अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें368 अपराजितपृच्छा मेरुच्छन्दवर्णनं — पृथ्व्याकारो यथा छन्दो मेर्वाकारसमुद्भवः । षड्विधं मेरुच्छन्दश्च षडत्रिंशच्छन्दभेदकाः ३६ ॥ २६ ॥ पृथ्वी के आकार का जो छन्द है वह भी मेरु के आकार से ही बना है। इस तरह मेरुछन्द छह प्रकार का होता है जिसके भी छत्तीस भेद के छन्द होते हैं। भेदैस्तत्र त्र्यष्टशतैर्दशभिर्गुणितेस्ततः । चतुर्विंशत्सहस्त्राणि छन्दभेदाश्च सङ्ख्यया ॥ २७ ॥ इन भेदों से भी चौबीस सौ के दशगुणे अर्थात् चौबीस हजार (24000) छन्दों के भेदों की संख्या बन जाती है। इन्द्रोद्भवक्षमावृद्धी भूतकोणान्तमध्यमैः ? । इषु प्राणेषु भक्षन्ती प्रत्येकविषमेपदम् ? ॥ २८ ॥ इन्द्रोद्भव, क्षमावृद्धि, पञ्चकोण, अन्त और मध्यम पञ्चप्राणों (संभवतः 14 से आरम्भ कर एक की शुद्धि करते हुए ?) से भक्षण.. प्रत्येक विषम पदस्थ होने पर ? षड्भिर्नभशब्दैः¹ कोटिमेरुच्छन्दे तु सङ्ख्यया । तत्रोक्तमेवप्रमाणं सृष्टाऽम्भोजप्रकाशिना ॥ २९ ॥ नाभिकमल से उद्भूत सृष्टा ब्रह्माजी ने तीन सौ साठ कोटि (षड्भि₆र्नभ₀शब्दैः₃ कोटिमेरु ?) मेरुछन्द संख्या वाले ये सब प्रमाण सहित प्रकाशित किए हैं। मेरुर्मेरूपमः कार्यः शरावस्येव चाकृतिः । सृष्टिस्तदुद्भवा सूत्र पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ ३० ॥ मेरु को मेरु रूप में ही करना चाहिए। उसकी आकृति शराव (सकोरे) के समान होती है। सारी सृष्टि उसी मेरु से उत्पन्न हुई है और ऐसे प्रतीत होती है जैसे कि घड़े पर घड़ा रखा गया हो। षट् छन्दभेदाः — मेरुश्च खण्डमेरुश्च पताका सूचिका तथा । उद्दिष्टं नष्टमिति षट् छन्दांसीह प्रचक्षते ॥ ३१ ॥ परम्परा में 1. मेरु, 2. खण्डमेरु, 3. पताका, 4. सूचिका, 5. उद्दिष्ट और 6. नष्ट—ये छह छन्द कहे गए हैं।²
- 'षड्भिर्नभशब्दैः' इति प्रकाशित पाठः। यहाँ ब्रह्मा के किसी आद्यशास्त्र का वर्णन है। बृहत्संहिता के वास्तुविद्याध्याय में वराहमिहिर ने 'कमलभवान्मुनिपरम्परायातम्' कहकर इसकी ओर सङ्केत किया है।
- नारदपुराण के पूर्वभाग के द्वितीय पादस्थ अध्याय 57 और गरुडपुराण के 212वें अध्याय में छन्दशास्त्र