अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआवास को तो 'प्रासाद' और अन्य बड़े लोगों के आवास को 'हर्म्य' कहते हैं।¹ माडश्च मौडः शुद्धश्च शिखरं च चतुर्थकम्। तुङ्गारः सिंहकश्चैव षड् भेदा राजवेश्मनाम् ॥ ३० ॥ राजभवनों के 1. माड, 2. मौड, 3 शुद्ध, 4 शिखर, 5 तुङ्गार, 6 सिंहक— इस तरह से छह भेद कहे गए हैं। छाद्यघण्टाकूटैर्माडो मौडश्चोर्ध्ववरण्डिकः। वरण्डिकाः सर्वभूषु शुद्धो बाह्यचतुष्कतः ॥ ३१ ॥ छाद्य या पटाव, घण्टा या घूमट, कूट कंगूरों से युक्त भवन को 'माड' कहते हैं; जिसके ऊपर की ओर ऊँची वरण्डिका अर्थात् दीवार या बरामदा हो उसे 'मौड' कहते है। जिसके चारों तरफ बरामदा अर्थात् वरण्डिका हो और बाहर से भी चौकोर हो उसे 'शुद्ध' नाम दिया गया है। माडच्छन्दोद्भवे भद्रे भूमिशृङ्गाणि सन्ति चेत्। तच्च मौडाभिधानं स्यात् प्रशस्तं राजवेश्मनि ॥ ३२ ॥ यदि माडछन्द से बनी हुई भद्रों में अर्थात् दीवारों में भूमिशृङ्ग हो तो अर्थात् कंगूरे हो तो उसको 'मौड' नाम से प्रशस्त राजभवन कहा है। शिखरं शिखराकारं सुरसद्मादिसम्भवम्। भद्रे भद्रे तवङ्गानि तुङ्गारा द्विगुणं गता ॥ ३३ ॥ जो पहाड़ी की चोटी, शिखराकार के भवन हैं जैसे सुर सद्मादि सम्भव अर्थात् मन्दिरों की आकृति वाला हो तो उसे 'शिखर भवन' कहते हैं। जिसकी हर एक दीवार पर तवङ्ग बने हों और ऊँचे-ऊँचे गुम्बज हो और जो दुगुनी ऊँचाई लिए हुए हो, उसे तुङ्गार भवन कहते हैं। सिंहावलोकनं कुर्यात् सिंहकर्णैर्विभूषितम्। एवं वै षड्विधं प्रोक्तं राजवेश्म सुखावहम् ॥ ३४ ॥ जिसके कोनों पर सिंहकर्ण-सी आकृति हो अर्थात् बड़े-बड़े कंगूरे हो, उसे 'सिंहावलोकन' भवन कहते हैं। इस तरह सुखदायी राजभवनों के छह प्रकारों के बारे में कहा गया। मालिकानि कथ्यते — मालिकानि यथोक्तानि कथयामि समासतः।
- 'हर्म्यादि धनिनाम् वासः प्रासादो देव भुर्भुजाम्' इति अमरकोष (पुरवर्ग. 2,9)।