भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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xlv बलादीनां विचारमाह — 326 निर्माणोपरान्तं प्रासादप्रतिष्ठाविधिं — 327 नक्षत्रफलमाह — 328 प्राचीमतमाह — 329 राश्यानुसारेण शङ्कुच्छायाविचारः — 329 नक्षत्रवेधवशादिक्साधनम् — 329 समक्षित्योपायमाह — 330 शङ्कुलक्षणमाह — 330 निशाकाले ध्रुवसाधनमाह — 331 आयाधिकारो नाम चतुःषष्टितमं सूत्रम् ॥ 64 ॥ 332-340 वास्तुदण्डाह — 333 अथायनयनमाह — 334 आयनामानि — 334 आय प्रयोजनमाह — 334 युगादिपरत्वेन ग्राह्यायाः — 334 विप्रादिजातिपरत्वेन ग्राह्यायाः — 335 अथ प्रशस्तऽऽयोच्यते — 335 परस्परदेय आयानि — 337 अथाऽऽयस्वरूपाणि — 337 नक्षत्रराशिश्चन्द्रमैत्र्यनुक्रमो नाम पञ्चषष्टितमं सूत्रम् ॥ 65 ॥ 340-346 त्रिविध नक्षत्रगणमाह — 341 नक्षत्राद्राश्यानयनमाह — 342 वर्णानुसारं प्रशस्तराशयः — 343 षडष्टकादीनां — 343 चन्द्रस्थितिफलमाह — 344 इत्यमनन्तरं समशलाकयचक्रमाह — 344 ग्रहराश्यादि मैत्रीविचारः — 345 व्ययांशकताराग्रहजीवमृत्युसर्वबलं षट्षष्टितमं सूत्रम् ॥ 66 ॥ 346-356 व्ययनामानि — 347 प्रशस्ताप्रशस्त व्ययमाह — 347