भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 535 में से

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जिनके दासी-दास और रसोइयों की पूरी व्यवस्था हो, छत्र और व्यञ्जन-पङ्खे धारण करने का अधिकारी हों, जिनकी महिलाओं को महिषी की पदवी हो, जिनके पार्श्व में चामरधारी चलें— ऐसे अधिकार प्राप्त हों तथा जो केश के शृङ्गार में चमेली, चम्पक आदि पुष्पों की माला-गजरे आदि केश विन्यास के प्रसाधन प्रबन्धक के पद पर हो, जो शृङ्गारादि के लिए चन्दन लेप, कुङ्कुमादि तथा उबटन, उत्तरीय आदि के रखने की नायिकाएँ हों, उस पद पर काम करने वाली पदाधिकारी हों (इनके लिए मालिका गृह उपयोगी है)। अक्षौ च त्रीमुने सै सर्वे नेन्द्रीपञ्जिचोरका।¹ इष्टराज्ञीं सदा ध्यात्वा मुनिषोडशां तथा ? ॥ 42 ॥ (वहाँ पर) अक्षक्रीड़ा² अर्थात् पाशों का खेल, इक्कीस (त्रीमुने) घरों वाला खेल, नयनबन्दी³, पञ्जिचोरका⁴ जैसी क्रीड़ाएँ हों और अपनी इष्ट रानी का सदा वैसे ही ध्यान रखें जैसे कि मुनियों की भी षोडशी युवती के प्रति कामुक दृष्टि बनी रहती है। त्रिभूमिमध्यकर्त्तव्या मालिका क्रमशः स्थिता। मालिका अर्थात् महलों को सदा त्रिभूमि मध्य अर्थात् तीन चौक पार करने के बाद क्रमवार, मध्य में बनाना चाहिए। सूर्यवंशोद्भवाः शैवा वतरन्ति यदा महीम् ॥ 43 ॥ तेषां वेश्मानि कार्याणि नान्येषां तु कदाचन। एवं तु राजवेश्मानि कर्त्तव्यानि च सर्वदा ॥ 44 ॥

  1. ‘अक्षौ ? च त्रीमुने सै सर्वे नेन्द्रीप्रतिचोरका?’ इति प्रकाशित पाठः।
  2. ‘अक्षक्रीड़ा’ में तीस पाशकों या सारिकों का प्रयोग होता जिसमें 15 श्वेत व 15 चित्रित पाशे होते थे— दशपञ्च सितास्तत्र दशपञ्च विचित्रता। त्रिंशदेताः समाख्याता.... पाशककेलिषु ॥ (मानसोल्लास 5, 13,
  1. ‘दृङ्मीलन’ नाम से इस खेल का उल्लेख शार्ङ्गधरपद्धति में हुआ है जिसमें परस्पर अचानक आँखें बन्द कर दी जाती थी— इत्थं बालतया सखीभिरसकृद्दृङ्मीलनाकेलिषु व्याषिद्वा रजनीमुखे च नयने स्वे गर्हते कन्यका॥ (शार्ङ्गधर. श्लोक 3942) सोमेश्वर ने दिखाई नहीं देने वाले स्थान में ऐसी ही तिमिर क्रीड़ा का वर्णन किया है जो राजा अपनी प्रेयसियों के साथ करता था— तथाविधं तमः कुर्याद्यत्र किञ्चिन्न लक्ष्यते। (मानसो. 5, 17, 935)
  2. ‘पञ्जिका’ क्रीड़ा में राजा स्वयं स्त्रियों के साथ भाग लेता जो रूपसियाँ, प्रेमभाव से पूर्ण, विलास-विभ्रम से युक्त, परिहार रस को प्रसारित करने वाली व चतुर होती थीं— तरुणी रूपसम्पन्ना प्रेमभावसमन्विता। विलासविभ्रमे युक्ता परिहासरसप्रिया॥ आहूय चतुराः कान्ताः पञ्जीक्रीडाविशारदाः। ताभिः सह महीपालः पञ्जिक्रीड़ां समाचरेत् ॥ (मानसो. 5, 16, 885-886) यदि यहाँ ‘प्रतिचोरका’ शब्द माने तो भागवत में निलयन क्रीड़ा का वर्णन हुआ है जिसमें एक जना चोर बनकर अन्य को ढूँढ़ता था। (भागवत. 10, 38, 27)