अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें398 अपराजितपृच्छा सरस्वतीं तथैशान्यं वायव्यां तु जनार्दनम्। नैर्ऋत्ये च सहस्राक्षमाग्रेय्यां तु गणाधिपम् ॥ 27 ॥ इसके ईशान कोण में सरस्वती मूर्ति सहित मन्दिर, वायव्य में जनार्दन मूर्ति मन्दिर, नैर्ऋत्य में सहस्राक्ष मूर्ति मन्दिर और आग्नेय दिशा में गणपति मूर्ति मन्दिर स्थापित करें। सर्वेषामीदृशं स्थानं ज्येष्ठमध्यकनिष्ठकम्। कुर्यात् कनिष्ठके प्राज्ञो मध्यस्थाने चतुष्टयम् ॥ 28 ॥ ज्ञात्वा नगरचिह्नानि द्विरष्टकैकेन ? शिल्पिभिः। न्यूनाधिकं च द्वाराणां सूत्र सम्बोध्य बोधकम् ? ॥ 29 ॥ यह ज्ञातव्य है कि ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ— सभी नगरों का इसी व्यवस्था से निवेशन करें। कनिष्ठ नगर के मध्य स्थान (ब्रह्मस्थल) में चारों पदों में नगर चिह्नों के जानकर सोलह शिल्पीगणों के द्वारा न्यूनाधिक द्वारों की रचना हेतु (सूत्र सम्बोध्य बोधकम्) कोई सूत्र ढूँढने पर विचार-विमर्श किया जाए। रत्नकूटाभिधानं च गृहसङ्ख्या सहस्त्रतः। ज्येष्ठनगरमानं च सूत्रे चैव प्रसारिते ॥ 30 ॥ द्वारप्राकारकाद्यं च गृहोपस्करमेव च। पूर्वोक्तं तु विधातव्यं द्विजदेवालयस्तथा ॥ 31 ॥ ऐसे रत्नकूट नामक नगर के अन्तर्गत गृहों की संख्या हजारों तक हो सकती है। इसी तरह के कार्य के लिए ज्येष्ठ नगर मान लगाकर ऐसा ही सूत्र प्रसारित करके निवेशन किया जाना चाहिए। नगरों में द्वार तथा प्राकार, गृह उपस्कर-उपकरणों सहित वहाँ बसने वाले द्विजों, देवालयों के विषय में पूर्व में कहा जा चुका है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां हेमकूटाख्यनगरप्रमाणसूत्राधिकारो नामैकसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 71 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में हेमकूट नामक नगर व प्रमाण सूत्र अधिकार नामक इकत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 71 ॥ महाराजाधिराजपुरनिवेशो नाम द्वासप्ततितमं सूत्रम् ॥ 72 ॥ अथ विविधपुरस्य प्रमाणं। विश्वकर्मोवाच — चतुर्भिस्तु सहस्रैश्च कनिष्ठं विस्तृतं पुरम्। मध्यमं चाष्टसाहस्रं हस्तानां मानतः स्मृतम् ॥ 1 ॥