अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 410, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६८ 365 श्रुतियों में, स्मृतियों में, पुराणों में, मन्त्रों में व मुद्राओं में मेरुछन्द से उत्पन्न हुए छन्द पूरे ब्रह्म और भुवनों अर्थात् चौदह भुवनों के अन्त तक भी व्याप्त है। माड-मौड-शुद्ध-शृङ्ग-तुङ्गार-सिंहकादिकाः । प्रोक्ता च राजवेश्मादौ मेरुच्छन्दसमुद्भवाः ॥ 9 ॥ उनके विविध नाम हैं— माड, मौड़, शुद्ध, शृङ्ग, तुङ्गार, सिंह आदि। अब मेरु छन्द से बनने वाले राजवेश्म अर्थात् राजभवनों, महल व प्रासादों के बारे में सबसे पहले कहता हूँ। आनकणाभि सङ्घाटा गृहमालाकूटपञ्जरम्। सम्भूता मेरुच्छन्दाच्च गृहा हर्म्यादिसञ्ज्ञकाः ॥ 10 ॥ आनक या सेना के काम आने वाले दुन्दुभि नगाड़े, घण्टादिकों की जोड़ी तथा सैनिकों के छावनी- गृहमाला के कूट, किले पञ्जर आदि और हर्म्यादि नाम के भवन सभी मेरुछन्द से ही बने हैं। तृणपट्टवाजिपूर्णखण्डपाण्डव एव च। प्रयुक्ता मेरुच्छन्दादौ वास्तुविद्भिरुदाहृताः ॥ 11 ॥ इसी तरह वास्तुविदों ने मेरुछन्द के प्रयोग से तृण, पट्ट, वाजि (बाण या अश्व), पूर्ण, खण्ड, पाण्डव आदि भेद भी बनाएँ।¹ लतिना नागरा भौमा द्राविडाश्च विराट्का। सावन्धारा विमानाख्या मेरुच्छन्दसमुद्भवाः ॥ 12 ॥ इन्ही की तरह लतिन, नागर, भौम, द्राविड़, विराट, सावन्धार, विमान के नाम की निर्मितियाँ भी मेरुछन्द से समुद्भूत है। स्तम्भगर्भतीर्यमाना खण्डा वेणुकलादिकम्। मेरुच्छन्दोद्भवा रेखाः प्रोक्ताश्च सुरवेश्मनाम् ॥ 13 ॥ स्तम्भ गर्भ से निकलने वाली खण्ड, वेणु-पर्व, कलादि भी मेरु छन्दोद्भव ही है जो रेखा देव मन्दिरों के शिखरों पर बनती है।
- वास्तुमण्डनम् में कहा गया है कि पट्टछन्द के अनुसार विविध भेदों वाली शालाएँ व अलिन्दादि होते हैं तथा इसके विपरीत तृणछन्द से सोलह अन्य भेद होते हैं। जिसमें उदयमान न्यून होता है उसकी संज्ञा पाण्डु हैं तथा इनमें वाजन विस्तृत होता है। इसी प्रकार जिसमें फलक के अंत का उच्छ्रेय चार हाथ तक हो, वह शेष छन्द होता है— पट्टच्छन्दे यथा भेदा शालाऽलिन्दादिका मताः। विपरीतास्तृणछन्दे षोडशैवं प्रकीर्तिताः॥ हीनोदयाः पाण्डुसञ्ज्ञा वाजिनस्तु बुयेऽधिकाम्। फलकान्ते चतुर्हस्ता शेष छन्देष्ववोच्छ्रयः॥ (वास्तुमण्डनम् 6, 6-7)