अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
402 अपराजितपृच्छा वास्तुशास्त्रों में यह कहा गया है कि देवता सदा पूर्वाभिमुखी अथवा पश्चिमाभिमुखी ही स्थापित होते हैं। पुरप्राकारबाह्ये तु देवा यत्र च संस्थिताः। नगराभिमुखास्त्वेव मध्यमे च पराङ्मुखाः॥ 18॥ पुर की दीवार या प्राकार के बाहर जो देव मन्दिरादि बनाए जाएँ उनके मुख सदा नगराभिमुखी होने चाहिए और पुर के मध्य में जो देवता मन्दिर बने हैं उनको बाह्यमुखी बनाएँ। पराङ्मुखा स्थिता ये तु शिवः सूर्यो विधिर्हरिः। हन्यते तत्पुरं राष्ट्रे राज्यध्वंसश्च जायते ॥ 19॥ यदि शिव, सूर्य, विधि और हरि की मूर्तियाँ नगर के पराङ्मुख अर्थात् उलटी हुई या पीठ पीछे की हुई बनाई जाएंगी तो नगर, उस पुर, या राष्ट्र का हनन होगा और राज्य विध्वंस तक हो जाएगा। अस्तु, इन देवों की स्थापना नगर की ओर मुख किए हुए ही करनी चाहिए जो शुभफलदायी होती है।¹ प्राकारान्तरे परिखप्रमाणादीनां — प्राकारोच्छ्रयाद् द्विगुणं तदन्ते परिखात्रयम्। अम्भो ? विमार्गशस्तादिग्विधिक्षु च जलाश्रयाः ॥ 20॥ अब प्राकार के बाहर परिखाओं, खाइयों के बारे में कहता हूँ। प्राकार अर्थात् नगरकोट जितने हाथ गज ऊँचा हो उतने से दुगुने गजों की दूरी रखते हुए बाहर की ओर तीन परिखा अर्थात् खाइयाँ खोदी जाए। उनको पर्याप्त जल से पूरित कर दें और उनके द्वारा दिशा और विदिशाओं में आने-जाने के मार्ग भी जल के आश्रय के बने हों अर्थात् जल से भरी हुई खाइयों के आर-पार जाने के साधन या तो जलाश्रयी नावें हो या काष्ठ निर्मित उठाऊ पुलिया बनी हुई हों जो आवश्यकता के अनुसार आवागमन के लिए लगाई जा सके और रोकने के लिए हटाई जा सके जिससे खाई के जल को पार न किया जा सके। कनिष्ठे च पुरे पादात् मध्यमे च पदार्धतः। षोडशांशात् पुरे ज्येष्ठे ह्यतिरिक्ते च बाह्यतः ॥ 21॥ कनिष्ठ पुर में एक चौथाई, मध्यम पुर में आधा और ज्येष्ठ पुर में पूरा ही बाहर की ओर अतिरिक्त भाग रखें।
- राजवल्लभ में भी यही मत है— ब्रह्मा विष्णुशिवेन्द्रभास्करगुहाः पूर्वापरास्याः शुभाः प्रोक्तौ सर्वदिशामुखौ शिवजिनौ विष्णुर्विधाता तथा। चामुण्डा ग्रहमातरो धनपतिद्वैमातुरो भैरवो देवा दक्षिणदिङ्मुखाः कपिवरो नैर्ऋत्यवक्त्रो भवेत्॥ (राजवल्लभ. 4,13) अग्निपुराण में भी मंदिर नगरोन्मुखी बनाने का उल्लेख है।
