भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-७० 387 तत्तद्भागप्रमाणेण कुर्यात् सिंहावलोकनम्। प्रतोलीनां तु चत्वारि चक्रद्वाराणि कल्पयेत् ॥ २२ ॥ उस बारहदरी में भी उसके उचित भाग प्रमाण से सिंहावलोकन अर्थात् गोखड़े, झरोखें बनाएँ। उस नगर की प्राकार में चार बड़ी-बड़ी पोलें बनाएँ। उनके सुदृढ़ चक्रद्वार अर्थात् घूमने वाले किंवाड़ बने हुए हों। अष्टौ सटक्क्या द्वाराणि प्रशस्तानि शुभानि च। खटक्की सर्वद्वारेषु कुर्यात् सोपानसञ्चयम् ॥ २३ ॥ इसी तरह प्रत्येक पोल के अलावा प्राकार के चारों दिशाओं में दो-दो खिड़की द्वार अर्थात् छोटे आवागमन के द्वार— इस तरह चारों और आठ द्वार भी बनाएँ जो प्रशस्त और शुभ माने गए हैं। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि इन सभी खिड़की द्वारों में छोटी खिड़की भी अवश्य रखें जिसमें से निकलने के लिए सीढ़ियाँ बनी हों ताकि उन पर चढ़कर खिड़की से आवागमन हो सके। रथमार्गोद्भवं शस्तं प्रतोलीषु प्रवेशनम्। कपाटाः सर्व