भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 428

सूत्र-७० ३८३ इस पृथ्वी पर जो सूर्यवंश में उत्पन्न होने वाले और शैवोपासक राजा हों¹, उनके लिए ऐसे सर्वाङ्ग वेश्मों का निर्माण करना चाहिए। किसी अन्य के लिए कभी ऐसे उन्नत महल नहीं बनाएँ, क्योंकि यह खानदान और उच्चकुल की मर्यादा रखने की बात है, अतएव ऐसे भवन सदा राजाओं के ही बनाने चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गृहोत्पत्तिहर्म्यादिराजप्रासादनिर्णयाधिकारो नामैकोनसप्ततितमं सूत्रम्॥ ६९॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गृहोत्पत्ति हर्म्यादि राजप्रासाद निर्णय अधिकार नामक उनसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ ६९॥ भूधरादिब्रह्मनगरं सप्ततितमं सूत्रम्॥ ७०॥ विश्वकर्मोवाच — गृहाणि नृपदेवानां स्वर्गपातालवासिनाम्। ब्राह्मणानां हितार्थाय नगरं वच्मि सम्प्रति॥ १॥ विश्वकर्मा बोले कि अब मैं राजाओं और देवताओं, स्वर्ग व पाताल के निवासियों तथा ब्राह्मणों के हित के लिए रहने योग्य आवासीय नगरों के बारे में कहता हूँ। १. ग्रन्थकार का यह सङ्केत सम्भवतः मेदपाट-मेवाड़ के सूर्यवंशी राजकुल की ओर है जो शैवोपासक हैं। सूर्यवंशी यह कुल गुजरात के आनन्दपुर से उठा हुआ है और गुहदत्त से चला है। एकलिङ्गनाथ इनके परमेश्वर और आराध्य है। यह मन्दिर कैलाशपुरी-उदयपुर में बना हुआ है। यहाँ से प्राप्त ९७१ ई. के शिलालेख में इसे प्रथम तीर्थ कहा गया है और उसमें मेवाड़ राज्य के संस्थापक बप्पा और नरवाहन के प्रबल प्रताप का यशोगान है। (जर्नल ऑफ बॉम्बे एशियाटिक सोसायटी, जिल्द २२, पृष्ठ १६६-१६७, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग १, पृष्ठ २५६-२५९) राजप्रशस्ति नामक शिलोत्कीर्ण १७वीं सदी के अभिलेख में इस वंश की सूर्य, मन्वादि क्रम से परम्परा दी गई है। कर्नल जेम्स टॉड ने भी यह वंशावली दी है। यह भी एक महत्वपूर्ण सङ्केत है कि यह ग्रन्थ किसी सूर्यवंशी राजा के आश्रय में ही लिखा गया हो। इसी वंश में 'अपराजित' नामक राजा हुआ है जिसका अभिलेख कुण्डा नामक ग्राम से प्राप्त हुआ है। यह प्रशस्ति मार्गशीर्ष शुक्ला पञ्चमी, तदनुसार २ नवम्बर ६६१ ई. की है। वह शिवभक्त था किन्तु उसका सेनापति विष्णुभक्त था। उसकी पत्नी यशोमति ने कुण्डेश्वर के निकट विष्णु का मन्दिर बनवाया। (एपिग्राफिया इण्डिका जिल्द ४, पृष्ठ ३१) अपराजित के काल से ही मेवाड़ में स्थापत्य के स्थायी कार्यों की शृङ्खला दिखाई देती है। नागदा गाँव में तो ९९९ मन्दिरों की घण्टियाँ एक साथ बजती थीं— ऐसी अनुश्रुति चली आती है। सम्भव है कि उन स्थितियों को अङ्गीकार करके भुवनदेवाचार्य ने इस ग्रन्थ का प्रणयन किया हो, तब तक मेवाड़ में समराङ्गणसूत्रधार का भी पर्याप्त प्रचार हो चुका था। भोज ने नागदा-कैलाशपुरी के पास जलाशय खुदवाया, चित्तौड़गढ़ पर समीधेश्वर महादेव का मन्दिर बनवाया। इन स्थितियों और इस अर्थ में अपराजितपृच्छा पर समराङ्गण, का प्रभाव इस क्षेत्र में इस ग्रन्थ के प्रणयन का आधार बताता है। उक्त रचनाकार मरुभूमि और गुर्जरत्रा की परम्पराओं का भी अच्छा जानकार था।