अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें392 अपराजितपृच्छा शिलोलूखलयन्त्राणि शय्यासनानि पट्टकाः । नित्यकर्मस्थानस्थानं सन्ध्यावन्दनकुण्डिकाः ॥ 41 ॥ सर्वं गृहोपस्करं च आयसं काष्ठकादिकम् । द्विजदेवेषु दातव्यमात्मार्थे तु सनन्दनम् ॥ 42 ॥ इसी तरह प्राकार रक्षक अधिकारियों के सुख सुविधा के साधन रूप में शिलानिर्मित ऊखल यन्त्रों, शय्या, खाट, कुर्सी मोढ़े आदि आसन, पाटले, नित्यकर्म पूजा-सन्ध्यादि के पूर्व किए जाने वाले स्नान के लिए स्नानघर, सन्ध्या वन्दन के समय हवनादि के उपयोगार्थ हवन-कुण्ड आदि और घर के काम-काज में आने वाले सभी उपकरणों आयस अर्थात् लोहादि धातुओं से अथवा काष्ठ से निर्मित हो, ये सब द्विज देवों को उनके कार्य में आने हेतु सनन्दन अर्थात् भवन सहित दान में देना चाहिए। भूमिदानं गजाश्वाश्च देशा ग्रामं च पत्तनम्। मयूरलाक्षभिच्छत्रं हेमरत्नादिभूषणम् ॥ 43 ॥ उन द्विज-देवों को भूमिदान, माफी पट्टे, हाथी, घोड़े, ग्राम, देश पतन, मयूर के लक्षणों से चित्रित छत्र चन्दोवे आदि और सोने व रत्नो के अनेक आभूषणों का दान करें। पूजयेत्सपत्नीकान् विप्रान् पूर्वे देषु पूजिताः ? । इन्द्रतुल्योद्भवं राज्यं स्वर्गे वा भूमिशासने ॥ 44 ॥ इन ब्राह्मणों की सपत्नी के उसी तरह से इस कार्य में पूजा करनी चाहिए जिस तरह से इसके पहले उनके पूर्वजों को पूजा जाता रहा है, तभी उस नगर का राजा अपने को इन्द्रतुल्य राजा मान सकेगा और इस भूमि को स्वर्ग के समान बना कर शासन करके राजेन्द्र कहा जा सकेगा। अन्यदप्याह — क्रमोऽयमत्र विप्राणां कथयामि द्विजोत्तम । वंशावंशेस्तदेवा ? इन्द्राद्या ईशकोणतः ॥ 45 ॥ विष्णुदेवधान्याविप्रा पूर्वदेशे तां स्थापयेत् ? । निगमं¹ पूजयन्ति विप्रा दक्षिणां दिशं द्विजोत्तमाः ? ॥ 46 ॥
- 'जिगमं ?' इति प्रकाशित पाठः। मयमतम् में निगम का वर्णन है। यह भी कहा है कि वास्तुक्षेत्र में ब्राह्मण और देवता की स्थापना की जानी चाहिए— एतस्याभ्यन्तरे विप्रदेवता स्थापनं भवेत्। (9, 64) [...] में कहा गया है कि जिस नगर में शिल्पशास्त्रान्तर [...]