भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 444

पृ० ... ३१४ द्व्यष्टसाहस्रहस्तं च व्यासे ज्येष्ठं पुरं मतम्। चतुरष्टद्विरष्टं वा त्रिविधं चोदितं क्रमात् ॥ २ ॥ विश्वकर्मा बोले कि (अब महाराजाधिराज के पुर निवेश के लिए कहता हूँ। इनमें) पहले कनिष्ठ पुर का विस्तार 4 हजार गज का होता है और दूसरे मध्यम पुर का विस्तार मान 8 हजार गज का रखा गया है। तीसरे, ज्येष्ठ पुर का व्यास 16 हजार गज का माना गया है। इस तरह चार, आठ और सोलह हजार गज के विविध क्रमों में कनिष्ठ, मध्यम और ज्येष्ठ नगरों के मान क्रमशः कहे हैं। कनिष्ठज्येष्ठयोर्मध्ये सहस्रवृद्ध्यैकादश। चतुर्धापुनरेकैकं कनिष्ठं मध्यमुत्तमम् ॥ ३ ॥ उक्त कनिष्ठ, मध्यम और ज्येष्ठ पुर में भी हजार गज की वृद्धि अनुसार क्रमशः 11 भेद बनते हैं। उनके भी फिर, एक के चार भेद कनिष्ठ, मध्यम, और ज्येष्ठ नाम से होते हैं। साष्टमांशं सपादं वा सार्द्धं वास्तु समायतम्। कुर्यादेकैकमिथ्रं च चतुरश्रीकृतं शुभम् ॥ ४ ॥ अष्टमांश युक्त ( 1¹/⁸ ), सपाद युक्त ( 1¹/⁴ ) या अर्ध युक्त ( 1¹/² ) वास्तु समायत होते हैं और इनको भी एक-एक से मिलाकर शुभ चतुरस्र बनाए जाते हैं। वेदाश्रं वेदभक्तं च वेदापर नृपवेश्मने ?। समस्तनृपगेहानां वेदवत् संस्थिता स्थितिः ॥ ५ ॥ इन क्षेत्रों के पार्श्व में चार (वेदाश्र) और चार भाग से चार ही राजमहल— इस तरह समस्त राजमहलों की स्थिति भी वेदवत् अर्थात् चार-चार कही गई है। एकस्यां द्वित्रिभिर्वशाख्रिथा पञ्चपदान्तगाः। प्रसिद्ध राजमार्गश्च षट् पन्थानो नवांशकाः ॥ ६॥ पाँच-पाँच पद अर्थात् पाँच भाग के एक, दो और तीन अंशों वाले तीन विधियों के प्रसिद्ध राजमार्ग तथा छह पन्था, पैदल मार्ग नौ अंश के होंगे। इत्यनुक्रमवंशाश्च यानमार्गप्रभेदतः। पुरान्तेषु समस्तेषु घण्टामार्गप्रसिद्धितः ? ॥ ७ ॥ इन अनुक्रम अंशों में यान-मार्गों के भेद बनते है जिन्हें समस्त नगरों के अन्त तक घण्टा मार्ग नाम से प्रसिद्धि प्राप्त है। इन्हें नगर की मुख्य सड़क (घण्टा मार्ग या घण्टा पथ) राजमार्ग भी कहते हैं।