अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
370 अपराजितपृच्छा अङ्कभिः पूरयेत् पश्चाद् यावत् सर्वहतं पदम् ॥ 35 ॥ पहला गुरु है। उसके नीचे ह्रस्व या लघु हो, पुनः जो शेष बचे वह ऊपर हो, इनको अङ्कों से बाद में पूरा करें जब तक कि सभी पद गुणित न हो जाए। गुरोरधस्ताच्च गुरुं निधाय शेषं समानं परिलक्ष्य सम्यक्। खण्डं प्रकुर्याद् गुरुपूरणार्थं यावत्पदं सर्वलघुस्थमेते ॥ 36 ॥ गुरु के नीचे गुरु रखें, शेष को ठीक तरह से समान परिलक्ष्य करें। गुरु पूरण हेतु उसके खण्ड करते जाएँ जब तक कि सभी लघुत्व तक न पहुँच जाएँ। भवन्ति प्रस्तारगताश्च ¹एते षट् सप्तमीप्रत्यय वै गृहाणाम् ?। ये नैव जानन्ति गुरुपदिष्टान् ते सूत्रधारा रिपवः प्रजानाम् ॥ 37 ॥ इस तरह प्रस्तार करते जाने से— (छियोत्तर प्रत्यय ?) गृहों के बनते हैं, इस गणित को जो गुरु के उपदेश से नहीं जानते, उन सूत्रधारों को प्रजाजनों का शत्रु ही मानना चाहिए। एकाद्येकोत्तरान् कोष्ठान् विन्यसेदिच्छयात्मनः। आद्यादारभ्य तद्वृद्धिर्यथास्यात्पार्श्वयोः समम् ॥ 38 ॥ एक से एक उत्तर कोष्ठों को अपनी इच्छानुसार न्यसित करें। पहले से आरम्भ करके फिर उसे बढ़ाते हुए सभी दोनों पास वालों को एक जैसा समान बनाएँ। मेरोरेकाधिका सङ्ख्या शरावस्येव चाकृतिः। प्रथमे कोष्ठके रूपमन्तं यावच्च पार्श्वयोः ॥ 39 ॥ मेरु की एक से अधिक संख्या होती है और उनकी आकृति शराव (सकोरे) के समान है। प्रथम कोष्ठक का जो स्वरूप है, वह अन्त तक होगा और इसमें पार्श्ववर्ती के आकार को भी वैसा ही करना चाहिए। आसनोध्र्वस्थयोर्न्स्येन्मध्ये सङ्कलितं पृथक्। तस्मिन्निष्टविकल्पानां सङ्ख्या स्यादन्त्यपङ्क्तिगा ॥ 40 ॥ इति मेरुछन्दः। यह स्मरणीय है कि ऊर्ध्वस्थित इन दोनों के मध्य में अलग सङ्कल्पित स्वरूप
- यह श्लोक ग्रन्थान्त के 236वें सूत्र में त्रुटितपाठ के रूप में जुड़ गया है : (चत्वार आद्यास्सुरवेश्मनां च) कर्तारएवामरवेश्मनां च दक्षाअपि प्रत्ययकान् षडेतान्। ये वै न जानन्ति गुरुपदिष्टास्ते सूत्रधारा रिपवः प्रजानाम्॥ यह माना जाए कि इन छन्दों में से आरम्भ के चार छन्द देवताओं के लिए मंदिरों हेतु होते हैं। कर्ता को इन छहों की गणित में दक्ष होना चाहिए। गुरु के उपदेश से जो इनका ज्ञान नहीं रखते, वे मानों जनता के वैरी ही सिद्ध होते हैं।
सूत्र-६८ 371 हो जाता है, पुनः इच्छित क्रिया-परिकल्पनाओं की वैकल्पिक संख्या अन्त की पङ्कि , में मिल जाती है।¹ अथ खण्डमेरु वर्णनं — खण्डमेरुं तु विन्यस्येत् तद्वदेवैकपार्श्ववतः । प्रवृद्धैः कोष्ठकैस्तत्राप्यङ्काः प्राग्वत् फलं यथा ॥ 41 ॥ अब खण्डमेरु के लिए कहते हैं कि उसी प्रकार से पार्श्व से खण्डमेरु का विन्यास करना चाहिए। उसके कोष्ठक प्रवृद्ध हों और अङ्क दूसरी पङ्कि में छोर तक, पहलों में शून्य रखें और अन्य कोष्ठों में भी पूर्व की भाँति, फल में भी वैसा ही करें। तथा चान्यं खण्डमेरु (पताकाच्छन्दश्च) — अथापरः खण्डमेरुः कोष्ठांस्तत्रेष्टसङ्ख्यया । कृत्वैकापचितान् वामविभागापचितानधः ॥ 42 ॥ इसके उपरान्त, दूसरे खण्डमेरु के विषय में कहा जा रहा है। वहाँ पर कोष्ठों को आठ की संख्या में रखना चाहिए। इस प्रकार इसमें नीचे से ऊपर कोष्ठ आठ होते हैं। इसके बाद (सम्भवतः पताका छन्दार्थ) एक-एक कम करते हुए नीचे के बायें भागों में भी कमी करते जाएँ। एकाद्येकोत्तरानङ्कानाद्यपङ्क्तौ निवेशयेत् । अन्यासु पङ्क्तिष्वाप्रान्तं शून्यानाद्येषु कल्पयेत् ॥ 43 ॥ द्वितीयेषु च कोष्ठेषु तासामेकैकं साधयेत् । द्वितीयायां तृतीयादिकोष्ठकेषु यथाक्रमम् ॥ 44 ॥ विकर्णयोगजानन्यानूर्ध्वाधोयोगसम्भवान् । फलं विकर्णयोगात्थमेकस्मिन् परिकल्पयेत् ॥ 45 ॥²
- यह मत समराङ्गणसूत्रधार से प्रेरित है। इसे इस तरह भी स्पष्ट किया जा सकता है—आगे से आगे एक एक कोष्ठों को इच्छानुसार विन्यसित करें, आदि से प्रारम्भ कर तदनन्तर बढ़ते जाएँ, जब तक दोनों पार्श्वों का एक समान सम्पादन हो जाए तब मेरुछन्द निष्पन्न होता है। मेरु की एक से अधिक संख्या होती है और शराव के सदृश्य उसकी आकृति होती है। प्रथम कोष्ठ का जो रूप होता है, वही पार्श्वों का रूप बन जाता है। ऊर्ध्वस्थित इन दोनों के मध्य में पृथक् सङ्कलित रूप हो जाता है, दुबारा इच्छित क्रिया कल्पनाओं की संख्या अन्तिम पङ्क्ति से संयुक्त हो जाती है— एकाद्येकोत्तरान् कोष्ठान् विन्यसेदिच्छयात्मनः। आद्यादारभ्य तद्वृद्धिर्यथा स्यात् पार्श्वयोः समम्॥ मेरोरेकाधिका सङ्ख्या शरावस्येव चाकृतिः। प्रथमे कोष्ठके रूपमन्तं यावच्च पार्श्वयोः॥ आसनोर्ध्वस्थयोर्नास्येन्मध्ये सङ्कलितं पृथक्। तस्मिंस्त्रिंशद्विकल्पनां सङ्ख्या स्यादन्त्यपङ्क्तिगा॥ (समराङ्गण. 26, 61-63)
- ये श्लोक ज्यों के त्यों समराङ्गण. में आए हैं— खण्डमेरुं तु विन्यस्येत् तद्वदेवैकपार्श्वतः। प्रवृद्धैः कोष्ठकैस्तत्राप्यङ्काः प्राग्वत् फलं तथा॥ अथापरः खण्डमेरुः कोष्ठांस्तत्रेष्टसङ्ख्यया। कृत्वैकापचितान्