सूत्र-७२ 403 प्रतोली राजगेहाग्रे राजमार्गस्तदग्रतः । विस्तीर्णा विंशतिकरैर्द्विरष्टद्वादशाधमा ॥ २२ ॥ राजभवन के आगे बनी प्रतोली अर्थात् बड़ी पोल से जाने वाला राजमार्ग आगे से 20 गज चौड़ा हो तो ज्येष्ठ, 16 गज चौड़ा हो तो मध्यम और 12 गज चौड़ा हो तो कनिष्ठ कहा गया है। हट्टश्रेणिस्ततः कार्या षोडशांशेन मार्गतः । बलिकर्मसमस्तानां हट्टोपरि गृहोत्तमम् ॥ २३ ॥ इसके बाद, राजमार्ग पर दुकानों की कतारें बनानी चाहिए जो राजमार्ग के 16वें भाग की चौड़ाई जितनी सड़क से दूरी पर हों। इन हाटों अर्थात दुकानों के ऊपरी भागों पर समस्त कर्मों के लिए उत्तम गृहों (कार्यशालाएँ) को बनाएँ। विदिशासु पुरं कार्यं जगत्यस्त्रिगुणं शुभम्। युग्मगृहाश्च कर्त्तव्याः पक्षयोश्चैव सन्मुखाः ॥ २४ ॥ पुर अर्थात नगर की विदिशाओं में इससे भी अर्थात् सोलवें भाग की चौड़ाई से भी तीन गुणी चौड़ाई की शुभ जगती अर्थात् चबूतरियाँ बनाएँ जिनके दोनों पक्षों पर अर्थात आजू-बाजू पर, आमने-सामने युग्म भवन होने चाहिए। प्रासादस्य प्रमाणेन पादोनेनाथवोच्यते। प्रासादार्द्धात्तु कर्तव्या ज्येष्ठ-मध्य-कनिष्ठिकाः ॥ २५ ॥ प्रासाद अर्थात् भवन के प्रमाणानुसार उन्हें प्रासाद के प्रमाण के बराबर ज्येष्ठ, प्रासाद के प्रमाण के एक पाद कम अर्थात् पौन भाग मध्यम और प्रासाद प्रमाण का आधा कनिष्ठ को रखें। एकभौमा द्विभौमा वा शाला निर्गमभूषिता । मत्तवारणसंयुक्ता निर्गताश्चित्रशालिकाः ॥ २६ ॥ जगत्यग्रे वामनं स्याद् भिट्टं तद्भुवि संस्थितम् । महोत्सवे च वासन्ते कुर्याद्धिन्दोलकं त्विह ॥ २७ ॥ इन भवनों में भी एक मंजिला, दो मंजिला भवन और शाला निर्गम अर्थात रोस भी बनाएँ जिससे आने-जाने की सुविधा रहे। उस रोस पर छाया के लिए मत्तवारण भी बना हो अर्थात छज्जे हों। उन भवनों के बाहर की ओर चित्रशाला बनाएँ अर्थात् दीवारों पर चित्र बने हों।¹ जगती के आगे उससे लगी हुई छोटी भिट्ट अर्थात् भींत
- प्राचीन भवनों में ऐसे चित्र आज भी देखे जा सकते हैं। चित्तौड़ दुर्ग पर कुम्भा महल, जयमल-पत्ता की हवेलियों पर इस प्रकार का चित्राङ्कन कार्य अद्यावधि शेष है। नाथद्वारा में महुआगढ़, मोतीमहल आदि
404 अपराजितपृच्छा बनाएँ और किसी महोत्सव या त्योहारों के लिए आमोद-प्रमोद हेतु वहाँ हिन्दोलक¹ अर्थात् हिन्दे-झूले, डोलर इत्यादि लगाएँ (अथवा हिण्डोलक तोरण बनवाएँ)। नृत्यशालिकाः — देवस्य परतः कार्या निगूढा नृत्यशालिकाः। पूर्वस्यामथवाग्नेय्यां वायव्ये वारुणे शुभम् ॥ २8 ॥ देव मन्दिर के सामने बड़ी गहरी नृत्यशालिका बनानी चाहिए। इनकी स्थिति पूर्व में, अग्निकोण में वायुकोण में या वारुण अर्थात् पश्चिम दिशा में उचित होती है। मठस्थानं — शेषासु ह्यप्रशस्ताश्च आग्नेय्यां सत्रमण्डपम्। वास्तुवेदीसंस्थितं तन् मठः स्थाप्यस्तु दक्षिणे ॥ २9 ॥ अन्य दिशाएँ उक्त नृत्यशाला के लिए अप्रशस्त कही गई है। आग्नेय कोण में यज्ञादिक सत्रों के लिए मण्डप बनाने चाहिए। जहाँ वास्तु की यज्ञ वेदी बनी हुई हों और उस के सञ्चालन का मठ अर्थात् याजक ब्रह्मचारियों के पढ़ने-रहने के आवास दक्षिण की दिशा में बनाएँ। गृहं पञ्चारिकायुक्तं मैत्रस्थानसमाश्रितम्। यतिध्यानालयं कुर्यात् ²प्रलीना यत्र शासने ॥ 30 ॥ वहाँ गृह पञ्चारिका युक्त अर्थात् उपयुक्त आकार का पञ्चायत घर बनाएँ तथा वह मैत्र स्थान या पद के समाश्रित कहा है अर्थात् नगर की चौपाल (मैत्रस्थान) से लगा हुआ हो; वहीं आस-पास यतियों, साधु-महात्मा के लिए एकान्त ध्यानार्थ उपयुक्त, शान्त वातावरण वाला ध्यानालय भी बनाएँ जो शासन के प्रबन्ध से चलाया जाए। पुरसीमान्तप्राकारे प्रतोलीहट्टमार्गयोः। जलाश्रयं जगत्यन्ते(यत्रे!) घटिमालासमुद्भवम् ॥ 31 ॥ और उदयपुर में बागोर की हवेली और अन्य हवेलियों के हाथी-घोड़े, छड़ीदार, वरयात्रा, कलशधारिणी रमणियों आदि के चित्राङ्कन मनोहारी दिखाई देते हैं।
- भूलोकमल्ल सोमेश्वर ने हिन्दोलक क्रीड़ा का वर्णन किया है। अजन्ता के चित्रों में हिण्डोल क्रीड़ा के चित्र बने हैं। ये वसन्तोत्सव की वेला में होती थीं— ऋतुराजे परिप्राप्ते वसन्तेति मनोहरे। आन्दोलने प्रकुर्वीत पृथुसम्बद्धयान्विताम्॥ महता तूर्यघोषेण वन्दीवन्देन वन्दितः। गीतवाद्यविनोदेन विप्राशीर्भिर्हृष्टः॥ आरोहेच्चतमान्दोलनं प्रेयसीभिः समन्वितः॥ स्तूयमान्वस्तदा राजा राजते देवराजवत्। सन्तर्प्य प्रियै (मुखे ताम्बूलं) वस्त्रविभूषणैः॥ ब्राह्मणानायकार्दीश्चैतत् सर्वान्वितसर्जतः। ततः कान्ताजनैः सार्धं क्रीडादान्दोलकैर्नृपः॥ (मानसो. 5, 3, 183-187)
- 'प्रलीना' जिसमें घला मिला होः 'यत्र' जहाँ शासन भी हो।
सूत्र-७२ 405 इसी तरह शासन की ओर से और भी व्यवस्थाओं का वर्णन है। नगर के सीमान्त या दीवारों, परकोटों के पास, प्रतोली या पोलों-दरवाजों के पास, हट्टमार्गेयो- बाजारों के मार्गों के पास जगत्यन्ते- चबूतरी के अन्त में जलाशय बनाए जाने चाहिए और उन पर जलोत्थान के लिए घटिमाला¹ (रहट अथवा नेज-डोरी गिरगिड़ी) की व्यवस्था होनी चाहिए। तत्र मण्डपिकादीनां - क्रयवस्तुयुतौकश्च तदग्रे विक्रयादिकम्। यतश्चागम्यते लोकैर्वर्तते जनसङ्कुलम्॥ ३२ ॥ (अब व्यापार मण्डी की व्यवस्था के बारे में कहते हैं) जहाँ मण्डियों में क्रय वस्तु अर्थात् सामान के क्रय-विक्रय के निमित्त लोगों का आना-जाना लगा रहे और भीड़- भाड़ बनी रहती हो [वहाँ उपर्युक्त जलस्रोतादि के प्रबन्ध में कमी नहीं रहनी चाहिए]। स्वर्णकारं सुगन्धं च गन्धिकं च तृतीयकम्। दन्तकर्म धान्यगृहमेतत्कुर्यात्तु पूर्वतः॥ ३३ ॥ इसी तरह मण्डी की व्यवस्थाओं में स्वर्णकारों-सर्राफों की दुकानें, तथा
