भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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तेन भागप्रमाणेन विस्तारः स्याच्चतुर्दश₁₄ । तत्त्वभागैश्च भद्रार्धं कर्णश्चैव द्विभागकः ॥ ३० ॥ उन भाग प्रमाणों के अनुसार उनकी चौड़ाई अर्थात् कीर्तिस्तम्भों की विस्तार चौदह भागों का हो तथा उनके भीत का भद्र अर्ध भाग तत्व अर्थात् पाँच भाग का और कर्ण दो भाग के होंगे। पूर्वभद्रे भवेद् ब्रह्मा दक्षिणे तु जनार्दनः। अनन्तः पश्चिमे भद्रे रुद्रश्चोत्तरतो दिशि ॥ ३१ ॥ पूर्व की दिशा के भद्र अर्थात् दीवार पर ब्रह्मा की मूर्ति हो, दक्षिण दिशा की भद्र अर्थात् दीवार पर जनार्दन, पश्चिमी भद्र पर अनन्त और उत्तरी भद्र पर रुद्र की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। कोणे भद्रे तथा स्तम्भे सप्तभागसमुच्छ्रिते । महाशृङ्गाणि चाष्टैव मेघाकाराणि तानि च ॥ ३२ ॥ अब कोणों की दीवार के तथा स्तम्भों की भद्र दीवार के सात भाग की ऊँचाई तक मेघाकार अर्थात् विशाल महाशृङ्गों की रचना करें जितनी संख्या प्रतिकोण दो के अनुसार से चारों कर्णभागों पर कुल आठ महाशृङ्ग बुर्ज बनेंगे। सार्ध भागं तु परिधौ त्यजेच्छृङ्गक्रमेण वै। तदूर्ध्वे दशभागा च इल्लका तोरणैर्युता ॥ ३३ ॥ इन बुर्जों की परिधि के डेढ़ भाग को छोड़ने के बाद उसके ऊपर के दस भागों में तोरणयुक्त इल्लका बनाएँ अर्थात् आने-जाने के लिए रोस निकला हुआ बनाएँ जिस पर तोरण अर्थात् छज्जा हो। कोणे भद्रे तथा शृङ्गे यक्षगन्धर्वपन्नगाः। भवन्ति ते स्वेच्छया च देवा वा दैत्यदानवाः ॥ ३४ ॥ इन कीर्तिस्तम्भों के कोणों पर भद्र अर्थात् दीवारों पर, शृङ्ग अर्थात् कंगूरों पर यक्षों, गन्धर्वों, नागों, देवों, दानवों व दैत्यों के अपनी-अपनी इच्छानुसार कृत्तियों में रचना करके सज्जित करें। ध्वजाकार्या दण्ड पताक मर्कटिम्। एवं विधेय कर्तव्य इति कीर्तिस्तम्भलक्षणम्॥ तडागं च महायज्ञे ध्वजास्तम्भ समोद्गवा। आनन्दो दुन्दुभि कान्तं श्रीमुख सुमनोहरम्॥ नव हस्तो भवेदाद्य सप्तदशकरोन्नतम्। तदग्रे कलश कुर्याद् ध्वजावंश समन्वितः॥ वापिषु दक्षिणे द्वारे ध्वजस्तम्भ प्ररोपयेत्। पीठबन्ध सुकर्तव्या एकद्वित्रिकरोन्नतम्॥ त्रिहस्त पञ्चसप्त समुन्नत तदूर्ध्वे कलशं दिव्य। कुण्डेषु पुष्करे कूपे ध्वजास्तम्भ समुद्भवैत्॥ त्रिपञ्चसप्त हस्तान्ते उदकान्तर ? शतशुभम्। तथा प्राचिमीशान मध्ये विभज्ये नवभागत्। वामे त्रयं परित्यजे दक्षिणे च त्रयत्यनेत्॥ (दीपार्णव उत्तरार्ध 23, 1-25)