भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 445, कुल 535 में से

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प्राकारोच्छ्रयमाह — सूर्यषोडशविंशत्यः प्राकारोर्ध्वं त्रिधोदितम्। द्वादशाष्टौ दश वापि प्राकारस्कन्धविस्तृतिः ॥ 8 ॥ अब नगर के प्राकारों की तीन प्रकार की ऊँचाई के अनुसार बताते हैं कि यह ऊँचाई 12, 16 और 20 गज की क्रमशः कनिष्ठ, मध्यम और ज्येष्ठ होती है। इन प्राकारों के ऊपर के स्कन्धों की चौड़ाई भी क्रमशः 8, 10 और 12 गज उपयुक्त कही गई है। समादशकरोच्छ्रिता 'प्राकारं द्विहीनाधिकम् ?। द्विकराधिकैमर्ध्यं च चोच्छ्रिता कण्डवारणी ॥ 9 ॥ कण्डवारणी स्थिता च पृथूदये च शिरोवापि ?। घनानि कपिशीर्षाणि ह्यष्टाङ्गुल्यन्तराणि ॥ 10 ॥ इसके साथ ही 17 गज की ऊँचाई वाले प्राकार-परकोटे के दो कम दो अधिक गज तक की छूट समझें। प्राकार के स्कन्ध पर बने चौड़े मार्ग पर सुरक्षा के लिए उसके एक ओर दो गज के आसपास की ऊँचाई की कण्डवारणी अर्थात् डोली बनानी चाहिए (कण्ड = रक्षा करना, बचाना; वारणी = प्रतिरक्षा करने वाली) अर्थात् डोली-भित्ति। यह कण्डवारणी पर्याप्त ऊँची होनी चाहिए और उसके सिर पर घनानि (पास-पास) कपिशीर्ष या कंगूरे 8-8 अङ्गुल के अन्तर पर बनाने चाहिए। प्राकारान्ते रथाः कार्या दिग्भास्वच्छक्रविस्तरः। चत्वारिंशस्त्रिंशमध्यं शाश्वतं च रथन्तरम् ॥ 11 ॥ प्राकार के अन्त में रथमार्ग करने चाहिए जो स्वच्छ विस्तार युक्त दश गज तक की चौड़ाई के होंगे और इन रथमार्गों के मध्य का अन्तर 20 या 30 गजों को आस-पास शाश्वत कहा गया है। प्रवेशद्वारलक्षणं — उत्सङ्गः पूर्णबाहुश्च हीनबाहुस्तथापरः। प्रतिकायमिति प्रोक्तं प्रवेशानां चतुष्टयम् ॥ 12 ॥ अब चार प्रकार के नगर प्रवेश द्वारों के बारे में कहता हूँ— 1. उत्सङ्ग, 2. पूर्णबाहु, 3. हीनबाहु और 4. प्रतिकाय— ये चार प्रवेश द्वारों के नाम कहे गए हैं।

  1. 'प्रासादं ?' इति प्रकाशित पाठः।
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