372 अपराजितपृच्छा इति खण्डमेरुः ?। एक से आरम्भ करके उनके बाद के अङ्कों को पहली पङ्क्ति में रखें, दूसरों को पङ्क्ति के किनारे आदि से शून्यों की कल्पना करें। दूसरे कोष्ठक में भी उनको एक- एक करके, दूसरे को तीसरे कोष्ठक में क्रमशः रखते जाएँ। अब विकर्ण का योग जानने हेतु और ऊपर नीचे के योग लाने के लिए विकर्ण योग के फल को एक जगह कल्पित कर लेना चाहिए। इसका आशय है कि एक जिनके आरम्भ में है और एक ही जिनके अन्त में है, इस प्रकार के अङ्कों की पहली पङ्क्ति में रखें। इसमें भी यही क्रिया करें, पुनः तृतीय आदि कोष्ठकों में क्रमशः विकरण-योग से उत्पन्न या ऊर्ध्वाध योग से उत्पन्न अन्य अङ्कों का विन्यास करें। पुनः विकरण-योग से उत्पन्न फल की एक कोष्ठ में प्रकल्पना करें। एकाधिकानभीष्टायाः सङ्ख्यायास्तिर्यगालिखेत्। कोष्ठोनेतांश्च रूपादींस्तन्मध्ये द्विगुणोत्तरान् ॥ 46 ॥ एकोनं पृष्ठतस्तेषामेकं द्विगुणमग्रतः। नातिक्रमेत् परां सङ्ख्यां पताकाछन्द उच्यते।¹ गृहमालायुक्ताख्यातं पताकानामकं विदुः ॥ 47 ॥ इति पताकाछन्दः। एक से अधिक जब अभीष्ट हो तो उन संख्याओं को तिरछे लिखें। इन कोष्ठों को रूपादि मध्य दुगुणे करते जाएँ, एक के पीछे एक रखते हुए आगे वालों को दुगुना करते जाए। अब संख्या का अतिक्रमण न करें तो इसे 'पताका' छन्द कहते हैं। इसी को विद्वज्जन 'गृहमाला' नाम से भी पताका छन्द कहते हैं। आशय यह है कि अभीष्ट संख्या को एक से अधिक तिरछे लिखें। मध्य में दुगुने-दुगुने अन्तः कोष्ठ-रूपादि का न्यास करें। उनमें से पीछे एक संख्या कम करें और अग्रतः एक को दुगुना कर यदि परा संख्या का अतिक्रमण न हो तो पताका-छन्द होता है। वामविभागाचितानधः॥ एकाद्येकोत्तरानङ्गानाद्यपङ्क्तौ निवेशयेत्। अन्यासु पङ्क्तिष्वाप्रान्तं शून्यान्या(ना)द्येषु कल्पयेत्॥ द्वितीयेषु च कोष्ठेषु तासामेकैकमावयेत्। द्वितीयायां तृतीयादिकोष्ठकेषु यथाक्रमम्॥ विकर्णयोगजानन्यानूर्ध्वाधोयोगसम्भवान्। फलं विकर्णयोगोत्थमेकस्मिन् परिकल्पयेत्॥ (समराङ्गण. 26, 64-68)
- ये श्लोक ज्यों के त्यों समराङ्गण. में आए हैं— एकाधिकानभीष्टयाः सङ्ख्यायास्तिर्यगालिखेत्। कोष्ठानेकांश्च (तांश्च) रूपादींस्तन्मध्ये द्विगुणोत्तरान्॥ एकोनं पृष्ठतस्तेषामेकं द्विगुणमग्रतः। नातिक्रमेत् परां सङ्ख्यां पताकाछन्द उच्यते॥ (समराङ्गण. 26, 69-70)
सूत्र-६८ 373 अथ सूचीछन्दः — तद्दिनेष्टाद्यगा सङ्ख्येत्येकाद्यैस्तैस्ततो गृहे। न्यस्ताङ्कसङ्ख्याः सङ्ख्याः ¹गुरुलघ्वाद्यैः प्रकल्पिताः ॥ 48 ॥ अब सूचीछन्द के विषय में कहा जा रहा है। इसी प्रकार नेष्टाद्य संख्या को भी एक के बाद एक गृह में रखते जाए, उन अङ्क संख्या के न्यस्त रखने पर संख्या गुरु और लघु आदि प्रकल्पित होती है। एकैकमिष्टस्थानेषुः लिखेत् सैकेष्वतः( सैकेश्वतः! ) परम्। अन्त्याहृते पूर्वपूर्वयुक्तेनायोजयेत् परम् ॥ 49 ॥ एक-एक को इष्टस्थान पर लिखते जाए और एक से आगे अन्त तक पहली- पहली युक्ति अनुसार जोड़ते जाए अर्थात् पुनः अन्त की छोड़कर पहले-पहले वाली को दूसरी-दूसरी से मिलाएँ। अन्त्यादारभ्यं तद्भानावेकाद्येषु च पर्यायत्। अलिन्दादिषु यत्र स्यात् सङ्ख्या सूचीं तु तां विदुः ॥ 50 ॥² इति सूचीछन्दः। इसी प्रकार अन्त से पुनरारम्भ कर पीछे लौटे, जहाँ पर पर्याय से अलिन्द आदि की रचना में यह संख्या निकले, उसे विद्वानों ने सूचीछन्द कहा है। अथोद्दिष्टछन्द नष्टच्छन्दश्च — उद्दिष्टे स्थापयेत् सङ्ख्यामुद्दिष्टं सम्भजेच्च ताम्। दलयेद् रूपयुक्तां तु दलयेन्नाम सम्भवेत् ॥ 51 ॥ लघुस्वरूपदलने सैकार्धे करणे गुरुः। यावदिष्टपदाप्तिः स्याल्लघवोऽलिन्दकोदयः ॥ 52 ॥³
- समराङ्गण में यहाँ पाठ है—'स्युलिन्दाद्यैः प्रकल्पिताः।' इसका आशय होगा कि उसको छोड़कर पहली आदि इष्ट संख्याओं से अंक-विन्यास वाली संख्याओं को अलिन्दों से प्रकल्पित कर एक-एक को इष्ट स्थानों में रखें।
- ये श्लोक भी ज्यों के त्यों समराङ्गण. में मिलते हैं—तद्दिनेष्टाद्यगा सङ्ख्येत्येकाद्यैस्तैस्ततो गृहे। न्यस्ताङ्कसङ्ख्याः सङ्ख्याः स्युरलिन्दाद्यैः प्रकल्पिताः॥ एकैकमिष्टस्थानेषु लिखेत् सैकेश्वतः परम्। अन्त्याद(ह)ते पूर्वपूर्वयुक्तेनायोजयेत् परम्॥ अन्त्यादारभ्य तद्भानावेकाद्येषु च पर्यायत्। अलिन्दादिषु यत्र स्यात् सङ्ख्या सूचीं तु तां विदुः॥ (समराङ्गण. 26, 71-73)
- ये श्लोक भी समराङ्गण. में इसी रूप में हैं—उद्दिष्टे स्थापयेत् सङ्ख्यामुद्दिष्टं सम्भवे(जे)च्च ताम्। दलयेद् रूपयुक्तां तु दलयेन्नाम सम्भवेत्॥ लघुस्वरूपदलने सैकार्धे करणे गुरुः। यावदिष्टपदाप्तिः स्याल्लघवोऽलिन्दकोदयः॥ (समराङ्गण. 26, 74-75)
374 अपराजितपृच्छा इसी प्रकार उद्दिष्टछन्द के क्रम में इष्ट संख्या को स्थापित करें, पुनः उसको समान रूप से विभाजित करे। रूप वाली संख्या लघु स्वरूप के दलन में आधे सहित एक में जब गुरु बन जाए और इष्टपद की प्राप्ति हो जाए और सारे लघु हो जाए तब अलिन्द का उदय होता है अर्थात् लघु स्वरूप में बाँटने पर आधे गुरु करते हुए जब तक इष्ट पद न आए तब तक लघु अलिन्द बनते जाएँगे। कृत्वा छन्दः समुद्दिष्टं तदन्ते लघुनि द्विकम्। न्यसेदेकं गुरूणां च द्विगुणं द्विगुणं ततः॥ 53॥ व्यत्ययाल्लघुनः स्थाने द्विगुणादेककं गुरोः। कुर्यात् तमाद्यस्थानाङ्कसङ्ख्यं नष्टे गृहं भवेत्॥ 54॥¹ इत्युद्दिष्टनष्टछन्द। इसी प्रकार चाहा गया छन्द करके उसके अन्त में दो लघु रखें फिर एक गुरु रखे फिर उनको दुगुना-दुगुना करते जाए। फिर लघु के स्थान पर दुगुने युक्त को परस्पर रखे फिर उसको आद्य संख्या स्थान तक ले तो इसे नष्ट गृह कहते हैं। आशय यह है कि छन्द को समुद्दिष्ट करके अन्त लघु में एक जोड़ा न्यस्त करें, फिर दुगुना-दुगुना गुरुओं को विन्यास कर फिर इस क्रिया को पलट दे, लघु के स्थान में एक गुरु रखे तो नष्ट में आदि संख्या वाला गृह कहलाता है। प्राक्स्यैकं कोष्ठमेकैकवृद्ध्या न्यस्येदूर्ध्वं पङ्क्त्यो यावदिष्ट्राः। इष्टानेकार्दींलिखेदानुपूर्व्या कर्णेनाधः शून्यरूपे च दद्यात्॥ 55॥ कोष्ठक में एक रखकर एक-एक कोष्ठक में वृद्धि करते जाए; यह ऊपर की पङ्क्ति में रखते जाएँ जब तक की इष्ट की प्राप्ति न हो जाए, एकादि से इष्टों को लिखकर अनुपूर्व कर्ण के नीचे शून्य रूप में लिखें। कर्णस्थाङ्कश्लेषतोऽङ्के भवेद् यस्तं विन्यस्येत् कोष्ठकेषु क्रमेण। उद्दिष्टाङ्को भद्रसङ्ख्यानि मध्ये याभ्यः कर्णश्लेषतो मूषिकास्ताः॥ 56॥ एकादिषु द्विगुणितेष्विहः यावदिष्टमूषाक्रमव्युपहितेष्वथ तेषु विद्यात्। उद्दिष्टवेश्मकृतनिर्गममार्गमूषासत्काङ्कसैकयुतिनिर्मितसङ्ख्यमोकः॥ 57॥²
