भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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376 अपराजितपृच्छा बिन्दु वामा कृता रेखा वामावर्त्ते पूर्वोदिताः । पूर्वापरगतास्त्वेवं सृष्टिसञ्ज्ञाविधानकम् ? ॥ ४ ॥ इस नादबिन्दु के बायीं और होती हुई पूर्व से आरम्भ होने वाली रेखा को पूर्व से पश्चिम जाने से सृष्टि संज्ञा विधान अर्थात् सृष्टि नाम दिया गया। आश्रमवास्तु — ऐशान्या अग्निपर्यन्तमाश्रमं ¹वस्तुसम्भवम्। आश्रयन्ति समस्ताश्च जीवा महितचेतसः ॥ ५ ॥ ईशान कोण से अग्नि कोण तक 'आश्रम' नामक वास्तु बनता है। वहाँ समस्त जीव आश्रय ग्रहण करते हैं और निश्चित होकर अपने हित का चिन्तन करते हैं। अथालयमाह — आग्नेयां निर्ऋतिर्यावत् सदा सृष्टिर्विनश्यति । इत्थमालयसञ्ज्ञा स्यात् सृष्टितोऽयं समुद्भवः ॥ ६ ॥ आलयः सर्वसत्त्वानां सर्वभूतात्मनां हितः। तदेवं लीयते सर्वमालयादिसमुद्भवम् ॥ ७ ॥ अब आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण) से नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) तक सदा सृष्टि का विनाश होता है। इनको 'आलय' नाम दिया गया है, जो यहाँ सृष्टि में उत्पन्न होता है। यह आलय भी सभी प्राणियों, सभी सत्त्वों और उनके हितों की रक्षा करता है, उसी तरह से सभी आलय आदि में सब लीन हो जाते हैं। कोष्ठका — नैर्ऋत्यनिलसम्भूता सृष्टिस्त्वेवं समुद्गता। कोष्ठकाभिधानमेतत् चतुरश्रीकृतं शुभम् ॥ ८ ॥ इसके बाद, नैर्ऋत्य से लेकर वायव्य दिशा तक जो सृष्टि बनती है उसका नाम 'कोष्ठका' है, वह चौकोर और शुभ है। छाद्यकं — आच्छादितं तथा चोर्ध्वं तच्च कोष्ठभिधानकम्। कोष्ठकं चतुर्हस्तान्तमाच्छाद्यं छाद्यकं विदुः ॥ ९ ॥

  1. मय ने वास्तु की अपेक्षा 'वस्तु' नामाभिधान ही दिया है। वस्तु ही मूल है। वस्तु से होने वाला पदार्थ वास्तु कहा जाता है। पृथ्वी प्रथम वस्तु है। इसके बाद प्रासाद, यान व शयनादि भी वास्तु की श्रेणी के अन्तर्गत है— अमर्त्याश्चैव मर्त्याश्च यत्र यत्र वसन्ति हि। तद्वस्त्विति मतं तज्ज्ञैस्तद्भेदांश्च वदाम्यहम् ॥ भूप्रासाद्यानानि शयनं च चतुर्विधम्। भूरेव मुख्यवस्तु स्यात्तत्र जातानि यानि हि ॥ (मयमतम् 2, 1-2)