अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६९ ३७७ उस कोष्ठका (कोठे) में ऊपर से छत की छवाई कोठे के चार हाथ तक अर्थात् चार गज तक की जाए, उस छवाई को विद्वज्जन 'छाद्यक' कहते हैं। आच्छाद्यं तु यदा क्षेत्रमेकहस्ताच्छतार्धतः । आवेष्टितं खलीपाटं फलकं स्याद् गृहाङ्गणम् ॥ १० ॥ परन्तु, जब उसे एक हाथ से (गज माप से) लेकर पचास गज तक छवाई कर दें तो खलीपाट से आवेष्टित गृह के आङ्गन में फलक बन जाता है। प्राकारमाह — एक-द्वि-त्रिसहस्रैश्च हस्तैर्मानसमन्वितम् । नगरेषु तथावेष्टकूटप्राकारसञ्ज्ञितम् ॥ ११ ॥ यदि छवाई मान, माप एक, दो या तीन हजार गजों का हो तो उन नगरों में 'तथावेष्टकूट' प्राकार नाम दिया जाता है। अथ गृहं — चतुर्हस्तादितः क्षेत्रं शिरश्छाद्यं समोदये । पूर्वे चैकद्वारयुतं गृहसञ्ज्ञं तदुच्यते ॥ १२ ॥ चार गज तक के क्षेत्र को सिर की छवाई तक ऊँचा रखें, उसमें पूर्व की ओर एक द्वार रखें तो उसे 'गृह' नाम दिया गया है। एकद्वारं भवेद्वेश्म पूर्वापरद्वार निलयः । त्रिद्वारं करणं प्रोक्तं चतुर्भिश्चातुरं भवेत् ॥ १३ ॥ एक द्वार वाले गृह को 'वेश्म' कहते हैं। इसी तरह यदि वेश्म में तीन द्वार हो तो उसे 'करण' कहते हैं और यदि वेश्म के चार द्वार हो तो उसे 'चातुर' नाम दिया जाता है। षड्जात्युत्पन्नच्छन्दा भैदैर्भिन्ना द्विरष्टभिः₁₆ । इत्युक्तकमरूपाढ्या गृहसङ्ख्या त्वनेकधा ॥ १४ ॥ इस तरह छह प्रकार के जातियों से उत्पन्न गृहों के भिन्न-भिन्न सोलह भेद होते हैं। इस प्रकार के क्रम से गृहों के रूपों से अनेक संख्या में गृह बनते हैं। तृणपट्टौ छादने स्तः वाजिच्छन्दः शिलामयः । खण्डच्छन्दो गृहमध्ये पूर्णच्छन्दो ह्यधोगृहम् ॥ १५ ॥ तृण पट्टिका से छवाई वाले गृह को 'छादन' तथा शिलापट्टी से छवाई वाले गृह को 'वाजिछन्द' तथा गृह के मध्य भाग की छवाई वाले गृह को 'खण्डछन्द' तथा ऊपर नीचे तक की छवाई वाले गृह को 'पूर्णछन्द' नाम दिया जाता है।