखें। इसमें भी यही क्रिया करें, पुनः तृतीय आदि कोष्ठकों में क्रमशः विकरण-योग से उत्पन्न या ऊर्ध्वाध योग से उत्पन्न अन्य अङ्कों का विन्यास करें। पुनः विकरण-योग से उत्पन्न फल की एक कोष्ठ में प्रकल्पना करें। एकाधिकानभीष्टायाः सङ्ख्यायास्तिर्यगालिखेत्। कोष्ठोनेतांश्च रूपादींस्तन्मध्ये द्विगुणोत्तरान् ॥ 46 ॥ एकोनं पृष्ठतस्तेषामेकं द्विगुणमग्रतः। नातिक्रमेत् परां सङ्ख्यां पताकाछन्द उच्यते।¹ गृहमालायुक्ताख्यातं पताकानामकं विदुः ॥ 47 ॥ इति पताकाछन्दः। एक से अधिक जब अभीष्ट हो तो उन संख्याओं को तिरछे लिखें। इन कोष्ठों को रूपादि मध्य दुगुणे करते जाएँ, एक के पीछे एक रखते हुए आगे वालों को दुगुना करते जाए। अब संख्या का अतिक्रमण न करें तो इसे 'पताका' छन्द कहते हैं। इसी को विद्वज्जन 'गृहमाला' नाम से भी पताका छन्द कहते हैं। आशय यह है कि अभीष्ट संख्या को एक से अधिक तिरछे लिखें। मध्य में दुगुने-दुगुने अन्तः कोष्ठ-रूपादि का न्यास करें। उनमें से पीछे एक संख्या कम करें और अग्रतः एक को दुगुना कर यदि परा संख्या का अतिक्रमण न हो तो पताका-छन्द होता है। वामविभागाचितानधः॥ एकाद्येकोत्तरानङ्गानाद्यपङ्क्तौ निवेशयेत्। अन्यासु पङ्क्तिष्वाप्रान्तं शून्यान्या(ना)द्येषु कल्पयेत्॥ द्वितीयेषु च कोष्ठेषु तासामेकैकमावयेत्। द्वितीयायां तृतीयादिकोष्ठकेषु यथाक्रमम्॥ विकर्णयोगजानन्यानूर्ध्वाधोयोगसम्भवान्। फलं विकर्णयोगोत्थमेकस्मिन् परिकल्पयेत्॥ (समराङ्गण. 26, 64-68)
- ये श्लोक ज्यों के त्यों समराङ्गण. में आए हैं— एकाधिकानभीष्टयाः सङ्ख्यायास्तिर्यगालिखेत्। कोष्ठानेकांश्च (तांश्च) रूपादींस्तन्मध्ये द्विगुणोत्तरान्॥ एकोनं पृष्ठतस्तेषामेकं द्विगुणमग्रतः। नातिक्रमेत् परां सङ्ख्यां पताकाछन्द उच्यते॥ (समराङ्गण. 26, 69-70)
सूत्र-६८ 373 अथ सूचीछन्दः — तद्दिनेष्टाद्यगा सङ्ख्येत्येकाद्यैस्तैस्ततो गृहे। न्यस्ताङ्कसङ्ख्याः सङ्ख्याः ¹गुरुलघ्वाद्यैः प्रकल्पिताः ॥ 48 ॥ अब सूचीछन्द के विषय में कहा जा रहा है। इसी प्रकार नेष्टाद्य संख्या को भी एक के बाद एक गृह में रखते जाए, उन अङ्क संख्या के न्यस्त रखने पर संख्या गुरु और लघु आदि प्रकल्पित होती है। एकैकमिष्टस्थानेषुः लिखेत् सैकेष्वतः( सैकेश्वतः! ) परम्। अन्त्याहृते पूर्वपूर्वयुक्तेनायोजयेत् परम् ॥ 49 ॥ एक-एक को इष्टस्थान पर लिखते जाए और एक से आगे अन्त तक पहली- पहली युक्ति अनुसार जोड़ते जाए अर्थात् पुनः अन्त की छोड़कर पहले-पहले वाली को दूसरी-दूसरी से मिलाएँ। अन्त्यादारभ्यं तद्भानावेकाद्येषु च पर्यायत्। अलिन्दादिषु यत्र स्यात् सङ्ख्या सूचीं तु तां विदुः ॥ 50 ॥² इति सूचीछन्दः। इसी प्रकार अन्त से पुनरारम्भ कर पीछे लौटे, जहाँ पर पर्याय से अलिन्द आदि की रचना में यह संख्या निकले, उसे विद्वानों ने सूचीछन्द कहा है। अथोद्दिष्टछन्द नष्टच्छन्दश्च — उद्दिष्टे स्थापयेत् सङ्ख्यामुद्दिष्टं सम्भजेच्च ताम्। दलयेद् रूपयुक्तां तु दलयेन्नाम सम्भवेत् ॥ 51 ॥ लघुस्वरूपदलने सैकार्धे करणे गुरुः। यावदिष्टपदाप्तिः स्याल्लघवोऽलिन्दकोदयः ॥ 52 ॥³
- समराङ्गण में यहाँ पाठ है—'स्युलिन्दाद्यैः प्रकल्पिताः।' इसका आशय होगा कि उसको छोड़कर पहली आदि इष्ट संख्याओं से अंक-विन्यास वाली संख्याओं को अलिन्दों से प्रकल्पित कर एक-एक को इष्ट स्थानों में रखें।
