अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७० 385 एक-द्वि-त्रिक्रमात्प्रोक्ताश्छन्दाश्च विबुधैर्युताः। मर्त्यलोकेषु सम्प्राप्ताः स्वर्गपातालभूषणाः ॥ ९ ॥ एक, दो और तीन क्रम से विद्वान शिल्पशास्त्रियों ने छन्द कहे हैं जो मृत्युलोक, स्वर्गलोक और पाताललोक में भूषण रूप में माने गए हैं। चतुरश्रं समं क्षेत्रमायव्ययविशोधितम्। आदिगर्भं प्रकुर्वीत भुजकर्णविशोधितम् ॥ १०॥ चौकोर क्षेत्र को समतल करके उसके आय और व्यय को शोधित करें, फिर भुजाओं के कोनों से शोधित कर्ण रेखाओं से आदिगर्भ निश्चित करें। भाजयेदष्टभागांस्तु आयामं विस्तरं समम्। एकांशं च त्रिधा कृत्वा चोभयोश्च समन्ततः ॥ ११॥ तदनन्तर आयाम को आठ से भाग दें और उसी के समान विस्तार को भी आठ से भाग दें। फिर, जो एकांश आए उन्हें तीन-तीन भागों में दोनों के रख दें अर्थात् आयाम के तीन और विस्तार के तीन भाग होंगे। मध्यकोष्ठं परित्यज्य अष्टसद्मेश्च जायते ?। पूर्वापरे च द्वाराणां याम्यकौबेरसंस्थितौ ? ॥ १२ ॥ इस तरह मध्य कोष्ठ को छोड़ने पर आठ घर बन जाते हैं जिससे पूर्व-पश्चिम के द्वार और उत्तर-दक्षिण के द्वार बन जाते हैं। सर्वेषामीदृशं छन्दश्रुतुःषष्टिदेषु च। ब्रह्मस्थाने गृहाश्चैव पादानां च चतुष्टये ॥ १३ ॥ इसी तरह चौंसठ पदों के छन्दों में भी ऐसे ही बनते है, केवल उनके गृहों के ब्रह्मस्थान में चार पाद होते हैं। गृहाणां गृहसङ्ख्या च द्वात्रिंशद्भिः करैर्मता। ब्रह्मवंशयोर्द्वयोश्च चतुर्थांशकराः स्मृताः ॥ १४ ॥ उनमें गृहों की बत्तीस गज की गृह संख्या बनती है और ब्रह्म अंश के दो पद चतुर्थांश गज माने गए हैं। चत्वरे द्वादशमार्गांश्चत्वरे षोडशान्विताः। नवमार्गकृता सङ्ख्या निर्मिता विश्वकर्मणा ॥ १५॥ इनके चारों ओर बारह मार्ग और चारों ओर सोलह मार्ग या चारों और नौ मार्ग रखना चाहिए-इस संख्याक्रम को विश्वकर्मा ने निर्धारित किया है।