भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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गृहाश्च कतिः सङ्ख्याता मार्गाश्च कतिधा स्मृताः। श्रेष्ठा वा निन्दिता वाथ प्रतोलीपरिखादिकाः ॥ २॥ वहाँ गृह कितनी संख्या में होते हैं और उनके मार्ग कितने प्रकार के होते हैं ? उनके श्रेष्ठत्व को और निन्दित को, प्रतोली अर्थात् पोल व परिखा अर्थात् प्राकार के बाहर बनने वाली खाई आदि के बारे में भी अवश्य कहिए। कतिः स्थानानि देवानां कतिदेवाश्च संस्थिताः। एतत्सर्वं प्रयत्नेन तथा जनपदादिकम् ॥ ३॥ किन-किन स्थानों में किन-किन देवताओं की स्थापना की जाए— ये सभी प्रयत्नपूर्वक कहें। भोगाय भूमिपालानां भोगिनां चैव सर्वदा। विश्रामो वनितानां च यथा चेन्द्रपुरी तथा ॥ ४॥ इसके साथ ही जनपद के निवासी लोगों के भोग के लिए तथा भूमि विश्राम करने हेतु और रमणियों के सदा आवास हेतु इन्द्रपुरी स्वर्ग के समान सुखदायी भवनों के बारे में भी कहिए। विश्वकर्मोवाच — अथातः सम्प्रवक्ष्यामि नगराणां च लक्षणम्। हेमकूटाभिधानं च विश्रुतं भुवनत्रये ॥ ५॥ विश्वकर्मा ने कहा कि अब मैं तीनों लोकों में विख्यात् हेमकूट नामक नगरों के लक्षणों को ठीक प्रकार से कहता हूँ। पदादीनां विन्यासमाह — चतुरश्रं समं कृत्वा भुजकर्णविशोधितम्। भाजयेद् द्वादशांशैर्वा न्यूनाधिकपदैस्तथा ॥ ६॥ (इनके निवेशार्थ सर्वप्रथम) भूमिक्षेत्र को समतल करके चौकोर बनाएँ और उसकी भुजाएँ और कोनों को भी सही-सही देख लें। इसके उपरान्त उसे बारह अंशों में विभाजित करें अथवा कुछ न्यूनाधिक पदों में विभाजित करें। और उन पर विद्यमान नगरों के रूप में चित्तौड़गढ़ व नागदा अनुमित किया जाना समीचीन है। चित्रकूट की स्थापना चित्राङ्गदा मौर्य ने 7वीं सदी में और नागदा की स्थापना गुहिल राजाओं ने आठवीं सदी में की थी। अपराजित यहाँ का शासक रहा था। जैसा कि 69वें सूत्रान्त पर टिप्पणी में कहा गया है नागदा के पास ही स्थित कुण्डेश्वर से अपराजित का 661 ई. का अभिलेख मिला है। इस सूत्र में प्रश्न के विपरीत विश्वकर्मा ने हेमकूटादि नगरों की रचना के विषय में कहा है।