भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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384 अपराजितपृच्छा भूधरं हेमकूटं च रत्नकूटं तृतीयकम् । त्रिषु लोकेषु विख्यातं पूज्यं सुरनरोरगैः ॥ २ ॥ इनमें भूधर, हेमकूट, रत्नकूट प्रकार के ये तीनों लोकों में देवताओं, मनुष्यों और नागों में पूज्य हैं। सहस्रैरधमं हस्तैर्मध्यं सार्धसहस्रकैः । द्विसहस्रैर्भवेज्ज्येष्ठं त्रिविधं हस्तसङ्ख्यया ॥ ३ ॥ जो नगर हजार गज के हों उन्हें अधम, डेढ़ हजार गज के हों उन्हें मध्यम और दो हजार गज के हो उन्हें ज्येष्ठ कहा जाता है। इस तरह गज संख्या के अनुसार तीन प्रकार के अधम, मध्यम और ज्येष्ठ नगर होते हैं। कनिष्ठं चाष्टभागैश्च मध्यं च दशभागतः । ज्येष्ठं द्विरष्टभागैश्च पदसङ्ख्या त्रिधोदिता ॥ ४ ॥ कनिष्ठ नगर के आठ भाग, मध्यम के दस भाग और ज्येष्ठ के सोलह भाग के अनुसार पद संख्या भी तीन तरह की होती है। चतुःषष्टिः कनिष्ठं च शतं मानं तु मध्यमम् । द्विशतं तु भवेज्ज्येष्ठं षट्पञ्चाशत्पदायतम् ॥ ५ ॥ इस तरह कनिष्ठ नगर के चौंसठ पद, मध्यम नगर के सौ पद और ज्येष्ठ नगर के दो सौ छप्पन पद का आयतन, विस्तार होता है। द्वात्रिंशद्धस्तमधमं द्विचत्वारिंशद्धिर्मध्यम् । ज्येष्ठं द्विपञ्चाशद्धस्तं गृहाणां तु प्रमाणतः ॥ ६ ॥ इसी तरह बत्तीस गज को अधम, बयालीस गज को मध्यम और बावन गज को ज्येष्ठ गृह का प्रमाण है। कनिष्ठं पञ्चशतकं मध्यं सार्धसप्तशतम् । सहस्र तु भवज्ज्येष्ठं गृहसङ्ख्या यथाक्रमात् ॥ ७ ॥ कनिष्ठ पाँच सौ का, मध्यम साढ़े सात सौ का और ज्येष्ठ एक हजार गज का- इस क्रमानुसार तीनों गृहों की संख्या होती है। कनिष्ठे नवर्मांश्च मध्यमे च त्रयोदश । कुर्याज्ज्येष्ठे सप्तदश मार्गसङ्ख्या प्रकीर्तिता ॥ ८ ॥ कनिष्ठ नगर के नौ मार्ग होते हैं, मध्यम नगर के तेरह और ज्येष्ठ नगर के सत्रह मार्ग संख्या कही गई है।