अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
DevanagariHindipublished535 पृष्ठ
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सूत्र-७२ 401 आनन्दश्च तथोत्कण्ठो जयन्तो रिपुमर्दनः । कर्णालयश्च चत्वारो वृत्ताकारेण संस्थिताः ॥ 13 ॥ इन द्वारों में भी 1. आनन्द, 2. उत्कण्ठ, 3. जयन्त और 4. रिपुमर्दन नगर के चारों कोनों पर गोलाकार निर्मितियाँ अच्छी तरह से बनाई जाती हैं। सिंहावलोकनाश्चैव योधविद्याधरीयकाः । एकान्तरप्रभेदेन क्रमेवापि सुसंस्थिताः ॥ 14 ॥ इन सभी द्वारों के ऊपर की ओर सिंहावलोकन अर्थात् विशाल गोखड़े-झरोखे और योध विद्याधरी अर्थात् बारहदरी¹ एक-एक के अन्तर पर क्रम से ठीक तरह बनी होती है अर्थात् झरोखों के बाद बारहदरी और बारहदरी के बाद पुनः अन्तराल पर झरोखे आदि क्रमानुसार बनाए जाते हैं। चत्वरे देवस्थानानि — षट्त्रिंशतश्च षड्वृद्धौ विदुरष्टोत्तरं शतम् । पुरे प्रासादसङ्ख्याभिर्देवस्थानानि चत्वरे ॥ 15 ॥ इसके अतिरिक्त 36 से आगे 6-6 की वृद्धि करते हुए 178 संख्या हो जाए, उतनी संख्या नगरों के प्रासादों अर्थात् मन्दिरों की और देवता के स्थानों की होती है जो कि चौराहों (चत्वर) के साथ बनते हैं।² पुर्मानानि द्वादशैव चत्वरं देवसङ्ख्यया । अनुक्रमेण कर्त्तव्यं पुरच्छन्दानुरूपतः ॥ 16 ॥ पुरों के मान भी बारह है जो चौराहों पर स्थापित देवताओं की संख्या जितने ही हैं। इनको भी पुरों के छन्दों के अनुरूप ही अनुक्रम से निवेशित करना चाहिए। देवस्य मुखस्थितिं — नोत्तराभिमुखाः कार्या न देवा दक्षिणामुखाः । पूर्वापरमुखाः कार्या वास्तुशास्त्रेषु गीयते ॥ 17 ॥ पुरों में देवताओं को न तो कभी उत्तराभिमुखी करें न दक्षिणाभिमुखी क्योंकि
- सूत्रधार मण्डन ने कहा है— प्राकारेऽपि च कोष्ठका दशकराः सूर्येन्द्रहस्तास्तथा प्रोक्तास्तेन समैव कोणसहिता विद्याधरी मध्यगाः । (राजवल्लभ. 4, 15)
- सूत्रधार मण्डनकृत वास्तुमण्डनं में कहा गया है कि दुर्ग, देवस्थान व चत्वर या चबूतरों पर यदि 36 हाथ की चौड़ाई हो तो वहां की लम्बाई छह हाथ अधिक रखनी चाहिए। इस प्रकार सौ पर अनुपातः बारह हाथ अधिक रखना चाहिए—षट्त्रिंशत् प्रथमे दुर्गे देवस्थानानि चत्वरेषण्णाम्। (वि)वृद्धया क्रमेणैव द्वादशेह्याऽधिकशतम् ॥ (वास्तुमण्डनम् 3, 13)