अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें402 अपराजितपृच्छा वास्तुशास्त्रों में यह कहा गया है कि देवता सदा पूर्वाभिमुखी अथवा पश्चिमाभिमुखी ही स्थापित होते हैं। पुरप्राकारबाह्ये तु देवा यत्र च संस्थिताः। नगराभिमुखास्त्वेव मध्यमे च पराङ्मुखाः॥ 18॥ पुर की दीवार या प्राकार के बाहर जो देव मन्दिरादि बनाए जाएँ उनके मुख सदा नगराभिमुखी होने चाहिए और पुर के मध्य में जो देवता मन्दिर बने हैं उनको बाह्यमुखी बनाएँ। पराङ्मुखा स्थिता ये तु शिवः सूर्यो विधिर्हरिः। हन्यते तत्पुरं राष्ट्रे राज्यध्वंसश्च जायते ॥ 19॥ यदि शिव, सूर्य, विधि और हरि की मूर्तियाँ नगर के पराङ्मुख अर्थात् उलटी हुई या पीठ पीछे की हुई बनाई जाएंगी तो नगर, उस पुर, या राष्ट्र का हनन होगा और राज्य विध्वंस तक हो जाएगा। अस्तु, इन देवों की स्थापना नगर की ओर मुख किए हुए ही करनी चाहिए जो शुभफलदायी होती है।¹ प्राकारान्तरे परिखप्रमाणादीनां — प्राकारोच्छ्रयाद् द्विगुणं तदन्ते परिखात्रयम्। अम्भो ? विमार्गशस्तादिग्विधिक्षु च जलाश्रयाः ॥ 20॥ अब प्राकार के बाहर परिखाओं, खाइयों के बारे में कहता हूँ। प्राकार अर्थात् नगरकोट जितने हाथ गज ऊँचा हो उतने से दुगुने गजों की दूरी रखते हुए बाहर की ओर तीन परिखा अर्थात् खाइयाँ खोदी जाए। उनको पर्याप्त जल से पूरित कर दें और उनके द्वारा दिशा और विदिशाओं में आने-जाने के मार्ग भी जल के आश्रय के बने हों अर्थात् जल से भरी हुई खाइयों के आर-पार जाने के साधन या तो जलाश्रयी नावें हो या काष्ठ निर्मित उठाऊ पुलिया बनी हुई हों जो आवश्यकता के अनुसार आवागमन के लिए लगाई जा सके और रोकने के लिए हटाई जा सके जिससे खाई के जल को पार न किया जा सके। कनिष्ठे च पुरे पादात् मध्यमे च पदार्धतः। षोडशांशात् पुरे ज्येष्ठे ह्यतिरिक्ते च बाह्यतः ॥ 21॥ कनिष्ठ पुर में एक चौथाई, मध्यम पुर में आधा और ज्येष्ठ पुर में पूरा ही बाहर की ओर अतिरिक्त भाग रखें।
- राजवल्लभ में भी यही मत है— ब्रह्मा विष्णुशिवेन्द्रभास्करगुहाः पूर्वापरास्याः शुभाः प्रोक्तौ सर्वदिशामुखौ शिवजिनौ विष्णुर्विधाता तथा। चामुण्डा ग्रहमातरो धनपतिद्वैमातुरो भैरवो देवा दक्षिणदिङ्मुखाः कपिवरो नैर्ऋत्यवक्त्रो भवेत्॥ (राजवल्लभ. 4,13) अग्निपुराण में भी मंदिर नगरोन्मुखी बनाने का उल्लेख है।