भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 440

सूत्र-७१ 395 ब्रह्मस्थानेषु सङ्गृह्य ह्येकांशं वामदक्षिणम्। द्विधा तथा पुनस्त्रीणि द्वे द्वे त्रीणि द्वयं तथा ॥ ७ ॥ इन्द्रयाम्यापरसौम्ये विभज्य पदसङ्ख्यया। जायन्ते तत्र सद्मानि ख्यातानि वसुधातले ॥ ८ ॥ उस क्षेत्र के ब्रह्मस्थान अर्थात् मध्य भाग के बायें और दायें एक अंश को अर्थात् एक-पद भाग को दो प्रकार से तथा पुनः तीन को दो-दो प्रकार से और तीनों तथा दोनों को पूर्व से पश्चिम तक भली प्रकार से पद संख्या में विभाजित करके वहाँ भवन निवेश किए जाते हैं, जो कि पृथ्वीतल पर सुख्यात हैं। वसति मार्गादीनां न्यासक्रमः – निवसन्ति च सीमान्ते चतुर्वर्णा यथाक्रमम्। द्वादशाथमार्गाश्च द्वौ त्रयः सद्मनां तथा ॥ ९ ॥ इन नगरों के सीमान्त में चारों वर्ण के लोग यथाक्रम निवास करते हैं। दो-दो या तीन-तीन घरों को छोड़कर ऐसे नगर में बारह मार्ग बनाए जाते हैं। अन्तरे कर्णभुजयोर्मार्गसङ्ख्या त्रयोदश। सद्ममानं समाख्यातं चत्वारिंशत्सहस्रकम् ॥ १० ॥ कर्णभुज के अन्तर पर जाने तक मार्ग संख्या तेरह भी हो जाती है। इसमें भवनों की संख्या का प्रमाण चालीस हजार तक का कहा गया है। ब्रह्मरन्ध्रप्रमाणं च शतमष्टोत्तरं शुभम्। कर्णगर्भान् विजानीयाच्छतमष्टोत्तरं मतम् ॥ ११ ॥ इसी तरह ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् मध्य का भाग रखते हुए एक सौ आठ पद भागों का क्षेत्र भी शुभ होता है तथा कर्णगर्भ भी एक सौ आठ माने गए हैं। चतुर्वक्त्रं महापद्मं प्रासादं सुरवल्लभम्। स्थापयेद् ब्रह्मकेन्द्रे च ब्रह्माणं तु पितामहम् ॥ १२ ॥ ब्रह्म केन्द्र में अर्थात् नगर के मध्य भाग में चौमुखा, महापद्म नामक देवताओं को प्रिय लगने वाला प्रासाद बनाएँ और उसमें पितामह ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना करें। चत्वारः कर्णप्रासादाः कर्णगर्भे च संस्थिताः। आयान्तस्तु व्ययं कुर्यात् क्षेत्रमानानुसारतः ॥ १३ ॥ कर्णगर्भ के चारों ही कोनों पर भी कर्णप्रासाद चार की संख्या में बनाएँ। उसके लिए आय और व्यय क्षेत्र मानानुसार ही शोधित करने चाहिए।