- तुलनीय- कृत्वा छन्दः समुद्दिष्टं तदन्ते लघुनि द्विकम्। न्यसेदेकं गुरूणां च द्विगुणं द्विगुणं ततः॥ व्यत्ययाल्लघुनः स्थाने द्विगुणादेककं गुरोः। कुर्या तमाद्यस्थानाङ्कसङ्ख्यं नष्टे गृहं भवेत्॥ (समराङ्गण. 26, 76-77)
- ये श्लोक समराङ्गणकार के हैं। तुलनीय- प्राक्स्यैकं कोष्ठमेकैकवृद्ध्या न्यस्येदूर्ध्वं पङ्क्तयो यावदिष्ट्राः। इष्टानेकादींलिखेदानुपूर्व्या कर्णेनाधः शून्यरूपे च दद्यात्॥ कर्णस्थाङ्कश्लेषतोऽङ्के भवेद् यस्तं विन्यस्येत् कोष्ठकेषु क्रमेण। उद्दिष्टाङ्को भद्रसङ्ख्यानि मध्ये याभ्यः कर्णश्लेषतो मूषिकास्ताः॥ एकादिषु द्विगुणितेष्विह
सूत्र-६९ ३७५ कर्णस्थ अङ्कों के श्षेष से जो अङ्क बने उसको क्रमवार कोष्ठक में लिखे। चाही गई अङ्क संख्या भद्र संख्या के मध्य में इनको रखने से कर्ण श्षेष से मूषिका न आ जाए, इस प्रकार एकादि और द्विगुणादि अंक संख्याओं से मूषाक्रम विन्यास का बोध होता है। इच्छित भवन के आने-जाने के मार्ग की मूषा के अङ्क से एक युति निर्मित संख्या बनती है। इसका यह आशय भी है कि इस रचना में मात्र अलिन्दों का ही ज्ञान नहीं होता है अपितु गृह में मूषा अर्थात् अवलोकन, गवाक्षों का अवबोध भी होता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां षट्छन्दनिर्णयाधिकारो नामाष्टषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६८ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में षट्छन्द निर्णय अधिकार नामक अड़सठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥ गृहोत्पत्तिहर्म्यादिराजप्रासादनिर्णयो नामैकोनसप्ततितमं सूत्रम् ॥ ६९ ॥ विश्वकर्मोवाच — अथेदानीं प्रवक्ष्यामि गृहस्योत्पत्तिलक्षणम्। उत्पद्यते यथात्वाद्वयं गृहादीनां तु सम्भवम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने अपराजित से आगे कहा कि अब मैं यहाँ गृहोत्पत्ति के लक्षण कहता हूँ। अस्तु, गृहों के निर्माण की, सभी उत्पत्तियों को आदि से कहता हूँ। घटिकानादोत्पत्ति प्रसङ्गं — आचायैर्द्दिव्यज्ञानैश्च पूर्वानतपद्मासनैः। षडिका ( घटिका ? ) याम्यहस्तेषु त्रिपातहस्तोद्धृता ? ॥ २ ॥ षडिका संस्थिता पृथ्वी तत्र नाद्यबिन्दूद्भवः ?। बिन्दुलया शिखा ज्ञेया सा सृष्टिश्चैवमुद्भवः ? ॥ ३ ॥ पूर्वकाल में पद्मासन में बैठे हुए आचार्य ने दिव्यज्ञान को प्राप्त किया था। उन्होंने बायें हाथ में घटिका ली और उसे नीचे से हाथ धर के ऊपर को उठाया ? जब घटिका भूमि पर रखी तो नादबिन्दु उपजा। उस बिन्दु लय को शिखा कहते हैं, वही सृष्टि के समुद्भव का कारण है ? यावदिष्टमूषाक्रमव्युपहितेष्वथ तेषु विद्यात्। उद्दिष्टवेश्मकृतनिर्गममार्गमूषासत्काङ्कसैकयुतिनिर्मित- सङ्ख्यमोक ॥ (समराङ्गण. 26, 78-80)
४. सूत्र १६१-२३९: नृत्य, संगीत, चित्रकला, सिंहासन, ध्वजारोहण एवं ग्रन्थ उपसंहार
376 अपराजितपृच्छा बिन्दु वामा कृता रेखा वामावर्त्ते पूर्वोदिताः । पूर्वापरगतास्त्वेवं सृष्टिसञ्ज्ञाविधानकम् ? ॥ ४ ॥ इस नादबिन्दु के बायीं और होती हुई पूर्व से आरम्भ होने वाली रेखा को पूर्व से पश्चिम जाने से सृष्टि संज्ञा विधान अर्थात् सृष्टि नाम दिया गया। आश्रमवास्तु — ऐशान्या अग्निपर्यन्तमाश्रमं ¹वस्तुसम्भवम्। आश्रयन्ति समस्ताश्च जीवा महितचेतसः ॥ ५ ॥ ईशान कोण से अग्नि कोण तक 'आश्रम' नामक वास्तु बनता है। वहाँ समस्त जीव आश्रय ग्रहण करते हैं और निश्चित होकर अपने हित का चिन्तन करते हैं। अथालयमाह — आग्नेयां निर्ऋतिर्यावत् सदा सृष्टिर्विनश्यति । इत्थमालयसञ्ज्ञा स्यात् सृष्टितोऽयं समुद्भवः ॥ ६ ॥ आलयः सर्वसत्त्वानां सर्वभूतात्मनां हितः। तदेवं लीयते सर्वमालयादिसमुद्भवम् ॥ ७ ॥ अब आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण) से नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) तक सदा सृष्टि का विनाश होता है। इनको 'आलय' नाम दिया गया है, जो यहाँ सृष्टि में उत्पन्न होता है। यह आलय भी सभी प्राणियों, सभी सत्त्वों और उनके हितों की रक्षा करता है, उसी तरह से सभी आलय आदि में सब लीन हो जाते हैं। कोष्ठका — नैर्ऋत्यनिलसम्भूता सृष्टिस्त्वेवं समुद्गता। कोष्ठकाभिधानमेतत् चतुरश्रीकृतं शुभम् ॥ ८ ॥ इसके बाद, नैर्ऋत्य से लेकर वायव्य दिशा तक जो सृष्टि बनती है उसका नाम 'कोष्ठका' है, वह चौकोर और शुभ है। छाद्यकं — आच्छादितं तथा चोर्ध्वं तच्च कोष्ठभिधानकम्। कोष्ठकं चतुर्हस्तान्तमाच्छाद्यं छाद्यकं विदुः ॥ ९ ॥
- मय ने वास्तु की अपेक्षा 'वस्तु' नामाभिधान ही दिया है। वस्तु ही मूल है। वस्तु से होने वाला पदार्थ वास्तु कहा जाता है। पृथ्वी प्रथम वस्तु है। इसके बाद प्रासाद, यान व शयनादि भी वास्तु की श्रेणी के अन्तर्गत है— अमर्त्याश्चैव मर्त्याश्च यत्र यत्र वसन्ति हि। तद्वस्त्विति मतं तज्ज्ञैस्तद्भेदांश्च वदाम्यहम् ॥ भूप्रासाद्यानानि शयनं च चतुर्विधम्। भूरेव मुख्यवस्तु स्यात्तत्र जातानि यानि हि ॥ (मयमतम् 2, 1-2)