- ये श्लोक भी ज्यों के त्यों समराङ्गण. में मिलते हैं—तद्दिनेष्टाद्यगा सङ्ख्येत्येकाद्यैस्तैस्ततो गृहे। न्यस्ताङ्कसङ्ख्याः सङ्ख्याः स्युरलिन्दाद्यैः प्रकल्पिताः॥ एकैकमिष्टस्थानेषु लिखेत् सैकेश्वतः परम्। अन्त्याद(ह)ते पूर्वपूर्वयुक्तेनायोजयेत् परम्॥ अन्त्यादारभ्य तद्भानावेकाद्येषु च पर्यायत्। अलिन्दादिषु यत्र स्यात् सङ्ख्या सूचीं तु तां विदुः॥ (समराङ्गण. 26, 71-73)
- ये श्लोक भी समराङ्गण. में इसी रूप में हैं—उद्दिष्टे स्थापयेत् सङ्ख्यामुद्दिष्टं सम्भवे(जे)च्च ताम्। दलयेद् रूपयुक्तां तु दलयेन्नाम सम्भवेत्॥ लघुस्वरूपदलने सैकार्धे करणे गुरुः। यावदिष्टपदाप्तिः स्याल्लघवोऽलिन्दकोदयः॥ (समराङ्गण. 26, 74-75)
374 अपराजितपृच्छा इसी प्रकार उद्दिष्टछन्द के क्रम में इष्ट संख्या को स्थापित करें, पुनः उसको समान रूप से विभाजित करे। रूप वाली संख्या लघु स्वरूप के दलन में आधे सहित एक में जब गुरु बन जाए और इष्टपद की प्राप्ति हो जाए और सारे लघु हो जाए तब अलिन्द का उदय होता है अर्थात् लघु स्वरूप में बाँटने पर आधे गुरु करते हुए जब तक इष्ट पद न आए तब तक लघु अलिन्द बनते जाएँगे। कृत्वा छन्दः समुद्दिष्टं तदन्ते लघुनि द्विकम्। न्यसेदेकं गुरूणां च द्विगुणं द्विगुणं ततः॥ 53॥ व्यत्ययाल्लघुनः स्थाने द्विगुणादेककं गुरोः। कुर्यात् तमाद्यस्थानाङ्कसङ्ख्यं नष्टे गृहं भवेत्॥ 54॥¹ इत्युद्दिष्टनष्टछन्द। इसी प्रकार चाहा गया छन्द करके उसके अन्त में दो लघु रखें फिर एक गुरु रखे फिर उनको दुगुना-दुगुना करते जाए। फिर लघु के स्थान पर दुगुने युक्त को परस्पर रखे फिर उसको आद्य संख्या स्थान तक ले तो इसे नष्ट गृह कहते हैं। आशय यह है कि छन्द को समुद्दिष्ट करके अन्त लघु में एक जोड़ा न्यस्त करें, फिर दुगुना-दुगुना गुरुओं को विन्यास कर फिर इस क्रिया को पलट दे, लघु के स्थान में एक गुरु रखे तो नष्ट में आदि संख्या वाला गृह कहलाता है। प्राक्स्यैकं कोष्ठमेकैकवृद्ध्या न्यस्येदूर्ध्वं पङ्क्त्यो यावदिष्ट्राः। इष्टानेकार्दींलिखेदानुपूर्व्या कर्णेनाधः शून्यरूपे च दद्यात्॥ 55॥ कोष्ठक में एक रखकर एक-एक कोष्ठक में वृद्धि करते जाए; यह ऊपर की पङ्क्ति में रखते जाएँ जब तक की इष्ट की प्राप्ति न हो जाए, एकादि से इष्टों को लिखकर अनुपूर्व कर्ण के नीचे शून्य रूप में लिखें। कर्णस्थाङ्कश्लेषतोऽङ्के भवेद् यस्तं विन्यस्येत् कोष्ठकेषु क्रमेण। उद्दिष्टाङ्को भद्रसङ्ख्यानि मध्ये याभ्यः कर्णश्लेषतो मूषिकास्ताः॥ 56॥ एकादिषु द्विगुणितेष्विहः यावदिष्टमूषाक्रमव्युपहितेष्वथ तेषु विद्यात्। उद्दिष्टवेश्मकृतनिर्गममार्गमूषासत्काङ्कसैकयुतिनिर्मितसङ्ख्यमोकः॥ 57॥²
- तुलनीय- कृत्वा छन्दः समुद्दिष्टं तदन्ते लघुनि द्विकम्। न्यसेदेकं गुरूणां च द्विगुणं द्विगुणं ततः॥ व्यत्ययाल्लघुनः स्थाने द्विगुणादेककं गुरोः। कुर्या तमाद्यस्थानाङ्कसङ्ख्यं नष्टे गृहं भवेत्॥ (समराङ्गण. 26, 76-77)
- ये श्लोक समराङ्गणकार के हैं। तुलनीय- प्राक्स्यैकं कोष्ठमेकैकवृद्ध्या न्यस्येदूर्ध्वं पङ्क्तयो यावदिष्ट्राः। इष्टानेकादींलिखेदानुपूर्व्या कर्णेनाधः शून्यरूपे च दद्यात्॥ कर्णस्थाङ्कश्लेषतोऽङ्के भवेद् यस्तं विन्यस्येत् कोष्ठकेषु क्रमेण। उद्दिष्टाङ्को भद्रसङ्ख्यानि मध्ये याभ्यः कर्णश्लेषतो मूषिकास्ताः॥ एकादिषु द्विगुणितेष्विह