- उपनिषदों में रहट का वर्णन मिलता है, 906 ई. के आसपास हुए सिद्धर्षि ने 'उपमितिभावप्रपञ्चकथा' में रहट का वर्णन किया है तथा 10वीं सदी में ही जालोर में लिखित 'कुवलयमाला' में रहट का उल्लेख मिलता है, वहां जन्मचक्र को रहट के उपमान के साथ समझाया गया है। आद्य शङ्कराचार्य ने छान्दोग्योपनिषद के भाष्य और अज्ञानबोधिनी ग्रन्थ में 'घटीयन्त्रकूपे' लिखकर इस यन्त्र के आठवीं सदी में प्रचारित होने का सङ्केत दिया है। 'प्रबन्धचिन्तामणि' में अरघट्टघटीयन्त्र नाम से उल्लेख मिलता है। रहट का प्राचीनतम विवरण विनयपिटक पर समन्तपादिका टीका में उपलब्ध होता है, जबकि चुल्लवंग्ग में तुलम्, करकटकम्, चक्कवट्टकम् नाम से सिंचाई के यन्त्रों का सङ्केत मिलता है। दूसरी सदी में हुए विष्णु शर्मा ने 'पञ्चतन्त्र' तथा इसके प्राचीन पाठ 'तन्त्राख्यायिका' में भी रहट का वर्णन एक मेंढक व सांप के आख्यान के साथ हुआ है। बारहवीं में पूर्णभद्र द्वारा लिखित 'पञ्चाख्यानक' में भी रहट का जिक्र है, यह ग्रन्थ मेवाड़ में लोकप्रिय था और महाराणा उदयसिंह के शासनकाल में चित्तौड़ में इसकी प्रतिलिपि तैयार हुई थी। इसी प्रकार हर्षचरित, कादम्बरी में क्रमशः उद्घाटघटी, चूनम नाम से रहट का उपयोग हुआ है, ये मालवा-मेवाड़ में लोकप्रिय थे। 'विक्रमाङ्कदेवचरित' में 'घटियन्त्रगुणोपम' कहकर इसे उपमेय रूप में दर्शाया गया है। हलायुध के 'अभिधानरत्नमाला' में नहरों के पानी का उत्थान करने वाले एक साधन के रूप में रहट का उल्लेख किया गया है जिस पर शब्दकोशकार मोनियर विलियम ने अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया है। मेवाड़ की सीमा पर मन्दसौर में यशोधर्मन के 510 ई. के अभिलेख में वहाँ खुदवाए गए कूप पर निरन्तर जलोत्थान के लिए प्रयुक्त यन्त्र के रूप में मालाकार जलयन्त्र का प्राचीनतम उल्लेख है जबकि रहट के साथ खेतों के दान का प्रथमतः उल्लेख वीरपुरा, उदयपुर के 1185ई. के ताम्रपत्र में है जिसमें गुजरात के भीमसिंह के सामन्त अमृतपाल द्वारा लसाड़िया गाँव में अरहट के साथ भूमिदान का अहद है। (कला की कालकथा : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू', रहट प्रकरण)
406 अपराजितपृच्छा गन्धी- अत्तारों की दुकानें और गन्ध-मसालों की दुकानें, हाथी-दांत के कारीगर, चूड़ीगरों आदि की दुकानें, धान्यगृह अर्थात् अनाज, गेहूँ, तिलहन-दलहन आदि जिंसों के भण्डारों की व्यवस्था भी जरूरी है। वहाँ भी पहले बताई, वैसी ही जल आदि की व्यवस्था भी होनी चाहिए। ताम्बूलफलसङ्कीर्णं पुष्पमालादिसङ्कुलम्। राजद्वाराग्रतश्चैव यतः स्याच्च जनाकुलम्॥ ३४॥ इसी प्रकार राजद्वारों के आगे भी जहाँ लोगों की भीड़-भाड़ बनी रहती है, वहाँ भी पनवाड़ियों-तम्बोलियों की दुकानें, फल वाले, पुष्प-मालादि के लिए मालियों की दुकानों का सङ्कुल अर्थात् समूह रूप में विपणन केन्द्र होना चाहिए। मञ्जिष्ठरङ्गशोभाढ्यं नारिकेलसमाकुलम्। त्रिगणोपस्कराद्यं च राजद्वारोत्तरे शुभाः॥ ३५॥ इसी तरह राजद्वार के उत्तर की दिशा में में मञ्जिष्ठ या मंजिठे के रंग बनाने वाले रङ्गरेजों, नारियल के भण्डारों के व्यापारी तथा सांसारिक जीवन में धर्म, अर्थ और काम— त्रिगणों के काम में आने वाले पदार्थ, उपस्करों की दुकानों की व्यवस्था भी शुभ कही है। आयसोपस्करं सर्वं शस्त्रादि विविधं तथा। व्यजनच्छत्रमायूरं शाश्वतं दक्षिणे शुभम्॥ ३६॥ इसी तरह राजद्वार के दक्षिण की ओर के विपणन केन्द्र में लोहादि धातु के उपकरणों, वस्तुओं के व्यापारियों की दुकाने और सभी प्रकार के विविध शस्त्रादि के व्यापारियों की दुकानें— व्यजन, पङ्खे-बीजणे, छत्र, चामर, मक्खी-मच्छर हटाने की चँवरियाँ आदि के विक्रेताओं की स्थायी दुकानें बनी हुई शुभ होती हैं। ईशाने च वस्त्रहयं पट्टिनेत्रपट्टाद्यकम्। स्वल्पवस्त्राद्याग्रेय्यां च वस्त्रबन्धस्तदग्रतः॥ ३७॥ राजद्वार के ईशान कोण की ओर के विपणन केन्द्र में कपड़े के व्यापारियों या बजाजों की दुकानें और घोड़े के गजगाव-झूल, झीण आदि वस्त्र और काठी तथा लगाम, (पट्टिनेत्रपट्टदिकं) की दुकानों के व्यापारियों की स्थिति उचित है। राजद्वार के आग्नेय दिशा की ओर छोटे वस्त्रों की व्यापारियों तथा वस्त्रों की-बन्धनी के रङ्गरेज-बनारा आदि और दर्जी आदि की दुकानें होनी चाहिए। रक्तकाद्युत्तरे शस्तं कृष्णरङ्गादि दक्षिणे। पूर्वतः श्वेतवस्त्राद्यं राजवेश्माग्रकल्पितम्॥ ३८॥
सूत्र-७२ 407 यह भी ध्यान रखना चाहिए कि राजद्वार के उत्तर की ओर लालरङ्ग से कपड़ों की रङ्गाई करने वालों के मोहल्ले या दुकानें होना ठीक है और काले रङ्ग से कपड़ों की रङ्गाई करने वालों के मोहल्ले व दुकानें दक्षिण दिशा में प्रशस्त मानी है। सफेद वस्त्रों के व्यापारियों के बाजार, मोहल्ले व दुकानें पूर्व दिशा में होना प्रशस्त कहा है, जिसे राजभवन के आगे की ओर कल्पित किया जाएगा। अष्टादशानां धान्यानां सर्वदिक्षु च विक्रयः। ताम्बूलानां च पूगानां विक्रयो देवताग्रतः ॥ ३९ ॥ नागरिकों के लिए अठारह प्रकार के धान्यों के क्रय-विक्रय की दूकानें नगर की सभी दिशाओं के बाजारों में, सर्वत्र होनी चाहिए। पान वालों या पनवाड़ियों- तम्बोलियों की दूकानें व सुपाड़ी बेचने वाले की दुकानें देवताओं के मन्दिरों के आगे लगे बाजारों में होनी चाहिए। ( तां )दलांक्ष ?