सूत्र-६९ ३७७ उस कोष्ठका (कोठे) में ऊपर से छत की छवाई कोठे के चार हाथ तक अर्थात् चार गज तक की जाए, उस छवाई को विद्वज्जन 'छाद्यक' कहते हैं। आच्छाद्यं तु यदा क्षेत्रमेकहस्ताच्छतार्धतः । आवेष्टितं खलीपाटं फलकं स्याद् गृहाङ्गणम् ॥ १० ॥ परन्तु, जब उसे एक हाथ से (गज माप से) लेकर पचास गज तक छवाई कर दें तो खलीपाट से आवेष्टित गृह के आङ्गन में फलक बन जाता है। प्राकारमाह — एक-द्वि-त्रिसहस्रैश्च हस्तैर्मानसमन्वितम् । नगरेषु तथावेष्टकूटप्राकारसञ्ज्ञितम् ॥ ११ ॥ यदि छवाई मान, माप एक, दो या तीन हजार गजों का हो तो उन नगरों में 'तथावेष्टकूट' प्राकार नाम दिया जाता है। अथ गृहं — चतुर्हस्तादितः क्षेत्रं शिरश्छाद्यं समोदये । पूर्वे चैकद्वारयुतं गृहसञ्ज्ञं तदुच्यते ॥ १२ ॥ चार गज तक के क्षेत्र को सिर की छवाई तक ऊँचा रखें, उसमें पूर्व की ओर एक द्वार रखें तो उसे 'गृह' नाम दिया गया है। एकद्वारं भवेद्वेश्म पूर्वापरद्वार निलयः । त्रिद्वारं करणं प्रोक्तं चतुर्भिश्चातुरं भवेत् ॥ १३ ॥ एक द्वार वाले गृह को 'वेश्म' कहते हैं। इसी तरह यदि वेश्म में तीन द्वार हो तो उसे 'करण' कहते हैं और यदि वेश्म के चार द्वार हो तो उसे 'चातुर' नाम दिया जाता है। षड्जात्युत्पन्नच्छन्दा भैदैर्भिन्ना द्विरष्टभिः₁₆ । इत्युक्तकमरूपाढ्या गृहसङ्ख्या त्वनेकधा ॥ १४ ॥ इस तरह छह प्रकार के जातियों से उत्पन्न गृहों के भिन्न-भिन्न सोलह भेद होते हैं। इस प्रकार के क्रम से गृहों के रूपों से अनेक संख्या में गृह बनते हैं। तृणपट्टौ छादने स्तः वाजिच्छन्दः शिलामयः । खण्डच्छन्दो गृहमध्ये पूर्णच्छन्दो ह्यधोगृहम् ॥ १५ ॥ तृण पट्टिका से छवाई वाले गृह को 'छादन' तथा शिलापट्टी से छवाई वाले गृह को 'वाजिछन्द' तथा गृह के मध्य भाग की छवाई वाले गृह को 'खण्डछन्द' तथा ऊपर नीचे तक की छवाई वाले गृह को 'पूर्णछन्द' नाम दिया जाता है।
378 अपराजितपृच्छा पाण्डुच्छन्दस्तथाचैव भूम्यूर्ध्वं शैलजाश्रितः। षष्णां तु छन्दसां प्रोक्तः सृष्टिकाले समुद्भवः ॥ 16 ॥ यदि गृह भूमि से ऊँचाई पर अर्थात् पहाड़ों पर बना हो तो उसे 'पाण्डुछन्द' नाम से जाना जाता है। इस तरह सृष्टि के समय छह प्रकार के छवाई या छादन बताए हैं। अथ हर्म्यादीनां — एकभौमं द्विभौमं वा हर्म्य स्याद्वा त्रिभौमकम्। पट्टच्छन्दादिका भेदा हर्म्यादिवेश्मसञ्ज्ञकाः ॥ 17 ॥ अब हर्म्य के बारे में कहता हूँ। हर्म्य अर्थात् हवेलियों के भवन, एक मंजिल से लेकर दो, तीन मंजिल वाले तक होते हैं। इनके पाटने और छवाई के भेद हर्म्यादि वेश्म नाम से कहे गए हैं। शालालिन्दक्रमच्छन्दे भेदा भिन्नास्तु षोडश। चतुरुत्तरशतानि ह्येकशालप्रकारकाः ॥ 18 ॥ शाला, आलिन्दों के क्रम भेद से सोलह प्रकार के भिन्न-भिन्न भेद होते हैं। एकशाल प्रकार से इनके एक सौ चार भेद हैं। गुणितास्ते दशशतैर्लक्षमेकमतः परम्। चत्वारि च सहस्राणि एकशालादिषु क्रमात् ॥ 19 ॥ उनको दस सौ (1000) से गुणित करने पर एक लाख से भी परे तक हो जाते हैं। एकशाल से क्रमिक वृद्धि करते-करते चार हजार तक के प्रकार हो जाते हैं। पट्टच्छन्दे यथा भेदाः शालालिन्दादितस्तथा। विपरीतास्तृणच्छन्दे षोडशैव प्रकीर्तिताः ॥ 20 ॥ पट्छन्दों अर्थात् पटावों के जितने भेद हैं और शाला तथा अलिन्दों के जितने भेद हैं, उनके विपरीत ही तृणछन्दों के पटाव भी सोलह प्रकार के कहे गए हैं। वाजिच्छन्दोऽधिकोच्छ्रायः पाण्डुर्हीनोदयात्मकः। चतुर्हस्तं फलकान्ते शेषच्छन्दाः प्रशंसिताः ॥ 21 ॥ वाजिछन्द नामक पटाव अधिक ऊँचा होता है, पाण्डुहीन पटाव उससे कुछ नीचा होता है; अन्य शेष पटाव सामान्यतः चार गज की ऊँचाई तक (फलकान्त) होते हैं, जो प्रशंसित माने गए हैं। द्विपञ्चाशद् द्विशालानां प्रत्येकं द्विसहस्रतः। स चतुःसहस्रं लक्षं द्विशालानां प्रकीर्तितम् ॥ 22 ॥
सूत्र-६१ 379 बावन प्रकार की द्विशालाओं के प्रत्येक के दो हजार तक भेद होते हैं। इसी तरह की चार हजार लाख द्विशालाओं के भेद होते हैं। द्विसप्ततित्रिशालानां प्रत्येकं त्रिसहस्रतः। लक्षद्वयं त्रिशालानां तथा द्व्यष्टसहस्रकम् ॥ २३ ॥ बहत्तर त्रिशालाओं के भी प्रत्येक के तीन-तीन हजार भेद होते हैं और त्रिशालाओं के दो लाख सोलह हजार भेद होते हैं। चतुःशालगृहाणां षट्पञ्चाशच्च शतद्वयम्। प्रत्येकं चतुःसहस्रगुणितं च भवेदिदम् ॥ २४ ॥ चतुर्विंशतिसहस्रोत्तरं च दशलक्षकम्। चतुःशालकभेदे तु हर्म्याणि च भवन्ति हि ॥ २५ ॥ चतुःशाल गृहों के भेद भी दो सौ छप्पन होते हैं। इनमें प्रत्येक को हजार से गुणित करे तो ये दस लाख चौबीस हजार होते हैं। इस तरह से चतुःशाल भेद इन हवेलियों, हर्म्यों के होते हैं। चतुर्दशलक्षाण्यष्टचत्वारिंशत्सहस्रतः। मेरुसङ्ख्या तथा चेत्थं हर्म्यादिगृहेषु च ॥ २६ ॥ तत्राष्टाष्टगता भेदा एकैकस्य तथैव च। कोटिः पञ्चदशलक्षा वेदाशीतिसहस्रकम् ॥ २७ ॥ इसी तरह से चौदह लाख अड़तालीस हजार संख्या भेद मेरु हर्म्यादि गृहों के होते हैं। इनके भी आठ-आठ भेद से अलग-अलग प्रकार से वे सब एक करोड़ पन्द्रह लाख चौरासी हजार हो जाते हैं। एवं हर्म्यादिगृहाणां मेरुच्छन्दात् समुद्भवः। इषुच्छन्दोद्भवान्यान्ये तत्तुल्याश्चैव सङ्ख्यया ॥ २८ ॥ इत्युक्तं हर्म्यादिवेश्म प्रासादानामतः परम्। इस प्रकार हर्म्यादि गृह मेरुछन्द से बनते हैं और पाँच-पाँच छन्दों में और भी अन्य उतनी ही संख्या के बन जाते हैं। इस तरह अब तक हर्म्यादि वेश्म, भवनों के विषय में कहा गया। प्रासादसञ्ज्ञक हर्म्यवर्णन — प्रासादा देवभूपानामन्येषां हर्म्यमुच्यते ॥ २९ ॥ अब मैं प्रासाद नामक भवनों के बारे में कहता हूँ। राजाओं और देवताओं के