सूत्र-६९ ३७५ कर्णस्थ अङ्कों के श्षेष से जो अङ्क बने उसको क्रमवार कोष्ठक में लिखे। चाही गई अङ्क संख्या भद्र संख्या के मध्य में इनको रखने से कर्ण श्षेष से मूषिका न आ जाए, इस प्रकार एकादि और द्विगुणादि अंक संख्याओं से मूषाक्रम विन्यास का बोध होता है। इच्छित भवन के आने-जाने के मार्ग की मूषा के अङ्क से एक युति निर्मित संख्या बनती है। इसका यह आशय भी है कि इस रचना में मात्र अलिन्दों का ही ज्ञान नहीं होता है अपितु गृह में मूषा अर्थात् अवलोकन, गवाक्षों का अवबोध भी होता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां षट्छन्दनिर्णयाधिकारो नामाष्टषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६८ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में षट्छन्द निर्णय अधिकार नामक अड़सठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥ गृहोत्पत्तिहर्म्यादिराजप्रासादनिर्णयो नामैकोनसप्ततितमं सूत्रम् ॥ ६९ ॥ विश्वकर्मोवाच — अथेदानीं प्रवक्ष्यामि गृहस्योत्पत्तिलक्षणम्। उत्पद्यते यथात्वाद्वयं गृहादीनां तु सम्भवम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने अपराजित से आगे कहा कि अब मैं यहाँ गृहोत्पत्ति के लक्षण कहता हूँ। अस्तु, गृहों के निर्माण की, सभी उत्पत्तियों को आदि से कहता हूँ। घटिकानादोत्पत्ति प्रसङ्गं — आचायैर्द्दिव्यज्ञानैश्च पूर्वानतपद्मासनैः। षडिका ( घटिका ? ) याम्यहस्तेषु त्रिपातहस्तोद्धृता ? ॥ २ ॥ षडिका संस्थिता पृथ्वी तत्र नाद्यबिन्दूद्भवः ?। बिन्दुलया शिखा ज्ञेया सा सृष्टिश्चैवमुद्भवः ? ॥ ३ ॥ पूर्वकाल में पद्मासन में बैठे हुए आचार्य ने दिव्यज्ञान को प्राप्त किया था। उन्होंने बायें हाथ में घटिका ली और उसे नीचे से हाथ धर के ऊपर को उठाया ? जब घटिका भूमि पर रखी तो नादबिन्दु उपजा। उस बिन्दु लय को शिखा कहते हैं, वही सृष्टि के समुद्भव का कारण है ? यावदिष्टमूषाक्रमव्युपहितेष्वथ तेषु विद्यात्। उद्दिष्टवेश्मकृतनिर्गममार्गमूषासत्काङ्कसैकयुतिनिर्मित- सङ्ख्यमोक ॥ (समराङ्गण. 26, 78-80)
४. सूत्र १६१-२३९: नृत्य, संगीत, चित्रकला, सिंहासन, ध्वजारोहण एवं ग्रन्थ उपसंहार
376 अपराजितपृच्छा बिन्दु वामा कृता रेखा वामावर्त्ते पूर्वोदिताः । पूर्वापरगतास्त्वेवं सृष्टिसञ्ज्ञाविधानकम् ? ॥ ४ ॥ इस नादबिन्दु के बायीं और होती हुई पूर्व से आरम्भ होने वाली रेखा को पूर्व से पश्चिम जाने से सृष्टि संज्ञा विधान अर्थात् सृष्टि नाम दिया गया। आश्रमवास्तु — ऐशान्या अग्निपर्यन्तमाश्रमं ¹वस्तुसम्भवम्। आश्रयन्ति समस्ताश्च जीवा महितचेतसः ॥ ५ ॥ ईशान कोण से अग्नि कोण तक 'आश्रम' नामक वास्तु बनता है। वहाँ समस्त जीव आश्रय ग्रहण करते हैं और निश्चित होकर अपने हित का चिन्तन करते हैं। अथालयमाह — आग्नेयां निर्ऋतिर्यावत् सदा सृष्टिर्विनश्यति । इत्थमालयसञ्ज्ञा स्यात् सृष्टितोऽयं समुद्भवः ॥ ६ ॥ आलयः सर्वसत्त्वानां सर्वभूतात्मनां हितः। तदेवं लीयते सर्वमालयादिसमुद्भवम् ॥ ७ ॥ अब आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण) से नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) तक सदा सृष्टि का विनाश होता है। इनको 'आलय' नाम दिया गया है, जो यहाँ सृष्टि में उत्पन्न होता है। यह आलय भी सभी प्राणियों, सभी सत्त्वों और उनके हितों की रक्षा करता है, उसी तरह से सभी आलय आदि में सब लीन हो जाते हैं। कोष्ठका — नैर्ऋत्यनिलसम्भूता सृष्टिस्त्वेवं समुद्गता। कोष्ठकाभिधानमेतत् चतुरश्रीकृतं शुभम् ॥ ८ ॥ इसके बाद, नैर्ऋत्य से लेकर वायव्य दिशा तक जो सृष्टि बनती है उसका नाम 'कोष्ठका' है, वह चौकोर और शुभ है। छाद्यकं — आच्छादितं तथा चोर्ध्वं तच्च कोष्ठभिधानकम्। कोष्ठकं चतुर्हस्तान्तमाच्छाद्यं छाद्यकं विदुः ॥ ९ ॥
- मय ने वास्तु की अपेक्षा 'वस्तु' नामाभिधान ही दिया है। वस्तु ही मूल है। वस्तु से होने वाला पदार्थ वास्तु कहा जाता है। पृथ्वी प्रथम वस्तु है। इसके बाद प्रासाद, यान व शयनादि भी वास्तु की श्रेणी के अन्तर्गत है— अमर्त्याश्चैव मर्त्याश्च यत्र यत्र वसन्ति हि। तद्वस्त्विति मतं तज्ज्ञैस्तद्भेदांश्च वदाम्यहम् ॥ भूप्रासाद्यानानि शयनं च चतुर्विधम्। भूरेव मुख्यवस्तु स्यात्तत्र जातानि यानि हि ॥ (मयमतम् 2, 1-2)
सूत्र-६९ ३७७ उस कोष्ठका (कोठे) में ऊपर से छत की छवाई कोठे के चार हाथ तक अर्थात् चार गज तक की जाए, उस छवाई को विद्वज्जन 'छाद्यक' कहते हैं। आच्छाद्यं तु यदा क्षेत्रमेकहस्ताच्छतार्धतः । आवेष्टितं खलीपाटं फलकं स्याद् गृहाङ्गणम् ॥ १० ॥ परन्तु, जब उसे एक हाथ से (गज माप से) लेकर पचास गज तक छवाई कर दें तो खलीपाट से आवेष्टित गृह के आङ्गन में फलक बन जाता है। प्राकारमाह — एक-द्वि-त्रिसहस्रैश्च हस्तैर्मानसमन्वितम् । नगरेषु तथावेष्टकूटप्राकारसञ्ज्ञितम् ॥ ११ ॥ यदि छवाई मान, माप एक, दो या तीन हजार गजों का हो तो उन नगरों में 'तथावेष्टकूट' प्राकार नाम दिया जाता है। अथ गृहं — चतुर्हस्तादितः क्षेत्रं शिरश्छाद्यं समोदये । पूर्वे चैकद्वारयुतं गृहसञ्ज्ञं तदुच्यते ॥ १२ ॥ चार गज तक के क्षेत्र को सिर की छवाई तक ऊँचा रखें, उसमें पूर्व की ओर एक द्वार रखें तो उसे 'गृह' नाम दिया गया है। एकद्वारं भवेद्वेश्म पूर्वापरद्वार निलयः । त्रिद्वारं करणं प्रोक्तं चतुर्भिश्चातुरं भवेत् ॥ १३ ॥ एक द्वार वाले गृह को 'वेश्म' कहते हैं। इसी तरह यदि वेश्म में तीन द्वार हो तो उसे 'करण' कहते हैं और यदि वेश्म के चार द्वार हो तो उसे 'चातुर' नाम दिया जाता है। षड्जात्युत्पन्नच्छन्दा भैदैर्भिन्ना द्विरष्टभिः₁₆ । इत्युक्तकमरूपाढ्या गृहसङ्ख्या त्वनेकधा ॥ १४ ॥ इस तरह छह प्रकार के जातियों से उत्पन्न गृहों के भिन्न-भिन्न सोलह भेद होते हैं। इस प्रकार के क्रम से गृहों के रूपों से अनेक संख्या में गृह बनते हैं। तृणपट्टौ छादने स्तः वाजिच्छन्दः शिलामयः । खण्डच्छन्दो गृहमध्ये पूर्णच्छन्दो ह्यधोगृहम् ॥ १५ ॥ तृण पट्टिका से छवाई वाले गृह को 'छादन' तथा शिलापट्टी से छवाई वाले गृह को 'वाजिछन्द' तथा गृह के मध्य भाग की छवाई वाले गृह को 'खण्डछन्द' तथा ऊपर नीचे तक की छवाई वाले गृह को 'पूर्णछन्द' नाम दिया जाता है।
