अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 438, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७१ ३९३ अब मैं यहाँ ब्राह्मणों के उत्तमोत्तम वंशों के, उनके देवों के क्रम को कहता हूँ। इन्द्रादि देवताओं को ईशान कोण से आरम्भ करके पूर्व दिशा में विष्णु देव, धान्य, विप्रादि की स्थापना करे ? निगमों के पूजन करने वाले ब्राह्मणों (दैशिक, तांत्रिक) को दक्षिण दिशा की ओर स्थापित करें। नैर्ऋत्यां दिशि पितॄंश्च प्रावृषे पौरुषं तथा। उत्तरे पुनराचार्य ईशं च प्रतिपूजयेत् ? ॥ 47 ॥ नैर्ऋत्य दिशा की ओर पितरों को, वर्षा करने वाले देवों को, पौरुष अर्थात् नल या धूपघड़ी को भी स्थापित करें। उत्तर की दिशा में पुनः आचार्य और ईश अर्थात् महादेव शङ्कर का पूजन करें। कनिष्ठं च समाख्यातं नगरं नाम भूधरम्। देवलोकेषु विख्यातं पूज्यं सुरनरोरगैः ॥ 48 ॥ ऐसे ही जो कनिष्ठ नगर होते हैं उनका नाम भूधर कहा गया है जो सुर, नर और नागों के द्वारा देवलोकों में पूजा जाता है और विख्यात है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तेऽपराजितपृच्छायां भूधरादिब्रह्मनगराधकारो नाम सप्ततितमं सूत्रम् ॥ 70 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भूधरादि ब्रह्मनगर अधिकार नामक सत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 70 ॥ हेमकूटाख्यनगरप्रमाणमेक-सप्ततितमं सूत्रम् ॥ 71 ॥ अपराजित उवाच— चित्रकूट-त्रिकूटादिनगराणां च सर्वशः। प्रमाणं गुणदोषांश्च कथयस्व प्रसादतः ॥ 1 ॥ अपराजित ने कहा कि हे तात्! अब आप सभी चित्रकूट, त्रिकूट¹ आदि नगरों के प्रमाण, गुण और दोषों को कृपाकर कहिए। है— तत्रागते नगर्यन्तं यदि विष्ण्वालयं भवेत्। राजधानीति तन्नाम विद्वद्भिर्वक्ष्यते सदा ॥ (मानसार 10, 23-24)
- ग्रन्थकार के रचनाकाल तक चित्रकूट के रूप में चित्तौड़गढ़ और त्रिकूट के रूप में नागदा नगर अस्तित्व में थे। ये दोनों ही मेवाड़ की राजधानियाँ रहे हैं। तेरहवीं-चौदहवीं सदी के शिलालेखों और 15वीं सदी के 'एकलिङ्गमाहात्म्य' में ये नाम आए हैं। हालांकि शिवपुराण में भी चित्रकूट-त्रिकूट का नाम है— क्षणं तु गिरिवत्तस्थौ चित्रकूटत्रिकूटकः (शतरुद्रसंहिता 15, 48) किन्तु, मेवाड़ के इन पर्वतों