आवास को तो 'प्रासाद' और अन्य बड़े लोगों के आवास को 'हर्म्य' कहते हैं।¹ माडश्च मौडः शुद्धश्च शिखरं च चतुर्थकम्। तुङ्गारः सिंहकश्चैव षड् भेदा राजवेश्मनाम् ॥ ३० ॥ राजभवनों के 1. माड, 2. मौड, 3 शुद्ध, 4 शिखर, 5 तुङ्गार, 6 सिंहक— इस तरह से छह भेद कहे गए हैं। छाद्यघण्टाकूटैर्माडो मौडश्चोर्ध्ववरण्डिकः। वरण्डिकाः सर्वभूषु शुद्धो बाह्यचतुष्कतः ॥ ३१ ॥ छाद्य या पटाव, घण्टा या घूमट, कूट कंगूरों से युक्त भवन को 'माड' कहते हैं; जिसके ऊपर की ओर ऊँची वरण्डिका अर्थात् दीवार या बरामदा हो उसे 'मौड' कहते है। जिसके चारों तरफ बरामदा अर्थात् वरण्डिका हो और बाहर से भी चौकोर हो उसे 'शुद्ध' नाम दिया गया है। माडच्छन्दोद्भवे भद्रे भूमिशृङ्गाणि सन्ति चेत्। तच्च मौडाभिधानं स्यात् प्रशस्तं राजवेश्मनि ॥ ३२ ॥ यदि माडछन्द से बनी हुई भद्रों में अर्थात् दीवारों में भूमिशृङ्ग हो तो अर्थात् कंगूरे हो तो उसको 'मौड' नाम से प्रशस्त राजभवन कहा है। शिखरं शिखराकारं सुरसद्मादिसम्भवम्। भद्रे भद्रे तवङ्गानि तुङ्गारा द्विगुणं गता ॥ ३३ ॥ जो पहाड़ी की चोटी, शिखराकार के भवन हैं जैसे सुर सद्मादि सम्भव अर्थात् मन्दिरों की आकृति वाला हो तो उसे 'शिखर भवन' कहते हैं। जिसकी हर एक दीवार पर तवङ्ग बने हों और ऊँचे-ऊँचे गुम्बज हो और जो दुगुनी ऊँचाई लिए हुए हो, उसे तुङ्गार भवन कहते हैं। सिंहावलोकनं कुर्यात् सिंहकर्णैर्विभूषितम्। एवं वै षड्विधं प्रोक्तं राजवेश्म सुखावहम् ॥ ३४ ॥ जिसके कोनों पर सिंहकर्ण-सी आकृति हो अर्थात् बड़े-बड़े कंगूरे हो, उसे 'सिंहावलोकन' भवन कहते हैं। इस तरह सुखदायी राजभवनों के छह प्रकारों के बारे में कहा गया। मालिकानि कथ्यते — मालिकानि यथोक्तानि कथयामि समासतः।
- 'हर्म्यादि धनिनाम् वासः प्रासादो देव भुर्भुजाम्' इति अमरकोष (पुरवर्ग. 2,9)।
सूत्र-६१ 381 द्विशतहस्तविस्तीर्णं पञ्चषष्टिकरोच्छ्रयम् ॥ ३५ ॥ द्वारं सप्तदशहस्तं मध्यमं रङ्ग ¹सत्वरम् । याम्येपरे उत्तरेषु उच्छ्रयति विंशतिकरैः ? ॥ ३६ ॥ अब मैं मालिकाओँ यानी महलों के बारे में संक्षेप में कहता हूँ। दो सौ हाथ अर्थात् 200 गज की चौड़ी और 65 गज ऊँची और जिसके द्वार भी 17 गज ऊँचे हों और मध्य में रङ्गशाला हो तथा उभयपार्श्व से 20 गज की ऊँचाई से युक्त हो (ये मालिका कही जाती है, मेवाड़ में 'महल-मालिया' शब्द व्यवहृत है)। राजा वा चक्रवर्ती वा खण्डजा मण्डलाधिपाः । मुकुटध्वजा भूपालाः सामन्ता लघवस्तथा ॥ ३७ ॥ राजा हो, चक्रवर्ती हो, खण्डजा या खण्डपति हो, मण्डलाधिप हो, मुकट- ध्वजाधारी भूपाल हो अथवा छोटे सामन्तगण हों।² छत्रधासः प्रतीहाराः खड्गधराश्चतुर्वराः । वंशोपानद्धराश्चैव अङ्गरक्षा³चतुष्किका ॥ ३८ ॥ छत्रधारी स्तर का हो, प्रतिहार पद का हो, खड्गधारी पद का, चतुर और श्रेष्ठ पदधारक हो, पानधरा या पाणेरी वंश⁴ का हो, अङ्गरक्षकों के या चौकीदारी पद पर हो। सुभटैरभिभज्यन्ते साधु साधुजनाकुलैः । राजगृहं सदासेव्यमीशस्य चामरैर्र्यथा ॥ ३९ ॥ महान् वीर हो, अभिजात्य वर्ग में अभिनन्दित हुए हों, साधुजनों में भी साधु मान्य हो अर्थात् बहुत ही सज्जन हो, सदा राजगृह की सेवा में रहते आए हों, अपने स्वामी के चामरधारी रहे हों। दासीदासाः सूपकाराश्छत्रधाराश्चव्यञ्जनाः । महिषी कुरुते देवी चामरधारी त्वमासन्ना ॥ ४० ॥ तथा च केशबन्धाश्च जातीचम्पकग्रन्थिकाः । कुङ्कुमश्रीखण्डहस्ता उद्वर्त्तनोत्तरनायिकाः ॥ ४१ ॥
- 'सत्करम् ?' इति प्रकाशित पाठः।
- यहाँ राजाओं की विविध कोटियाँ आई हैं। ग्रन्थकार ने आगे 81वें सूत्र में श्लोक 2 से 12 तक इनका विस्तार से वर्णन किया है। सूत्रधार मण्डन ने भी इसी को आधार बनाया है। (राजवल्लभ 5, 2-4)
- 'चतुलिका' इति प्रकाशित पाठः।
- 'पाणेरी' जैसे व्यक्ति का वर्णन अर्थशास्त्र में आया है, मेवाड़ में राजदरबार में जलप्रबन्धक के लिए पानेरी पद रहा है। आज भी पानेरी नामधारी लोग इसी मान्यता की पुष्टि करते हैं।
जिनके दासी-दास और रसोइयों की पूरी व्यवस्था हो, छत्र और व्यञ्जन-पङ्खे धारण करने का अधिकारी हों, जिनकी महिलाओं को महिषी की पदवी हो, जिनके पार्श्व में चामरधारी चलें— ऐसे अधिकार प्राप्त हों तथा जो केश के शृङ्गार में चमेली, चम्पक आदि पुष्पों की माला-गजरे आदि केश विन्यास के प्रसाधन प्रबन्धक के पद पर हो, जो शृङ्गारादि के लिए चन्दन लेप, कुङ्कुमादि तथा उबटन, उत्तरीय आदि के रखने की नायिकाएँ हों, उस पद पर काम करने वाली पदाधिकारी हों (इनके लिए मालिका गृह उपयोगी है)। अक्षौ च त्रीमुने सै सर्वे नेन्द्रीपञ्जिचोरका।¹ इष्टराज्ञीं सदा ध्यात्वा मुनिषोडशां तथा ? ॥ 42 ॥ (वहाँ पर) अक्षक्रीड़ा² अर्थात् पाशों का खेल, इक्कीस (त्रीमुने) घरों वाला खेल, नयनबन्दी³, पञ्जिचोरका⁴ जैसी क्रीड़ाएँ हों और अपनी इष्ट रानी का सदा वैसे ही ध्यान रखें जैसे कि मुनियों की भी षोडशी युवती के प्रति कामुक दृष्टि बनी रहती है। त्रिभूमिमध्यकर्त्तव्या मालिका क्रमशः स्थिता। मालिका अर्थात् महलों को सदा त्रिभूमि मध्य अर्थात् तीन चौक पार करने के बाद क्रमवार, मध्य में बनाना चाहिए। सूर्यवंशोद्भवाः शैवा वतरन्ति यदा महीम् ॥ 43 ॥ तेषां वेश्मानि कार्याणि नान्येषां तु कदाचन। एवं तु राजवेश्मानि कर्त्तव्यानि च सर्वदा ॥ 44 ॥
- ‘अक्षौ ? च त्रीमुने सै सर्वे नेन्द्रीप्रतिचोरका?’ इति प्रकाशित पाठः।
- ‘अक्षक्रीड़ा’ में तीस पाशकों या सारिकों का प्रयोग होता जिसमें 15 श्वेत व 15 चित्रित पाशे होते थे— दशपञ्च सितास्तत्र दशपञ्च विचित्रता। त्रिंशदेताः समाख्याता.... पाशककेलिषु ॥ (मानसोल्लास 5, 13,
- ‘दृङ्मीलन’ नाम से इस खेल का उल्लेख शार्ङ्गधरपद्धति में हुआ है जिसमें परस्पर अचानक आँखें बन्द कर दी जाती थी— इत्थं बालतया सखीभिरसकृद्दृङ्मीलनाकेलिषु व्याषिद्वा रजनीमुखे च नयने स्वे गर्हते कन्यका॥ (शार्ङ्गधर. श्लोक 3942) सोमेश्वर ने दिखाई नहीं देने वाले स्थान में ऐसी ही तिमिर क्रीड़ा का वर्णन किया है जो राजा अपनी प्रेयसियों के साथ करता था— तथाविधं तमः कुर्याद्यत्र किञ्चिन्न लक्ष्यते। (मानसो. 5, 17, 935)