378 अपराजितपृच्छा पाण्डुच्छन्दस्तथाचैव भूम्यूर्ध्वं शैलजाश्रितः। षष्णां तु छन्दसां प्रोक्तः सृष्टिकाले समुद्भवः ॥ 16 ॥ यदि गृह भूमि से ऊँचाई पर अर्थात् पहाड़ों पर बना हो तो उसे 'पाण्डुछन्द' नाम से जाना जाता है। इस तरह सृष्टि के समय छह प्रकार के छवाई या छादन बताए हैं। अथ हर्म्यादीनां — एकभौमं द्विभौमं वा हर्म्य स्याद्वा त्रिभौमकम्। पट्टच्छन्दादिका भेदा हर्म्यादिवेश्मसञ्ज्ञकाः ॥ 17 ॥ अब हर्म्य के बारे में कहता हूँ। हर्म्य अर्थात् हवेलियों के भवन, एक मंजिल से लेकर दो, तीन मंजिल वाले तक होते हैं। इनके पाटने और छवाई के भेद हर्म्यादि वेश्म नाम से कहे गए हैं। शालालिन्दक्रमच्छन्दे भेदा भिन्नास्तु षोडश। चतुरुत्तरशतानि ह्येकशालप्रकारकाः ॥ 18 ॥ शाला, आलिन्दों के क्रम भेद से सोलह प्रकार के भिन्न-भिन्न भेद होते हैं। एकशाल प्रकार से इनके एक सौ चार भेद हैं। गुणितास्ते दशशतैर्लक्षमेकमतः परम्। चत्वारि च सहस्राणि एकशालादिषु क्रमात् ॥ 19 ॥ उनको दस सौ (1000) से गुणित करने पर एक लाख से भी परे तक हो जाते हैं। एकशाल से क्रमिक वृद्धि करते-करते चार हजार तक के प्रकार हो जाते हैं। पट्टच्छन्दे यथा भेदाः शालालिन्दादितस्तथा। विपरीतास्तृणच्छन्दे षोडशैव प्रकीर्तिताः ॥ 20 ॥ पट्छन्दों अर्थात् पटावों के जितने भेद हैं और शाला तथा अलिन्दों के जितने भेद हैं, उनके विपरीत ही तृणछन्दों के पटाव भी सोलह प्रकार के कहे गए हैं। वाजिच्छन्दोऽधिकोच्छ्रायः पाण्डुर्हीनोदयात्मकः। चतुर्हस्तं फलकान्ते शेषच्छन्दाः प्रशंसिताः ॥ 21 ॥ वाजिछन्द नामक पटाव अधिक ऊँचा होता है, पाण्डुहीन पटाव उससे कुछ नीचा होता है; अन्य शेष पटाव सामान्यतः चार गज की ऊँचाई तक (फलकान्त) होते हैं, जो प्रशंसित माने गए हैं। द्विपञ्चाशद् द्विशालानां प्रत्येकं द्विसहस्रतः। स चतुःसहस्रं लक्षं द्विशालानां प्रकीर्तितम् ॥ 22 ॥
सूत्र-६१ 379 बावन प्रकार की द्विशालाओं के प्रत्येक के दो हजार तक भेद होते हैं। इसी तरह की चार हजार लाख द्विशालाओं के भेद होते हैं। द्विसप्ततित्रिशालानां प्रत्येकं त्रिसहस्रतः। लक्षद्वयं त्रिशालानां तथा द्व्यष्टसहस्रकम् ॥ २३ ॥ बहत्तर त्रिशालाओं के भी प्रत्येक के तीन-तीन हजार भेद होते हैं और त्रिशालाओं के दो लाख सोलह हजार भेद होते हैं। चतुःशालगृहाणां षट्पञ्चाशच्च शतद्वयम्। प्रत्येकं चतुःसहस्रगुणितं च भवेदिदम् ॥ २४ ॥ चतुर्विंशतिसहस्रोत्तरं च दशलक्षकम्। चतुःशालकभेदे तु हर्म्याणि च भवन्ति हि ॥ २५ ॥ चतुःशाल गृहों के भेद भी दो सौ छप्पन होते हैं। इनमें प्रत्येक को हजार से गुणित करे तो ये दस लाख चौबीस हजार होते हैं। इस तरह से चतुःशाल भेद इन हवेलियों, हर्म्यों के होते हैं। चतुर्दशलक्षाण्यष्टचत्वारिंशत्सहस्रतः। मेरुसङ्ख्या तथा चेत्थं हर्म्यादिगृहेषु च ॥ २६ ॥ तत्राष्टाष्टगता भेदा एकैकस्य तथैव च। कोटिः पञ्चदशलक्षा वेदाशीतिसहस्रकम् ॥ २७ ॥ इसी तरह से चौदह लाख अड़तालीस हजार संख्या भेद मेरु हर्म्यादि गृहों के होते हैं। इनके भी आठ-आठ भेद से अलग-अलग प्रकार से वे सब एक करोड़ पन्द्रह लाख चौरासी हजार हो जाते हैं। एवं हर्म्यादिगृहाणां मेरुच्छन्दात् समुद्भवः। इषुच्छन्दोद्भवान्यान्ये तत्तुल्याश्चैव सङ्ख्यया ॥ २८ ॥ इत्युक्तं हर्म्यादिवेश्म प्रासादानामतः परम्। इस प्रकार हर्म्यादि गृह मेरुछन्द से बनते हैं और पाँच-पाँच छन्दों में और भी अन्य उतनी ही संख्या के बन जाते हैं। इस तरह अब तक हर्म्यादि वेश्म, भवनों के विषय में कहा गया। प्रासादसञ्ज्ञक हर्म्यवर्णन — प्रासादा देवभूपानामन्येषां हर्म्यमुच्यते ॥ २९ ॥ अब मैं प्रासाद नामक भवनों के बारे में कहता हूँ। राजाओं और देवताओं के
