अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६९ ३७५ कर्णस्थ अङ्कों के श्षेष से जो अङ्क बने उसको क्रमवार कोष्ठक में लिखे। चाही गई अङ्क संख्या भद्र संख्या के मध्य में इनको रखने से कर्ण श्षेष से मूषिका न आ जाए, इस प्रकार एकादि और द्विगुणादि अंक संख्याओं से मूषाक्रम विन्यास का बोध होता है। इच्छित भवन के आने-जाने के मार्ग की मूषा के अङ्क से एक युति निर्मित संख्या बनती है। इसका यह आशय भी है कि इस रचना में मात्र अलिन्दों का ही ज्ञान नहीं होता है अपितु गृह में मूषा अर्थात् अवलोकन, गवाक्षों का अवबोध भी होता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां षट्छन्दनिर्णयाधिकारो नामाष्टषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६८ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में षट्छन्द निर्णय अधिकार नामक अड़सठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥ गृहोत्पत्तिहर्म्यादिराजप्रासादनिर्णयो नामैकोनसप्ततितमं सूत्रम् ॥ ६९ ॥ विश्वकर्मोवाच — अथेदानीं प्रवक्ष्यामि गृहस्योत्पत्तिलक्षणम्। उत्पद्यते यथात्वाद्वयं गृहादीनां तु सम्भवम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने अपराजित से आगे कहा कि अब मैं यहाँ गृहोत्पत्ति के लक्षण कहता हूँ। अस्तु, गृहों के निर्माण की, सभी उत्पत्तियों को आदि से कहता हूँ। घटिकानादोत्पत्ति प्रसङ्गं — आचायैर्द्दिव्यज्ञानैश्च पूर्वानतपद्मासनैः। षडिका ( घटिका ? ) याम्यहस्तेषु त्रिपातहस्तोद्धृता ? ॥ २ ॥ षडिका संस्थिता पृथ्वी तत्र नाद्यबिन्दूद्भवः ?। बिन्दुलया शिखा ज्ञेया सा सृष्टिश्चैवमुद्भवः ? ॥ ३ ॥ पूर्वकाल में पद्मासन में बैठे हुए आचार्य ने दिव्यज्ञान को प्राप्त किया था। उन्होंने बायें हाथ में घटिका ली और उसे नीचे से हाथ धर के ऊपर को उठाया ? जब घटिका भूमि पर रखी तो नादबिन्दु उपजा। उस बिन्दु लय को शिखा कहते हैं, वही सृष्टि के समुद्भव का कारण है ? यावदिष्टमूषाक्रमव्युपहितेष्वथ तेषु विद्यात्। उद्दिष्टवेश्मकृतनिर्गममार्गमूषासत्काङ्कसैकयुतिनिर्मित- सङ्ख्यमोक ॥ (समराङ्गण. 26, 78-80)