अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 423, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें378 अपराजितपृच्छा पाण्डुच्छन्दस्तथाचैव भूम्यूर्ध्वं शैलजाश्रितः। षष्णां तु छन्दसां प्रोक्तः सृष्टिकाले समुद्भवः ॥ 16 ॥ यदि गृह भूमि से ऊँचाई पर अर्थात् पहाड़ों पर बना हो तो उसे 'पाण्डुछन्द' नाम से जाना जाता है। इस तरह सृष्टि के समय छह प्रकार के छवाई या छादन बताए हैं। अथ हर्म्यादीनां — एकभौमं द्विभौमं वा हर्म्य स्याद्वा त्रिभौमकम्। पट्टच्छन्दादिका भेदा हर्म्यादिवेश्मसञ्ज्ञकाः ॥ 17 ॥ अब हर्म्य के बारे में कहता हूँ। हर्म्य अर्थात् हवेलियों के भवन, एक मंजिल से लेकर दो, तीन मंजिल वाले तक होते हैं। इनके पाटने और छवाई के भेद हर्म्यादि वेश्म नाम से कहे गए हैं। शालालिन्दक्रमच्छन्दे भेदा भिन्नास्तु षोडश। चतुरुत्तरशतानि ह्येकशालप्रकारकाः ॥ 18 ॥ शाला, आलिन्दों के क्रम भेद से सोलह प्रकार के भिन्न-भिन्न भेद होते हैं। एकशाल प्रकार से इनके एक सौ चार भेद हैं। गुणितास्ते दशशतैर्लक्षमेकमतः परम्। चत्वारि च सहस्राणि एकशालादिषु क्रमात् ॥ 19 ॥ उनको दस सौ (1000) से गुणित करने पर एक लाख से भी परे तक हो जाते हैं। एकशाल से क्रमिक वृद्धि करते-करते चार हजार तक के प्रकार हो जाते हैं। पट्टच्छन्दे यथा भेदाः शालालिन्दादितस्तथा। विपरीतास्तृणच्छन्दे षोडशैव प्रकीर्तिताः ॥ 20 ॥ पट्छन्दों अर्थात् पटावों के जितने भेद हैं और शाला तथा अलिन्दों के जितने भेद हैं, उनके विपरीत ही तृणछन्दों के पटाव भी सोलह प्रकार के कहे गए हैं। वाजिच्छन्दोऽधिकोच्छ्रायः पाण्डुर्हीनोदयात्मकः। चतुर्हस्तं फलकान्ते शेषच्छन्दाः प्रशंसिताः ॥ 21 ॥ वाजिछन्द नामक पटाव अधिक ऊँचा होता है, पाण्डुहीन पटाव उससे कुछ नीचा होता है; अन्य शेष पटाव सामान्यतः चार गज की ऊँचाई तक (फलकान्त) होते हैं, जो प्रशंसित माने गए हैं। द्विपञ्चाशद् द्विशालानां प्रत्येकं द्विसहस्रतः। स चतुःसहस्रं लक्षं द्विशालानां प्रकीर्तितम् ॥ 22 ॥