आवास को तो 'प्रासाद' और अन्य बड़े लोगों के आवास को 'हर्म्य' कहते हैं।¹ माडश्च मौडः शुद्धश्च शिखरं च चतुर्थकम्। तुङ्गारः सिंहकश्चैव षड् भेदा राजवेश्मनाम् ॥ ३० ॥ राजभवनों के 1. माड, 2. मौड, 3 शुद्ध, 4 शिखर, 5 तुङ्गार, 6 सिंहक— इस तरह से छह भेद कहे गए हैं। छाद्यघण्टाकूटैर्माडो मौडश्चोर्ध्ववरण्डिकः। वरण्डिकाः सर्वभूषु शुद्धो बाह्यचतुष्कतः ॥ ३१ ॥ छाद्य या पटाव, घण्टा या घूमट, कूट कंगूरों से युक्त भवन को 'माड' कहते हैं; जिसके ऊपर की ओर ऊँची वरण्डिका अर्थात् दीवार या बरामदा हो उसे 'मौड' कहते है। जिसके चारों तरफ बरामदा अर्थात् वरण्डिका हो और बाहर से भी चौकोर हो उसे 'शुद्ध' नाम दिया गया है। माडच्छन्दोद्भवे भद्रे भूमिशृङ्गाणि सन्ति चेत्। तच्च मौडाभिधानं स्यात् प्रशस्तं राजवेश्मनि ॥ ३२ ॥ यदि माडछन्द से बनी हुई भद्रों में अर्थात् दीवारों में भूमिशृङ्ग हो तो अर्थात् कंगूरे हो तो उसको 'मौड' नाम से प्रशस्त राजभवन कहा है। शिखरं शिखराकारं सुरसद्मादिसम्भवम्। भद्रे भद्रे तवङ्गानि तुङ्गारा द्विगुणं गता ॥ ३३ ॥ जो पहाड़ी की चोटी, शिखराकार के भवन हैं जैसे सुर सद्मादि सम्भव अर्थात् मन्दिरों की आकृति वाला हो तो उसे 'शिखर भवन' कहते हैं। जिसकी हर एक दीवार पर तवङ्ग बने हों और ऊँचे-ऊँचे गुम्बज हो और जो दुगुनी ऊँचाई लिए हुए हो, उसे तुङ्गार भवन कहते हैं। सिंहावलोकनं कुर्यात् सिंहकर्णैर्विभूषितम्। एवं वै षड्विधं प्रोक्तं राजवेश्म सुखावहम् ॥ ३४ ॥ जिसके कोनों पर सिंहकर्ण-सी आकृति हो अर्थात् बड़े-बड़े कंगूरे हो, उसे 'सिंहावलोकन' भवन कहते हैं। इस तरह सुखदायी राजभवनों के छह प्रकारों के बारे में कहा गया। मालिकानि कथ्यते — मालिकानि यथोक्तानि कथयामि समासतः।
- 'हर्म्यादि धनिनाम् वासः प्रासादो देव भुर्भुजाम्' इति अमरकोष (पुरवर्ग. 2,9)।
सूत्र-६१ 381 द्विशतहस्तविस्तीर्णं पञ्चषष्टिकरोच्छ्रयम् ॥ ३५ ॥ द्वारं सप्तदशहस्तं मध्यमं रङ्ग ¹सत्वरम् । याम्येपरे उत्तरेषु उच्छ्रयति विंशतिकरैः ? ॥ ३६ ॥ अब मैं मालिकाओँ यानी महलों के बारे में संक्षेप में कहता हूँ। दो सौ हाथ अर्थात् 200 गज की चौड़ी और 65 गज ऊँची और जिसके द्वार भी 17 गज ऊँचे हों और मध्य में रङ्गशाला हो तथा उभयपार्श्व से 20 गज की ऊँचाई से युक्त हो (ये मालिका कही जाती है, मेवाड़ में 'महल-मालिया' शब्द व्यवहृत है)। राजा वा चक्रवर्ती वा खण्डजा मण्डलाधिपाः । मुकुटध्वजा भूपालाः सामन्ता लघवस्तथा ॥ ३७ ॥ राजा हो, चक्रवर्ती हो, खण्डजा या खण्डपति हो, मण्डलाधिप हो, मुकट- ध्वजाधारी भूपाल हो अथवा छोटे सामन्तगण हों।² छत्रधासः प्रतीहाराः खड्गधराश्चतुर्वराः । वंशोपानद्धराश्चैव अङ्गरक्षा³चतुष्किका ॥ ३८ ॥ छत्रधारी स्तर का हो, प्रतिहार पद का हो, खड्गधारी पद का, चतुर और श्रेष्ठ पदधारक हो, पानधरा या पाणेरी वंश⁴ का हो, अङ्गरक्षकों के या चौकीदारी पद पर हो। सुभटैरभिभज्यन्ते साधु साधुजनाकुलैः । राजगृहं सदासेव्यमीशस्य चामरैर्र्यथा ॥ ३९ ॥ महान् वीर हो, अभिजात्य वर्ग में अभिनन्दित हुए हों, साधुजनों में भी साधु मान्य हो अर्थात् बहुत ही सज्जन हो, सदा राजगृह की सेवा में रहते आए हों, अपने स्वामी के चामरधारी रहे हों। दासीदासाः सूपकाराश्छत्रधाराश्चव्यञ्जनाः । महिषी कुरुते देवी चामरधारी त्वमासन्ना ॥ ४० ॥ तथा च केशबन्धाश्च जातीचम्पकग्रन्थिकाः । कुङ्कुमश्रीखण्डहस्ता उद्वर्त्तनोत्तरनायिकाः ॥ ४१ ॥
