भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-६१ 379 बावन प्रकार की द्विशालाओं के प्रत्येक के दो हजार तक भेद होते हैं। इसी तरह की चार हजार लाख द्विशालाओं के भेद होते हैं। द्विसप्ततित्रिशालानां प्रत्येकं त्रिसहस्रतः। लक्षद्वयं त्रिशालानां तथा द्व्यष्टसहस्रकम् ॥ २३ ॥ बहत्तर त्रिशालाओं के भी प्रत्येक के तीन-तीन हजार भेद होते हैं और त्रिशालाओं के दो लाख सोलह हजार भेद होते हैं। चतुःशालगृहाणां षट्पञ्चाशच्च शतद्वयम्। प्रत्येकं चतुःसहस्रगुणितं च भवेदिदम् ॥ २४ ॥ चतुर्विंशतिसहस्रोत्तरं च दशलक्षकम्। चतुःशालकभेदे तु हर्म्याणि च भवन्ति हि ॥ २५ ॥ चतुःशाल गृहों के भेद भी दो सौ छप्पन होते हैं। इनमें प्रत्येक को हजार से गुणित करे तो ये दस लाख चौबीस हजार होते हैं। इस तरह से चतुःशाल भेद इन हवेलियों, हर्म्यों के होते हैं। चतुर्दशलक्षाण्यष्टचत्वारिंशत्सहस्रतः। मेरुसङ्ख्या तथा चेत्थं हर्म्यादिगृहेषु च ॥ २६ ॥ तत्राष्टाष्टगता भेदा एकैकस्य तथैव च। कोटिः पञ्चदशलक्षा वेदाशीतिसहस्रकम् ॥ २७ ॥ इसी तरह से चौदह लाख अड़तालीस हजार संख्या भेद मेरु हर्म्यादि गृहों के होते हैं। इनके भी आठ-आठ भेद से अलग-अलग प्रकार से वे सब एक करोड़ पन्द्रह लाख चौरासी हजार हो जाते हैं। एवं हर्म्यादिगृहाणां मेरुच्छन्दात् समुद्भवः। इषुच्छन्दोद्भवान्यान्ये तत्तुल्याश्चैव सङ्ख्यया ॥ २८ ॥ इत्युक्तं हर्म्यादिवेश्म प्रासादानामतः परम्। इस प्रकार हर्म्यादि गृह मेरुछन्द से बनते हैं और पाँच-पाँच छन्दों में और भी अन्य उतनी ही संख्या के बन जाते हैं। इस तरह अब तक हर्म्यादि वेश्म, भवनों के विषय में कहा गया। प्रासादसञ्ज्ञक हर्म्यवर्णन — प्रासादा देवभूपानामन्येषां हर्म्यमुच्यते ॥ २९ ॥ अब मैं प्रासाद नामक भवनों के बारे में कहता हूँ। राजाओं और देवताओं के