- ‘पञ्जिका’ क्रीड़ा में राजा स्वयं स्त्रियों के साथ भाग लेता जो रूपसियाँ, प्रेमभाव से पूर्ण, विलास-विभ्रम से युक्त, परिहार रस को प्रसारित करने वाली व चतुर होती थीं— तरुणी रूपसम्पन्ना प्रेमभावसमन्विता। विलासविभ्रमे युक्ता परिहासरसप्रिया॥ आहूय चतुराः कान्ताः पञ्जीक्रीडाविशारदाः। ताभिः सह महीपालः पञ्जिक्रीड़ां समाचरेत् ॥ (मानसो. 5, 16, 885-886) यदि यहाँ ‘प्रतिचोरका’ शब्द माने तो भागवत में निलयन क्रीड़ा का वर्णन हुआ है जिसमें एक जना चोर बनकर अन्य को ढूँढ़ता था। (भागवत. 10, 38, 27)
सूत्र-७० ३८३ इस पृथ्वी पर जो सूर्यवंश में उत्पन्न होने वाले और शैवोपासक राजा हों¹, उनके लिए ऐसे सर्वाङ्ग वेश्मों का निर्माण करना चाहिए। किसी अन्य के लिए कभी ऐसे उन्नत महल नहीं बनाएँ, क्योंकि यह खानदान और उच्चकुल की मर्यादा रखने की बात है, अतएव ऐसे भवन सदा राजाओं के ही बनाने चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गृहोत्पत्तिहर्म्यादिराजप्रासादनिर्णयाधिकारो नामैकोनसप्ततितमं सूत्रम्॥ ६९॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गृहोत्पत्ति हर्म्यादि राजप्रासाद निर्णय अधिकार नामक उनसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ ६९॥ भूधरादिब्रह्मनगरं सप्ततितमं सूत्रम्॥ ७०॥ विश्वकर्मोवाच — गृहाणि नृपदेवानां स्वर्गपातालवासिनाम्। ब्राह्मणानां हितार्थाय नगरं वच्मि सम्प्रति॥ १॥ विश्वकर्मा बोले कि अब मैं राजाओं और देवताओं, स्वर्ग व पाताल के निवासियों तथा ब्राह्मणों के हित के लिए रहने योग्य आवासीय नगरों के बारे में कहता हूँ। १. ग्रन्थकार का यह सङ्केत सम्भवतः मेदपाट-मेवाड़ के सूर्यवंशी राजकुल की ओर है जो शैवोपासक हैं। सूर्यवंशी यह कुल गुजरात के आनन्दपुर से उठा हुआ है और गुहदत्त से चला है। एकलिङ्गनाथ इनके परमेश्वर और आराध्य है। यह मन्दिर कैलाशपुरी-उदयपुर में बना हुआ है। यहाँ से प्राप्त ९७१ ई. के शिलालेख में इसे प्रथम तीर्थ कहा गया है और उसमें मेवाड़ राज्य के संस्थापक बप्पा और नरवाहन के प्रबल प्रताप का यशोगान है। (जर्नल ऑफ बॉम्बे एशियाटिक सोसायटी, जिल्द २२, पृष्ठ १६६-१६७, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग १, पृष्ठ २५६-२५९) राजप्रशस्ति नामक शिलोत्कीर्ण १७वीं सदी के अभिलेख में इस वंश की सूर्य, मन्वादि क्रम से परम्परा दी गई है। कर्नल जेम्स टॉड ने भी यह वंशावली दी है। यह भी एक महत्वपूर्ण सङ्केत है कि यह ग्रन्थ किसी सूर्यवंशी राजा के आश्रय में ही लिखा गया हो। इसी वंश में 'अपराजित' नामक राजा हुआ है जिसका अभिलेख कुण्डा नामक ग्राम से प्राप्त हुआ है। यह प्रशस्ति मार्गशीर्ष शुक्ला पञ्चमी, तदनुसार २ नवम्बर ६६१ ई. की है। वह शिवभक्त था किन्तु उसका सेनापति विष्णुभक्त था। उसकी पत्नी यशोमति ने कुण्डेश्वर के निकट विष्णु का मन्दिर बनवाया। (एपिग्राफिया इण्डिका जिल्द ४, पृष्ठ ३१) अपराजित के काल से ही मेवाड़ में स्थापत्य के स्थायी कार्यों की शृङ्खला दिखाई देती है। नागदा गाँव में तो ९९९ मन्दिरों की घण्टियाँ एक साथ बजती थीं— ऐसी अनुश्रुति चली आती है। सम्भव है कि उन स्थितियों को अङ्गीकार करके भुवनदेवाचार्य ने इस ग्रन्थ का प्रणयन किया हो, तब तक मेवाड़ में समराङ्गणसूत्रधार का भी पर्याप्त प्रचार हो चुका था। भोज ने नागदा-कैलाशपुरी के पास जलाशय खुदवाया, चित्तौड़गढ़ पर समीधेश्वर महादेव का मन्दिर बनवाया। इन स्थितियों और इस अर्थ में अपराजितपृच्छा पर समराङ्गण, का प्रभाव इस क्षेत्र में इस ग्रन्थ के प्रणयन का आधार बताता है। उक्त रचनाकार मरुभूमि और गुर्जरत्रा की परम्पराओं का भी अच्छा जानकार था।
384 अपराजितपृच्छा भूधरं हेमकूटं च रत्नकूटं तृतीयकम् । त्रिषु लोकेषु विख्यातं पूज्यं सुरनरोरगैः ॥ २ ॥ इनमें भूधर, हेमकूट, रत्नकूट प्रकार के ये तीनों लोकों में देवताओं, मनुष्यों और नागों में पूज्य हैं। सहस्रैरधमं हस्तैर्मध्यं सार्धसहस्रकैः । द्विसहस्रैर्भवेज्ज्येष्ठं त्रिविधं हस्तसङ्ख्यया ॥ ३ ॥ जो नगर हजार गज के हों उन्हें अधम, डेढ़ हजार गज के हों उन्हें मध्यम और दो हजार गज के हो उन्हें ज्येष्ठ कहा जाता है। इस तरह गज संख्या के अनुसार तीन प्रकार के अधम, मध्यम और ज्येष्ठ नगर होते हैं। कनिष्ठं चाष्टभागैश्च मध्यं च दशभागतः । ज्येष्ठं द्विरष्टभागैश्च पदसङ्ख्या त्रिधोदिता ॥ ४ ॥ कनिष्ठ नगर के आठ भाग, मध्यम के दस भाग और ज्येष्ठ के सोलह भाग के अनुसार पद संख्या भी तीन तरह की होती है। चतुःषष्टिः कनिष्ठं च शतं मानं तु मध्यमम् । द्विशतं तु भवेज्ज्येष्ठं षट्पञ्चाशत्पदायतम् ॥ ५ ॥ इस तरह कनिष्ठ नगर के चौंसठ पद, मध्यम नगर के सौ पद और ज्येष्ठ नगर के दो सौ छप्पन पद का आयतन, विस्तार होता है। द्वात्रिंशद्धस्तमधमं द्विचत्वारिंशद्धिर्मध्यम् । ज्येष्ठं द्विपञ्चाशद्धस्तं गृहाणां तु प्रमाणतः ॥ ६ ॥ इसी तरह बत्तीस गज को अधम, बयालीस गज को मध्यम और बावन गज को ज्येष्ठ गृह का प्रमाण है। कनिष्ठं पञ्चशतकं मध्यं सार्धसप्तशतम् । सहस्र तु भवज्ज्येष्ठं गृहसङ्ख्या यथाक्रमात् ॥ ७ ॥ कनिष्ठ पाँच सौ का, मध्यम साढ़े सात सौ का और ज्येष्ठ एक हजार गज का- इस क्रमानुसार तीनों गृहों की संख्या होती है। कनिष्ठे नवर्मांश्च मध्यमे च त्रयोदश । कुर्याज्ज्येष्ठे सप्तदश मार्गसङ्ख्या प्रकीर्तिता ॥ ८ ॥ कनिष्ठ नगर के नौ मार्ग होते हैं, मध्यम नगर के तेरह और ज्येष्ठ नगर के सत्रह मार्ग संख्या कही गई है।
