अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें370 अपराजितपृच्छा अङ्कभिः पूरयेत् पश्चाद् यावत् सर्वहतं पदम् ॥ 35 ॥ पहला गुरु है। उसके नीचे ह्रस्व या लघु हो, पुनः जो शेष बचे वह ऊपर हो, इनको अङ्कों से बाद में पूरा करें जब तक कि सभी पद गुणित न हो जाए। गुरोरधस्ताच्च गुरुं निधाय शेषं समानं परिलक्ष्य सम्यक्। खण्डं प्रकुर्याद् गुरुपूरणार्थं यावत्पदं सर्वलघुस्थमेते ॥ 36 ॥ गुरु के नीचे गुरु रखें, शेष को ठीक तरह से समान परिलक्ष्य करें। गुरु पूरण हेतु उसके खण्ड करते जाएँ जब तक कि सभी लघुत्व तक न पहुँच जाएँ। भवन्ति प्रस्तारगताश्च ¹एते षट् सप्तमीप्रत्यय वै गृहाणाम् ?। ये नैव जानन्ति गुरुपदिष्टान् ते सूत्रधारा रिपवः प्रजानाम् ॥ 37 ॥ इस तरह प्रस्तार करते जाने से— (छियोत्तर प्रत्यय ?) गृहों के बनते हैं, इस गणित को जो गुरु के उपदेश से नहीं जानते, उन सूत्रधारों को प्रजाजनों का शत्रु ही मानना चाहिए। एकाद्येकोत्तरान् कोष्ठान् विन्यसेदिच्छयात्मनः। आद्यादारभ्य तद्वृद्धिर्यथास्यात्पार्श्वयोः समम् ॥ 38 ॥ एक से एक उत्तर कोष्ठों को अपनी इच्छानुसार न्यसित करें। पहले से आरम्भ करके फिर उसे बढ़ाते हुए सभी दोनों पास वालों को एक जैसा समान बनाएँ। मेरोरेकाधिका सङ्ख्या शरावस्येव चाकृतिः। प्रथमे कोष्ठके रूपमन्तं यावच्च पार्श्वयोः ॥ 39 ॥ मेरु की एक से अधिक संख्या होती है और उनकी आकृति शराव (सकोरे) के समान है। प्रथम कोष्ठक का जो स्वरूप है, वह अन्त तक होगा और इसमें पार्श्ववर्ती के आकार को भी वैसा ही करना चाहिए। आसनोध्र्वस्थयोर्न्स्येन्मध्ये सङ्कलितं पृथक्। तस्मिन्निष्टविकल्पानां सङ्ख्या स्यादन्त्यपङ्क्तिगा ॥ 40 ॥ इति मेरुछन्दः। यह स्मरणीय है कि ऊर्ध्वस्थित इन दोनों के मध्य में अलग सङ्कल्पित स्वरूप
- यह श्लोक ग्रन्थान्त के 236वें सूत्र में त्रुटितपाठ के रूप में जुड़ गया है : (चत्वार आद्यास्सुरवेश्मनां च) कर्तारएवामरवेश्मनां च दक्षाअपि प्रत्ययकान् षडेतान्। ये वै न जानन्ति गुरुपदिष्टास्ते सूत्रधारा रिपवः प्रजानाम्॥ यह माना जाए कि इन छन्दों में से आरम्भ के चार छन्द देवताओं के लिए मंदिरों हेतु होते हैं। कर्ता को इन छहों की गणित में दक्ष होना चाहिए। गुरु के उपदेश से जो इनका ज्ञान नहीं रखते, वे मानों जनता के वैरी ही सिद्ध होते हैं।