- 'सत्करम् ?' इति प्रकाशित पाठः।
- यहाँ राजाओं की विविध कोटियाँ आई हैं। ग्रन्थकार ने आगे 81वें सूत्र में श्लोक 2 से 12 तक इनका विस्तार से वर्णन किया है। सूत्रधार मण्डन ने भी इसी को आधार बनाया है। (राजवल्लभ 5, 2-4)
- 'चतुलिका' इति प्रकाशित पाठः।
- 'पाणेरी' जैसे व्यक्ति का वर्णन अर्थशास्त्र में आया है, मेवाड़ में राजदरबार में जलप्रबन्धक के लिए पानेरी पद रहा है। आज भी पानेरी नामधारी लोग इसी मान्यता की पुष्टि करते हैं।
जिनके दासी-दास और रसोइयों की पूरी व्यवस्था हो, छत्र और व्यञ्जन-पङ्खे धारण करने का अधिकारी हों, जिनकी महिलाओं को महिषी की पदवी हो, जिनके पार्श्व में चामरधारी चलें— ऐसे अधिकार प्राप्त हों तथा जो केश के शृङ्गार में चमेली, चम्पक आदि पुष्पों की माला-गजरे आदि केश विन्यास के प्रसाधन प्रबन्धक के पद पर हो, जो शृङ्गारादि के लिए चन्दन लेप, कुङ्कुमादि तथा उबटन, उत्तरीय आदि के रखने की नायिकाएँ हों, उस पद पर काम करने वाली पदाधिकारी हों (इनके लिए मालिका गृह उपयोगी है)। अक्षौ च त्रीमुने सै सर्वे नेन्द्रीपञ्जिचोरका।¹ इष्टराज्ञीं सदा ध्यात्वा मुनिषोडशां तथा ? ॥ 42 ॥ (वहाँ पर) अक्षक्रीड़ा² अर्थात् पाशों का खेल, इक्कीस (त्रीमुने) घरों वाला खेल, नयनबन्दी³, पञ्जिचोरका⁴ जैसी क्रीड़ाएँ हों और अपनी इष्ट रानी का सदा वैसे ही ध्यान रखें जैसे कि मुनियों की भी षोडशी युवती के प्रति कामुक दृष्टि बनी रहती है। त्रिभूमिमध्यकर्त्तव्या मालिका क्रमशः स्थिता। मालिका अर्थात् महलों को सदा त्रिभूमि मध्य अर्थात् तीन चौक पार करने के बाद क्रमवार, मध्य में बनाना चाहिए। सूर्यवंशोद्भवाः शैवा वतरन्ति यदा महीम् ॥ 43 ॥ तेषां वेश्मानि कार्याणि नान्येषां तु कदाचन। एवं तु राजवेश्मानि कर्त्तव्यानि च सर्वदा ॥ 44 ॥
- ‘अक्षौ ? च त्रीमुने सै सर्वे नेन्द्रीप्रतिचोरका?’ इति प्रकाशित पाठः।
- ‘अक्षक्रीड़ा’ में तीस पाशकों या सारिकों का प्रयोग होता जिसमें 15 श्वेत व 15 चित्रित पाशे होते थे— दशपञ्च सितास्तत्र दशपञ्च विचित्रता। त्रिंशदेताः समाख्याता.... पाशककेलिषु ॥ (मानसोल्लास 5, 13,
- ‘दृङ्मीलन’ नाम से इस खेल का उल्लेख शार्ङ्गधरपद्धति में हुआ है जिसमें परस्पर अचानक आँखें बन्द कर दी जाती थी— इत्थं बालतया सखीभिरसकृद्दृङ्मीलनाकेलिषु व्याषिद्वा रजनीमुखे च नयने स्वे गर्हते कन्यका॥ (शार्ङ्गधर. श्लोक 3942) सोमेश्वर ने दिखाई नहीं देने वाले स्थान में ऐसी ही तिमिर क्रीड़ा का वर्णन किया है जो राजा अपनी प्रेयसियों के साथ करता था— तथाविधं तमः कुर्याद्यत्र किञ्चिन्न लक्ष्यते। (मानसो. 5, 17, 935)
- ‘पञ्जिका’ क्रीड़ा में राजा स्वयं स्त्रियों के साथ भाग लेता जो रूपसियाँ, प्रेमभाव से पूर्ण, विलास-विभ्रम से युक्त, परिहार रस को प्रसारित करने वाली व चतुर होती थीं— तरुणी रूपसम्पन्ना प्रेमभावसमन्विता। विलासविभ्रमे युक्ता परिहासरसप्रिया॥ आहूय चतुराः कान्ताः पञ्जीक्रीडाविशारदाः। ताभिः सह महीपालः पञ्जिक्रीड़ां समाचरेत् ॥ (मानसो. 5, 16, 885-886) यदि यहाँ ‘प्रतिचोरका’ शब्द माने तो भागवत में निलयन क्रीड़ा का वर्णन हुआ है जिसमें एक जना चोर बनकर अन्य को ढूँढ़ता था। (भागवत. 10, 38, 27)