सूत्र-७० 385 एक-द्वि-त्रिक्रमात्प्रोक्ताश्छन्दाश्च विबुधैर्युताः। मर्त्यलोकेषु सम्प्राप्ताः स्वर्गपातालभूषणाः ॥ ९ ॥ एक, दो और तीन क्रम से विद्वान शिल्पशास्त्रियों ने छन्द कहे हैं जो मृत्युलोक, स्वर्गलोक और पाताललोक में भूषण रूप में माने गए हैं। चतुरश्रं समं क्षेत्रमायव्ययविशोधितम्। आदिगर्भं प्रकुर्वीत भुजकर्णविशोधितम् ॥ १०॥ चौकोर क्षेत्र को समतल करके उसके आय और व्यय को शोधित करें, फिर भुजाओं के कोनों से शोधित कर्ण रेखाओं से आदिगर्भ निश्चित करें। भाजयेदष्टभागांस्तु आयामं विस्तरं समम्। एकांशं च त्रिधा कृत्वा चोभयोश्च समन्ततः ॥ ११॥ तदनन्तर आयाम को आठ से भाग दें और उसी के समान विस्तार को भी आठ से भाग दें। फिर, जो एकांश आए उन्हें तीन-तीन भागों में दोनों के रख दें अर्थात् आयाम के तीन और विस्तार के तीन भाग होंगे। मध्यकोष्ठं परित्यज्य अष्टसद्मेश्च जायते ?। पूर्वापरे च द्वाराणां याम्यकौबेरसंस्थितौ ? ॥ १२ ॥ इस तरह मध्य कोष्ठ को छोड़ने पर आठ घर बन जाते हैं जिससे पूर्व-पश्चिम के द्वार और उत्तर-दक्षिण के द्वार बन जाते हैं। सर्वेषामीदृशं छन्दश्रुतुःषष्टिदेषु च। ब्रह्मस्थाने गृहाश्चैव पादानां च चतुष्टये ॥ १३ ॥ इसी तरह चौंसठ पदों के छन्दों में भी ऐसे ही बनते है, केवल उनके गृहों के ब्रह्मस्थान में चार पाद होते हैं। गृहाणां गृहसङ्ख्या च द्वात्रिंशद्भिः करैर्मता। ब्रह्मवंशयोर्द्वयोश्च चतुर्थांशकराः स्मृताः ॥ १४ ॥ उनमें गृहों की बत्तीस गज की गृह संख्या बनती है और ब्रह्म अंश के दो पद चतुर्थांश गज माने गए हैं। चत्वरे द्वादशमार्गांश्चत्वरे षोडशान्विताः। नवमार्गकृता सङ्ख्या निर्मिता विश्वकर्मणा ॥ १५॥ इनके चारों ओर बारह मार्ग और चारों ओर सोलह मार्ग या चारों और नौ मार्ग रखना चाहिए-इस संख्याक्रम को विश्वकर्मा ने निर्धारित किया है।
386 अपराजितपृच्छा सीमा करसहस्रं तु आयामो विस्तरः समः। चतुःषष्टिपदं कुर्याद् ब्रह्मरन्ध्रप्रमाणतः ॥ 16 ॥ यदि क्षेत्र की सीमा एक हजार गज हो और आयाम भी उसके ही समान एक हजार गज का हो तो उसको भी चौंसठ पदों में विभाजित करें और उसमें भी ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् मध्य का रिक्त भाग प्रमाणानुसार ही रखें। नगरस्य केन्द्रे ब्रह्मप्रासादं — चतुर्मुखं चतुर्द्वारं चतुर्वक्त्रं पितामहम्। कुर्यान्नगरकेन्द्रे च प्रासादं कमलोद्भवम् ॥ 17 ॥ इस तरह का क्षेत्र विभाजन करके नगर के केन्द्र में कमलोद्भव ब्रह्मा का प्रासाद, मन्दिर को बनाएँ जिसके चारों और चार द्वार हो जो ब्रह्मा के चारों मुखों के दर्शन सुलभ करा सकें। चतुरो वरुणाद्यांश्च चतुर्दिक्षु यथाक्रमम्। महास्थानेषु चत्वाराश्चतुःकर्णेषु संस्थिताः ॥ 18 ॥ इसी तरह उस नगर के चारों दिशाओं में वरुणादि चारों देवों को स्थिति दें और क्रम से चारों कोनों के महास्थान में भी देवताओं के मन्दिर बनाएँ। सीमान्तेषु च सर्वेषु चतुःषष्ट्यादिसाधिते। प्राकार उत्तमः कार्यो नवहस्तैः समुच्छ्रितः ॥ 19 ॥ नगर के सभी सीमान्त भागों पर चौंसठ पदों के साधने के पश्चात् नौ गज ऊँची उत्तम दीवार या प्राकार बनाएँ। द्विहस्तोच्छ्रिता च कार्या त्रिगूढा कण्डवारणी। तत्तुल्योदयमाना कपिशीर्षैर्घनाकुला ॥ 20 ॥ उस प्राकार के ऊपर भी दो गज की ऊँचाई की त्रिगूढ़ा कण्डवारणी अर्थात् तीन खण्डो की डोली बनाएँ। उसमें दो गज की ही ऊँचाई के कंगूरे पास-पास बनाएँ। कर्णे कर्णे तु कर्त्तव्या वृत्ताट्टालकशोभना। (त्रि)सहस्रान्ते पुनः कुर्याद्योधविद्याधरीं तथा ॥ 21 ॥ इस परकोटे के प्राकार के प्रत्येक कोने के भाग में गोलाकार गुम्बद युक्त अट्टालिका शोभायमान करें। इसी तरह प्राकार के प्रति तीन हजार गज की दूरी पर पुनः योध विद्याधरी अर्थात बारहदरी बनाएँ।
सूत्र-७० 387 तत्तद्भागप्रमाणेण कुर्यात् सिंहावलोकनम्। प्रतोलीनां तु चत्वारि चक्रद्वाराणि कल्पयेत् ॥ २२ ॥ उस बारहदरी में भी उसके उचित भाग प्रमाण से सिंहावलोकन अर्थात् गोखड़े, झरोखें बनाएँ। उस नगर की प्राकार में चार बड़ी-बड़ी पोलें बनाएँ। उनके सुदृढ़ चक्रद्वार अर्थात् घूमने वाले किंवाड़ बने हुए हों। अष्टौ सटक्क्या द्वाराणि प्रशस्तानि शुभानि च। खटक्की सर्वद्वारेषु कुर्यात् सोपानसञ्चयम् ॥ २३ ॥ इसी तरह प्रत्येक पोल के अलावा प्राकार के चारों दिशाओं में दो-दो खिड़की द्वार अर्थात् छोटे आवागमन के द्वार— इस तरह चारों और आठ द्वार भी बनाएँ जो प्रशस्त और शुभ माने गए हैं। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि इन सभी खिड़की द्वारों में छोटी खिड़की भी अवश्य रखें जिसमें से निकलने के लिए सीढ़ियाँ बनी हों ताकि उन पर चढ़कर खिड़की से आवागमन हो सके। रथमार्गोद्भवं शस्तं प्रतोलीषु प्रवेशनम्। कपाटाः सर्व
300 ...अपराजितपृच्छा षड्विधं तदधः पीठं मालिकास्त्वेकविंशतिः ।₂₁ तन्मध्ये देवताः सर्वे स्वर्गपातालवासिनः ॥ 26 ॥ उस कीर्तिस्तम्भ के अधःपीठ की रचना छह प्रकार की कही है। उस पर बनी हुई मालिकाएँ इक्कीस बनाई जाए और उन इक्कीस बालिकाओं में समस्त स्वर्ग, पाताल निवासी देवताओं की स्थापना करें। महाराणा कुम्भा ने कीर्तिस्तम्भ निर्माण पर 'स्तम्भराज' ग्रन्थ का प्रणयन किया है। चित्तौड़गढ़ पर कुम्भा का बनवाया कीर्तिस्तम्भ वर्तमान है। यहाँ लगी प्रशस्ति में इसका वर्णन है— कीर्तिस्तम्भमकारयेत्सरणधीरंभोलिहाग्रं समाधीशासर्वसुपर्वराजहरिति क्रीडानिवासं श्रियः। यत्रागत्यसुराङ्गनाः सकलभूसाम्राज्यलीलान्धिरस्तेन्द्रस्य नितम्बिनीजनकतान् पश्यन्ति लीलारसान् ॥ इसी की एक शिला पर स्तम्भराज को उत्कीर्ण किया गया था। देश में यह एकमात्र शिलोत्कीर्ण वास्तुशास्त्र है। इसमें कई देवी-देवताओं को समर्पित स्तम्भों के निर्माण की विधियाँ दी गई हैं। इसके प्रारम्भ में वनावली में सङ्गीत साधिका भगवती सरस्वती की आराधना करते हुए लक्ष्मी के हृदय निवासी विष्णु का स्मरण है। तदनन्तर विश्वकर्मीय योगदान का सन्दर्भ देते हुए कुम्भा स्तम्भों के लक्षणों को कहते हैं, जैसा कि जय ने कहा था। जय और अपराजित ने भी अपने विद्याभ्यास में इन लक्षणों को तीन प्रकार से बताया। ये स्तम्भ क्रमशः इन्द्र, ब्रह्मा और विष्णु के लिए बनाए जाते थे। इन्द्र के लिए कीर्तिस्तम्भ की ऊँचाई 65 गज, विष्णु के लिए 108 और ब्रह्मा के लिए कीर्तिस्तम्भ का उदयमान इन्द्र व विष्णु के स्तम्भ का मध्यमान वाला होगा। इस प्रकार कीर्तिस्तम्भ उत्तम, मध्यम और निम्न मान का बनता है किन्तु जो भी कीर्तिस्तम्भ शास्त्रोक्त विधि से बना हो, वह उत्तम होता है। इसको 14 भागों में विभाजित किया गया है। इसको तारकाकार पीठ पर बनाने का सङ्केत है जो अपराजित में भी आया है। यह मेरुच्छन्द में बनाया जाता है। इस खण्डित अभिलेख का आरम्भ इस प्रकार है—स्वस्ति। श्रीमत्सकलकविताकदलीकदम्बबन्धुःकोमुलासः स्फुरतु सुकवेश्वारु सङ्गीतदेव्याः। सान्द्रानन्दं दिशतु शोचिश्च वि...क मूर्तिर्लक्ष्मीवक्षस्थल कमलिनी कोशदेश द्विरेफः॥ 1॥ श्रीविश्वकर्मा(ख्य) महार्यवीर्यमाचार्यमुत्पत्तिविधावुपास्य। स्तम्भस्य लक्ष्मातनुते नृपालः श्रीकुम्भकर्णे जय भाषितेन॥ 2॥ जयपराजित मुखैर्भणितस्य त्रिधा यथा। इन्द्रस्य ब्रह्माणाश्चापि विष्णोर्नामभिरङ्कितः॥ 3॥ पञ्चषष्टि करोच्छ्रायः शक्रस्तम्भो विधीयते अष्टोत्तरं शतं हस्ता विष्णुस्तम्भसमुच्छ्रय... द्वयोर्मध्यमं मानं ब्रह्मस्तम्भस्य तन्मत्रम् उत्तमादिभिदायोगात्स प्रत्येकं त्रिधा भवेत्। (...) उत्तमं भेदामारूढो ब्रह्मस्तम्भोयमिष्यते। अमुष्योत्तमता प्रोक्ता मुख्यमान समाश्रयात्॥ 4॥ मे(घ)मानं विभजेच्चतुर्दश विभा(जयेत् तथा?)। एक भागमितं पक्षे चेकस्मिन्पीमा(न् भवे?)त॥ 5॥ चतुर... स्थिरं तारकासंज्ञके तस्या तत्रैव ... रपत्रीत्यनुक्रमात्। विमान छन्दसा....यां दिशि तद्वारमाद्य भूपो प्रकल्पये... भाग.... क॥ 8॥ भमन्ते नमितंत्यमद्ये......... कर्म्म मनोहरम्॥ 9॥ मेरो पृ... (हैण्डबुक टू विक्टोरिया हॉल म्यूजियम उदयपुर, राजस्थान राज्य पुरातत्वविभाग, जयपुर 1961, पृष्ठ 11 क्रमांक 38 व शिलालेख संख्या 10) इसके कुछ और अंश प्राप्त हुए हैं जिनके श्लोकों में वही मत है जो कि 'अपराजितपृच्छा' और 'ज्ञानप्रकाशदीपार्णव' के स्तम्भ निर्माण निर्देशों के सम्बन्ध में कहा गया है। बहुत सम्भव है कि जयता अथवा मण्डन ने ही इस ग्रन्थ का प्रणयन किया हो और इसको नृपेच्छा से उत्कीर्ण किया गया हो। इसका उत्कीर्णकर्ता पोमा रहा होगा जिसकी मूर्ति कीर्तिस्तम्भ के पञ्चमखण्ड में इस अभिलेख के साथ विद्यमान है— 'स्वस्ति श्री संवत् 1510 वर्षे श्रावणसुदि सोमवारे कीर्तिस्तम्भ राणा कुम्भकरणं कारापितं सूत्रधार जइता पुत्र नापा भमि चथी।'
सूत्र-७० 389 मेरुच्छन्दभवः स्तम्भो ब्रह्माण्डसदृशः पुरः। तदुपरि शिवमूर्तिः शक्तिस्त्रिज्योतीरूपिणी ॥ २७ ॥ इसी तरह जो कीर्तिस्तम्भ बनेगा, वह मेरुच्छन्द का बना हो और पूरे ब्रह्माण्ड के सदृश हों अर्थात् उसमें समस्त सृष्टि की रचना मूर्तिकलारूप में प्रदर्शित हो। उस कीर्तिस्तम्भ के ऊपरी भाग में तीन ज्योति रूपिणी शक्तियों के साथ शिवमूर्ति की स्थापना करें। तदर्थे मेरुच्छन्दमाह - मेरुच्छन्दः समाख्यातः विभागान् शृणु साम्प्रतम्। चतुरश्रं समं कृत्वा तारकं पीठमुत्तमम् ॥ २८ ॥ अब मेरुछन्द के विभागों के बारे में कहता हूँ, उसे सुनो। चौकोर क्षेत्र को समतल करके उत्तम तारक-पीठ बनाएँ। उक्ताश्च चतुरशीतिः कीर्तिस्तम्भा विभागशः। समस्ता उत्सेधभागाः शतमष्टोत्तरं स्मृताः ॥ २९ ॥ उस पीठ पर चौरासी प्रकार के कीर्तिस्तम्भ विविध विभागों के अनुसार बनते हैं। उन सभी की ऊँचाई के भाग एक सौ आठ कहे गये हैं।¹
- वास्तुविद्या और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव में पाँच प्रकार के ही कीर्तिस्तम्भों का वर्णन आया है। उक्त पाठ भी प्रासङ्गिक है - कीर्तिस्तम्भलक्षणम् - अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कीर्तिस्तम्भस्य लक्षण। पुराण भूषणार्थाय राज्ञादि विजया यत्र॥ 1॥ वापिकूपतडागानां कुण्डानां पुष्करादिनाम्। ध्वजास्तत्रैव कर्तव्या सर्वमानेन लक्षयेत्॥ पुरे च नगरे चैव कूटं कुर्यात् ध्वजरुहा। गजगृहे रथो वापि ध्वजास्तत्रैव कारयेत्॥ कण्टका सफलत्व्यज्ञै महाराज ध्वजेद्भवा। यत्र गजा ध्वजास्तत्र अनेकाकार रूपिणिम्॥ विधातव्या पताकैश्च राज्ञा च मानया। सङ्ग्राम रोहणे पताका गजारोहे मनोरमा॥ वसन्तादिकोत्सवेषु ध्वज सर्वेषु शोभना। नगरे पुरे ग्रामादौ होलिकायां महोत्सवे॥ राज प्रवेशे नगरेषु नृत्यमाण्डो महोत्सवे। दिव्य वस्त्र पताका च तोरणैर्युव्वसम्भवे॥ ततस्ता वाद्यभवने कोटे नित्यं तथैव च। कपिशीर्षान्तरे कुर्यात् त्रिपञ्चैकमथोच्यते॥ प्रतोल्याद्यालयालादि प्राकारे सर्वस्तथा। ध्वजामाला कुलसिद्धि कुर्यात्कैलाशोभवा॥ अर्क युद्धोद्भव स्थाने पुष्यप्राकार सङ्कुले। अष्ट₈ द्विष्ट₁₆ द्वात्रिंश₃₂ दिव्यवस्त्रोद्भवा ध्वजा॥ ध्वजास्तम्भोद्भवा कार्या कीर्तिपताकथ हस्तिपु। जयन्तश्च प्रतापख्य कीर्तिनन्दो महोत्सव॥ एकेच्छत्रस्तथा कार्या कीर्तिस्तम्भाश्च पञ्च हि। एकविंशति₂₁ यदा हस्तौ जयन्तो नाम नामत॥ प्रतापाख्यस्तत् कुर्यात् त्रयचत्वारि₄₃ हस्तकम्। पञ्चषष्ठि₆₅ यदा हस्त स एव कीर्तिनन्दन॥ सप्ताशीति₈₇ हस्तान्तं तु महोत्सवै कीर्तितम्। नवोत्तरशतं₁₀₉ हस्ते एकछत्रोद्भवस्तथा॥ एवं पञ्च महास्तम्भा महाराज्ञांहीदा पुरे। पृथुत्वे चतुथंशेन तत्षडांशे न चोर्ध्वत्॥ पञ्चमांशे नाऽधः कुर्यात् षडांशोच्छूय मानतः। ऊर्ध्वेपु माऽमर्धतु त्रिचतुष्टय भूमिकम्॥ (तत् षडांशेन ऊर्ध्वेपु ऊर्ध्वमानं त्रिभूमिकम्)। वृत्ताकारं प्रकर्तव्य घण्टा कलश संयुतम्। दक्षिणे कीर्तिपताका वामे कीर्तिस्तदूर्ध्वत्॥ एवं त्रिभूमोद्भवमाड धर्म कीर्ति यशोद्भवम्। पीठबन्धस्तत कुर्यात् ऊर्ध्वे तस्य मेखला॥ दिक्पाल लोकपालाश्च वसन्तानां च महोत्सवे। चतुःषष्ठिश्च देवानां स्वर्गिणाल्वेकविंशति॥ मौढपरि