अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें386 अपराजितपृच्छा सीमा करसहस्रं तु आयामो विस्तरः समः। चतुःषष्टिपदं कुर्याद् ब्रह्मरन्ध्रप्रमाणतः ॥ 16 ॥ यदि क्षेत्र की सीमा एक हजार गज हो और आयाम भी उसके ही समान एक हजार गज का हो तो उसको भी चौंसठ पदों में विभाजित करें और उसमें भी ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् मध्य का रिक्त भाग प्रमाणानुसार ही रखें। नगरस्य केन्द्रे ब्रह्मप्रासादं — चतुर्मुखं चतुर्द्वारं चतुर्वक्त्रं पितामहम्। कुर्यान्नगरकेन्द्रे च प्रासादं कमलोद्भवम् ॥ 17 ॥ इस तरह का क्षेत्र विभाजन करके नगर के केन्द्र में कमलोद्भव ब्रह्मा का प्रासाद, मन्दिर को बनाएँ जिसके चारों और चार द्वार हो जो ब्रह्मा के चारों मुखों के दर्शन सुलभ करा सकें। चतुरो वरुणाद्यांश्च चतुर्दिक्षु यथाक्रमम्। महास्थानेषु चत्वाराश्चतुःकर्णेषु संस्थिताः ॥ 18 ॥ इसी तरह उस नगर के चारों दिशाओं में वरुणादि चारों देवों को स्थिति दें और क्रम से चारों कोनों के महास्थान में भी देवताओं के मन्दिर बनाएँ। सीमान्तेषु च सर्वेषु चतुःषष्ट्यादिसाधिते। प्राकार उत्तमः कार्यो नवहस्तैः समुच्छ्रितः ॥ 19 ॥ नगर के सभी सीमान्त भागों पर चौंसठ पदों के साधने के पश्चात् नौ गज ऊँची उत्तम दीवार या प्राकार बनाएँ। द्विहस्तोच्छ्रिता च कार्या त्रिगूढा कण्डवारणी। तत्तुल्योदयमाना कपिशीर्षैर्घनाकुला ॥ 20 ॥ उस प्राकार के ऊपर भी दो गज की ऊँचाई की त्रिगूढ़ा कण्डवारणी अर्थात् तीन खण्डो की डोली बनाएँ। उसमें दो गज की ही ऊँचाई के कंगूरे पास-पास बनाएँ। कर्णे कर्णे तु कर्त्तव्या वृत्ताट्टालकशोभना। (त्रि)सहस्रान्ते पुनः कुर्याद्योधविद्याधरीं तथा ॥ 21 ॥ इस परकोटे के प्राकार के प्रत्येक कोने के भाग में गोलाकार गुम्बद युक्त अट्टालिका शोभायमान करें। इसी तरह प्राकार के प्रति तीन हजार गज की दूरी पर पुनः योध विद्याधरी अर्थात बारहदरी बनाएँ।