अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७० 391 परिधौ मत्स्यादिदेवाश्च तथैकादशरुद्रकाः। शिवशक्तयोऽनेकाश्च रूपभेदेन संस्थिताः ॥ ३५ ॥ परिधि को विष्णु के मत्स्यावतार आदि देवताओं तथा एकादश रुद्रावतार और अनेकों शिव-शक्तियों के विविध रूप-भेद से बनी मूर्तियों से अलंकृत करें। सागराः पर्वता द्वीपा समस्ता भोगरूपका। समुद्रशैलवसना पृथ्वी च सप्तमातरः ॥ ३६ ॥ भूपालाश्च तथा कल्पवृक्षाश्च मुनिसत्तमाः। वायुश्च सूर्यचन्द्राद्याः सनक्षत्राः सराशयः ॥ ३७ ॥ इसी क्रम में समस्त सागरों के मूर्त रूप, पर्वतों के मूर्तरूप, द्वीपों के मूर्तरूप और समस्त भोग सामग्रियों के भी मूर्तरूप बनाएँ। इस समुद्र-शैल रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली पृथ्वीमाता का मूर्तरूप तथा सप्तमातृकाओं के मूर्तरूप, कल्पवृक्षों के मूर्तरूप, मुनीश्वरों के मूर्तरूप, समस्त उनचास प्रकार के पवनों के मूर्तरूप और सूर्य-चन्द्रादि ग्रहों से लेकर समस्त नक्षत्रों व राशियों के मूर्तरूप भी अलङ्करणार्थ लगाएँ। इन्द्रो रुद्रस्तथोपेन्द्रो ब्रह्मा विष्णुस्तथैव च। शैलेयी ( पञ्चलीलया ) शङ्करश्च सदाशिवः ॥ ३८ ॥ [L18