भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 426

सूत्र-६१ 381 द्विशतहस्तविस्तीर्णं पञ्चषष्टिकरोच्छ्रयम् ॥ ३५ ॥ द्वारं सप्तदशहस्तं मध्यमं रङ्ग ¹सत्वरम् । याम्येपरे उत्तरेषु उच्छ्रयति विंशतिकरैः ? ॥ ३६ ॥ अब मैं मालिकाओँ यानी महलों के बारे में संक्षेप में कहता हूँ। दो सौ हाथ अर्थात् 200 गज की चौड़ी और 65 गज ऊँची और जिसके द्वार भी 17 गज ऊँचे हों और मध्य में रङ्गशाला हो तथा उभयपार्श्व से 20 गज की ऊँचाई से युक्त हो (ये मालिका कही जाती है, मेवाड़ में 'महल-मालिया' शब्द व्यवहृत है)। राजा वा चक्रवर्ती वा खण्डजा मण्डलाधिपाः । मुकुटध्वजा भूपालाः सामन्ता लघवस्तथा ॥ ३७ ॥ राजा हो, चक्रवर्ती हो, खण्डजा या खण्डपति हो, मण्डलाधिप हो, मुकट- ध्वजाधारी भूपाल हो अथवा छोटे सामन्तगण हों।² छत्रधासः प्रतीहाराः खड्गधराश्चतुर्वराः । वंशोपानद्धराश्चैव अङ्गरक्षा³चतुष्किका ॥ ३८ ॥ छत्रधारी स्तर का हो, प्रतिहार पद का हो, खड्गधारी पद का, चतुर और श्रेष्ठ पदधारक हो, पानधरा या पाणेरी वंश⁴ का हो, अङ्गरक्षकों के या चौकीदारी पद पर हो। सुभटैरभिभज्यन्ते साधु साधुजनाकुलैः । राजगृहं सदासेव्यमीशस्य चामरैर्र्यथा ॥ ३९ ॥ महान् वीर हो, अभिजात्य वर्ग में अभिनन्दित हुए हों, साधुजनों में भी साधु मान्य हो अर्थात् बहुत ही सज्जन हो, सदा राजगृह की सेवा में रहते आए हों, अपने स्वामी के चामरधारी रहे हों। दासीदासाः सूपकाराश्छत्रधाराश्चव्यञ्जनाः । महिषी कुरुते देवी चामरधारी त्वमासन्ना ॥ ४० ॥ तथा च केशबन्धाश्च जातीचम्पकग्रन्थिकाः । कुङ्कुमश्रीखण्डहस्ता उद्वर्त्तनोत्तरनायिकाः ॥ ४१ ॥

  1. 'सत्करम् ?' इति प्रकाशित पाठः।
  2. यहाँ राजाओं की विविध कोटियाँ आई हैं। ग्रन्थकार ने आगे 81वें सूत्र में श्लोक 2 से 12 तक इनका विस्तार से वर्णन किया है। सूत्रधार मण्डन ने भी इसी को आधार बनाया है। (राजवल्लभ 5, 2-4)
  3. 'चतुलिका' इति प्रकाशित पाठः।
  4. 'पाणेरी' जैसे व्यक्ति का वर्णन अर्थशास्त्र में आया है, मेवाड़ में राजदरबार में जलप्रबन्धक के लिए पानेरी पद रहा है। आज भी पानेरी नामधारी लोग इसी मान्यता की पुष्टि करते हैं।