भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-६८ ३६७ वेदाश्रादि पीठिकाः — वेदाश्रा वर्तुलाख्या त्रिकोणा तु षडंशका। वेदिका पद्मका चैव पीठिका मेरुच्छन्दतः ॥ २० ॥ चतुरस्र, वर्तुल, त्रिकोण, षट्कोण, वेदिका, पद्मका जैसी पीठिकाएँ भी मेरुछन्द से चली हुई हैं। अथार्चा — सीमा गर्भस्तथा द्वारं तलकोर्ध्वविभक्तिकम्। अर्चा च षड्विधा प्रोक्ता मेरुच्छन्दसमुद्भवा ॥ २१ ॥ सीमा, गर्भ, द्वार, तलक, ऊर्ध्व, विभक्तिक— ये अर्चा भी छह प्रकार की कही गई हैं जो मेरुछन्द से ही बनती हैं। नगरादीनां — नगरं च पुरं ग्रामः खेटः कूटश्च कर्वटः। एते च षड्विधा ज्ञेया मेरुच्छन्दविनिर्गताः ॥ २२ ॥ इसी प्रकार नगर, पुर, ग्राम, खेट, कूट, कर्व्वट— ये छहों भी मेरुछन्द से बने कहे गए हैं। जलस्रोतादीनां — वापीकूपतडागं च रथयन्त्रचक्रादिकम्। प्रयुक्तं मेरुच्छन्देषु वास्तुविद्भिरुदाहृतम् ॥ २३ ॥ वापी, कूप, तड़ाग, रथ, यन्त्र, चक्रादिक— ये भी सब छहों वास्तुविदों ने मेरुछन्द से ही बने कहे हैं। वेदीसिंहासनं छत्रं शय्याकवचमायुधम्। वास्तुवेदे समाख्यातं मेरुच्छन्दसमुद्भवम् ॥ २४ ॥ वेदी (बाजोट), सिंहासन, छत्र, शय्या, कवच, आयुध— इन छहों को भी वास्तुवेद में मेरुछन्द से बने कहा गया है। रथवीथ्यन्तरमार्गाश्च षट् पन्थान एव च। प्रयुक्ता वास्तुविद्भिश्च मेरुच्छन्दसमुद्भवाः ॥ २५ ॥ इति छन्दादिनिकाशसङ्ख्याधिकारः। रथवीथिका, अन्तरमार्ग और अन्य षट् पन्थान (भ्रमर, पुर, प्राकार, तोरण, अट्ट, अट्टालक व संबाध- ये षट्पद) आदि भी वास्तुविदों ने मेरुछन्द से बने कहा है।