सूत्र-७० ३८३ इस पृथ्वी पर जो सूर्यवंश में उत्पन्न होने वाले और शैवोपासक राजा हों¹, उनके लिए ऐसे सर्वाङ्ग वेश्मों का निर्माण करना चाहिए। किसी अन्य के लिए कभी ऐसे उन्नत महल नहीं बनाएँ, क्योंकि यह खानदान और उच्चकुल की मर्यादा रखने की बात है, अतएव ऐसे भवन सदा राजाओं के ही बनाने चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गृहोत्पत्तिहर्म्यादिराजप्रासादनिर्णयाधिकारो नामैकोनसप्ततितमं सूत्रम्॥ ६९॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गृहोत्पत्ति हर्म्यादि राजप्रासाद निर्णय अधिकार नामक उनसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ ६९॥ भूधरादिब्रह्मनगरं सप्ततितमं सूत्रम्॥ ७०॥ विश्वकर्मोवाच — गृहाणि नृपदेवानां स्वर्गपातालवासिनाम्। ब्राह्मणानां हितार्थाय नगरं वच्मि सम्प्रति॥ १॥ विश्वकर्मा बोले कि अब मैं राजाओं और देवताओं, स्वर्ग व पाताल के निवासियों तथा ब्राह्मणों के हित के लिए रहने योग्य आवासीय नगरों के बारे में कहता हूँ। १. ग्रन्थकार का यह सङ्केत सम्भवतः मेदपाट-मेवाड़ के सूर्यवंशी राजकुल की ओर है जो शैवोपासक हैं। सूर्यवंशी यह कुल गुजरात के आनन्दपुर से उठा हुआ है और गुहदत्त से चला है। एकलिङ्गनाथ इनके परमेश्वर और आराध्य है। यह मन्दिर कैलाशपुरी-उदयपुर में बना हुआ है। यहाँ से प्राप्त ९७१ ई. के शिलालेख में इसे प्रथम तीर्थ कहा गया है और उसमें मेवाड़ राज्य के संस्थापक बप्पा और नरवाहन के प्रबल प्रताप का यशोगान है। (जर्नल ऑफ बॉम्बे एशियाटिक सोसायटी, जिल्द २२, पृष्ठ १६६-१६७, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग १, पृष्ठ २५६-२५९) राजप्रशस्ति नामक शिलोत्कीर्ण १७वीं सदी के अभिलेख में इस वंश की सूर्य, मन्वादि क्रम से परम्परा दी गई है। कर्नल जेम्स टॉड ने भी यह वंशावली दी है। यह भी एक महत्वपूर्ण सङ्केत है कि यह ग्रन्थ किसी सूर्यवंशी राजा के आश्रय में ही लिखा गया हो। इसी वंश में 'अपराजित' नामक राजा हुआ है जिसका अभिलेख कुण्डा नामक ग्राम से प्राप्त हुआ है। यह प्रशस्ति मार्गशीर्ष शुक्ला पञ्चमी, तदनुसार २ नवम्बर ६६१ ई. की है। वह शिवभक्त था किन्तु उसका सेनापति विष्णुभक्त था। उसकी पत्नी यशोमति ने कुण्डेश्वर के निकट विष्णु का मन्दिर बनवाया। (एपिग्राफिया इण्डिका जिल्द ४, पृष्ठ ३१) अपराजित के काल से ही मेवाड़ में स्थापत्य के स्थायी कार्यों की शृङ्खला दिखाई देती है। नागदा गाँव में तो ९९९ मन्दिरों की घण्टियाँ एक साथ बजती थीं— ऐसी अनुश्रुति चली आती है। सम्भव है कि उन स्थितियों को अङ्गीकार करके भुवनदेवाचार्य ने इस ग्रन्थ का प्रणयन किया हो, तब तक मेवाड़ में समराङ्गणसूत्रधार का भी पर्याप्त प्रचार हो चुका था। भोज ने नागदा-कैलाशपुरी के पास जलाशय खुदवाया, चित्तौड़गढ़ पर समीधेश्वर महादेव का मन्दिर बनवाया। इन स्थितियों और इस अर्थ में अपराजितपृच्छा पर समराङ्गण, का प्रभाव इस क्षेत्र में इस ग्रन्थ के प्रणयन का आधार बताता है। उक्त रचनाकार मरुभूमि और गुर्जरत्रा की परम्पराओं का भी अच्छा जानकार था।