भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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हस्तसङ्ख्याप्रमाणं च शतानां दशपञ्चतः । वेश्म सङ्ख्याप्रमाणं च सार्धसप्तशतानि च ॥ 14 ॥ गज की संख्या प्रमाण से इन नगरों में गृहों की संख्या एक सौ पन्द्रह से लेकर साढ़े सात सौ तक हो सकती है। प्रासादोपस्करं सर्वं प्रतोल्यादिसमन्वितम् । कीर्तिस्तम्भादिकं चैव कथितं पूर्वमेव हि ॥ 15 ॥ इति हेमकूटनगराभिधानम्। इन नगरों के अन्य प्रासादों और उपकरणों, प्रतोली आदि से समन्वित कीर्ति स्तम्भादिक के बारे में तो पहले ही (70वें सूत्र में) कहा जा चुका है। अथ रत्नकूट नगरादीनां लक्षणं - अतः परं प्रवक्ष्यामि नगराणां च लक्षणम् । नाम्ना तु रत्नकूटं तद् विज्ञातं वसुधातले ॥ 16 ॥ इनके बाद, अब मैं उन नगरों के लक्षणों के बारे में कहता हूँ जो रत्नकूट नाम से वसुधातल पर पूर्णतः विख्यात है। चतुरश्रं समं क्षेत्र भुजकर्णविशोधितम् । भाजयेद्वा षोडशांशैर्विविधैर्वा पदैस्तथा ॥ 17 ॥ इनके लिए समचौरस क्षेत्र हो और भुजाओं तथा कर्णों को पूर्णतः शोधित करके सोलह अंश पदों में विभाजित करें या विविध अंशों के पदों में विभाजित करें। ब्रह्मस्थानं तु सङ्गृह्य चैकांशं वामदक्षिणम् । तच्चैकं तु त्रिधा कृत्वा पुनद्वौ चैकमेव हि ॥ 18 ॥ इसके ब्रह्म भाग अर्थात् मध्य के पदों के बायें-दायें एक के तीन भाग करके पुनः उनके दो-दो भाग करें। द्वौ द्वौ तु भागसंस्थाने चैकद्वयं त्रयं तथा । चत्वारश्च चतुर्दिक्षु पदसङ्ख्यां विभाजयेत् ॥ 19 ॥ इन दो-दो भागों के स्थानों पर एक, दो, तीन तथा चार भागों में चारों ओर के पदों की संख्याओं को विभाजित करें। गृहाणां जायते सङ्ख्या त्वेकमेव सहस्रकम्। पदांशषट्कविस्तारं तदंशं निर्गमं विदुः ॥ 20 ॥