¹ चित्रलेखाद्या गृहेषु पुरवासिनाम्। छिंपिका रजकास्त्रैणाः स्वदेवादिपुरे स्थिताः ॥ ४० ॥ पुरवासियों की सुविधा के लिए (तलारक्ष या लक्षकार-लखारे), चित्रकार- चितारे, छीपा, रजक-धोबी आदि की दुकानें उनके अपने-अपने (पुरे) मोहल्लों में ही उनके देवालयों सहित होनी चाहिए। वर्णादीनां निवेशनं - ब्राह्मणाः पूर्ववास्तव्याः क्षत्रियाश्चैव दक्षिणे। प्रशस्ताश्चोत्तरे शूद्रा वैश्या मध्ये च सङ्कुलाः ॥ ४१ ॥ नगर में चारों वर्ण के समाजों की बस्तियों की भी समुचित व्यवस्था होनी ही चाहिए जैसे- ब्राह्मणों की ब्रह्मपुरी राजभवन के पूर्व दिशा के नगर भाग में हो, क्षत्रियों की हवेलियाँ दक्षिण के नगर भाग में, शूद्रों के मोहल्ले उत्तर के भाग में बसाने चाहिए और वैश्यों के आवास नगर के भीड़ भरे मध्य भाग में निवेशित करने चाहिए। पुरे पुरे च विप्राक्ष क्षत्रिया वैश्यशूद्रकाः । तद् बाह्यतस्तथा चान्यास्तथा स्थपतिसङ्कुलाः ॥ ४२ ॥
- 'तलारक्ष' इति स्यात्। इस ग्रन्थ की रचना के समय तक नगरों में तलारक्ष का पद होता था। चीरवा के 1273 ई. के अभिलेख में तलारक्ष के रूप में योगराज के पुत्र पमराज का नाम आया है, योगराज का चौथा पुत्र क्षेम चित्तौड़दुर्ग का तलारक्ष था : श्रीपद्मसिंह भूपालयोगराजस्तलारताम्। नागह्रदपुरे प्राप्तपौर प्रीति प्रदायकः ॥ क्षेमस्तु निर्मितं क्षेमाश्चित्रकूटे तलारताम्। राज्ञः श्रीजैत्रसिंहस्य प्रासादादापदुत्तमात् ॥ (वियना ओरियण्टल जर्नल जिल्द 21, पृष्ठ 155-162 एवं एपिग्राफिया इण्डिका जिल्द 27, पृष्ठ 285-
- इसी शिलालेख में भुवनदेव का नाम भी आया है।
408 अलग-अलग मोहल्लों में (यथा- गुर्जरपुरा, तेलीपुरा आदि) ब्राह्मणों की, क्षत्रियों की, वैश्यों की और शूद्रों की बस्तियाँ साथ हो परन्तु इन मोहल्लों से बाहर अन्य स्थपति सङ्कुल अर्थात् कारीगरों के समूह व कारखाने होंगे। विप्र-क्षत्रिय-वैश्यानां प्राकारा वै निवासिनाम्। वणिक् कर्मकराणां च मध्यानां च सुखावहाः ॥ 43 ॥ नगर व्यवस्था में यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि विप्र, क्षत्रिय और वैश्यों की बस्तियाँ नगर के परकोटे की तरह बनी हो और वणिकों की तथा कारीगरों की बस्तियाँ इनके बीच में बनी हो तो सुखदायी होती है। विदिक्षु दिक्षु वै कार्या नगरस्वस्तये यथा। अष्ट₈ द्विरष्ट₁₆ द्वात्रिंश₃₂ दधमा मध्यमोत्तमाः ॥ 44 ॥ चतुर्वर्णांश्च प्रकृतीरैकैकेषु पुरेषु च। सर्वत्र वासयेच्चैव नागरांश्च सुखावहान् ॥ 45 ॥ इन सभी बस्तियों को सभी दिशाओं और विदिशाओं में निर्देशानुसार ही नगर के स्वस्ति अर्थात् भलाई के लिए बसाना आवश्यक है। नगर में चारों वर्णों के पुर अर्थात् मोहल्ले भी क्रमशः आठ-आठ की संख्या में हो तो अधम, सोलह-सोलह हो तो मध्यम और तीस-तीस हो तो उत्तम माने जाते हैं। इस प्रकार से वर्णानुसार बस्तियों का निवेशन नागरिकों के लिए सुखद होता है। पूर्वे ब्राह्मणलोकाश्च क्षत्रियाश्चैव दक्षिणे। निवेश्याश्चोत्तरे शूद्राः पश्चिमे तु जलाश्रयाः ॥ 46 ॥ ब्राह्मणों की बस्तियाँ पूर्व की ओर, क्षत्रियों की बस्ती दक्षिण, शूद्रों की बस्ती उत्तर की ओर हो तथा पश्चिम दिशा की ओर जलाशय बनाएँ। पूर्वयाम्योत्तरे शस्तं हट्टमार्गादिचत्वरम्। ईशाने शिल्पिनः सर्वे रजकाश्छिंपकाः परम् ॥ 47 ॥ पूर्व दिशा, दक्षिण दिशा और उत्तर दिशा की ओर हाट-बाजार व मार्ग, चत्वर- चौक आदि प्रशस्त माने गए हैं। ईशान कोण की दिशा में समस्त शिल्पियों की
सूत्र-७२ 409 बनाने-बेचने वालों की बस्तियाँ व वायव्य कोण में बुनकर-जुलाहों-सालवियों की बस्तियाँ बसानी चाहिए। पुरसुरक्षार्थे प्राकारोपरि यन्त्रनिवेशनं — पुरमध्ये च सर्वत्र प्राकारस्य तथोपरि। स्थापयेत्सूत्रयन्त्रं च विविधं कर्मरौद्रकम् ॥ 49 ॥ यन्त्राणि चित्ररूपाणि विश्वकर्मेरितानि च। अब नगर की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में कहता हूँ। नगर के मध्य में तथा परकोटे के ऊपर भी सर्वत्र तरह-तरह के भयानक, रुद्र कर्म करने में समर्थ सूत्र यन्त्र अर्थात् गोफण अथवा यन्त्रों के सूत्र में रखना अर्थात् परकोटे आदि पर क्रमबद्ध रखना चाहिए। तरह-तरह के विचित्र रूप के यन्त्र विश्वकर्मा ने बनाए हैं।¹ नाना यन्त्रनामानि — तेषां नामानुक्रमं च कथये तव साम्प्रतम् ॥ 50 ॥ प्रथमं भैरवं यन्त्रं द्वितीय चैव भास्करम्। गौरीयन्त्रं चतुर्थस्यात्तृतीयं महिषासुरम् ॥ 51 ॥ वाराहं पञ्चमं चैव महायन्त्रं च षष्ठकम्। अब मैं उन यन्त्रों के नामों को अनुक्रम से कहता हूँ। जो परकोटे पर नगर सुरक्षा में बड़े महत्व के हैं इनमें प्रथम है भैरव यन्त्र, द्वितीय भास्कर यन्त्र, तृतीय महिषासुर यन्त्र, चतुर्थ गौरी यन्त्र, पञ्चम वाराह यन्त्र और षष्ठ महा यन्त्र है।²
- मत्स्यपुराण में कहा गया है— यन्त्रायुधादृाट्टालचयोपपन्नं समग्रधान्यौषधिसम्प्रयुक्तम्। वणिग्जनैश्चावृतमावसेत दुर्गे सुषुप्तं नृपतिः सदैव॥ (मत्स्य. 217, 87) तुलनीय— दुर्गे च यन्त्राः कर्तव्या नाना प्रहरणाान्विताः। सहस्रघातिनो राम तैस्तु रक्षा विधीयते॥ (विष्णुधर्मोत्तर 2, 26, 27) राजवल्लभ. में कहा गया है— यन्त्राः पुराणामथ रक्षणाय संग्रामवक्त्र्यम्बुसमीरणाख्याः। विनिर्मितास्ते जयदा नृपाणां भवन्ति पूज्याः सुरया च मांसैः॥ (राजवल्लभ. 4, 21) पूर्वकाल में विश्वकर्मा के बनाए यन्त्रों का वर्णन वास्तुमण्डनम् में आया है। प्राचीनकाल में जबकि देवताओं और असुरों के बीच सङ्ग्राम हुआ, देवताओं के विजय के लिए शङ्कर ने जिन यन्त्रों का प्रयोग किया, वे विश्वकर्मा ने बनाए थे। रक्तबिन्दु ने जब पाषाण यन्त्रों से देवसेना को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया तब देवताओं ने उक्त शिवोक्त विश्वकर्मणीय यन्त्रों का प्रयोगकर दैत्यों पर विजय को प्राप्त किया था। ये यन्त्र चौरासी प्रकार के हैं। इनमें से वायव्य और जलयन्त्रों के नौ-नौ भेद हैं। अग्नियन्त्र के छह भेद है जबकि संग्राम यन्त्र के साठ भेद, इस प्रकार कुल चौरासी प्रकार के यन्त्र कहे गए हैं— देवासुरेणे दैत्यैः प्रबलैर्निर्जिताः सुराः। ततो यन्त्राः गिरीशेनगदिता विश्वकर्मणेः॥ भिन्नास्ते यन्त्रं पाषाणै रक्तबिन्दु विवर्जिताः। छातुनरहिता दैत्यास्तदा देवैर्विनिर्जिता॥ चतुरशीति यन्त्रेषु नव वायोजर्लस्य च। अग्नियन्त्रस्य षड्भेदाः षष्टि सङ्ग्रामयन्त्रजाः॥ (वास्तुमण्डनम् 3, 37-39)
- आकाशभैरवकल्प में दुर्ग की दीवारों को नाभिमात्र गहरा छिद्र कर पङ्क्तिवार क्रमशः इसकी शिलाओं पर
अचिन्त्यमुद्गराघातं ज्वालावलि शराकुलम् ॥ 52 ॥ ये सभी छह प्रकार के यन्त्र बड़े ही अकल्पनीय आघात करने वाले मूसल, मुद्गर या गोलों को शरयुक्त¹ श्रृङ्खलाबद्ध अग्नि विस्फोटों और ज्वालाओं के साथ छोड़ने वाले भयानक हथियार हैं।² भैरव यन्त्र, नाग यन्त्र, त्रिशूल यन्त्र, रज्जु यन्त्र, मौसल यन्त्र, विषकण्टक यन्त्र, शूलमुख यन्त्र और धनुर्यन्त्रादि को स्थापित करने का उल्लेख है— नाभिमात्रे ततस्सालवलये पङ्किशः क्रमात्। शिलामु भैरवयन्त्रं नागयन्त्रञ्च मौसलम्॥ विषकण्टकयन्त्रञ्च शुक्लं शूलमुखं तथा॥ धनुर्यन्त्रादियन्त्रादि व्यस्तामिति यन्त्रकम्॥ (आकाश. साम्राज्यदीपिका, अष्टविध सालदुर्गकथनं, 17-19) सूत्रधार मण्डन ने आठों यन्त्रों के नाम बताएं हैं जो क्रमशः भैरव यन्त्र, चन्द्र यन्त्र, सूर्य यन्त्र, भीमगज यन्त्र, युग्म यन्त्र, शिखी यन्त्र, यमदण्ड यन्त्र व महाभैरव यन्त्र है। इनका प्रमाण इस प्रकार होगा— हस्ता अष्ट च भैरवो नवकराश्चान्द्रो दशाढ्यो भवेद् रुद्रोभीमगजोऽपि भास्करकरैर्युग्मं च विश्वैः शिखी। प्रोक्तोऽसौ यमदण्ड एव मुनिभिस्तिथ्या महाभैरवो ... ॥ (राजवल्लभ. 4, 22)
- कुम्भाकाल में अग्निवर्षक बाणों का उल्लेख इतिहास में आया है। वर्ष 1446-68 ई. में मालवा में खिलजी शासन में लिखित 'मआसिरे-महमूदशाही' में बान नामक आग्नेयास्त्रों का वर्णन मिलता है। माण्डलगढ़ के निकट कुम्भा की सेना व सुल्तान महमूद खिलजी की फौजों के बीच 1443 ई. में जो मुठभेड़ हुई, उसमें कुम्भा ने नैफ्ता की आग 'आतिशे-नफ्त' और तीरे हवाई का प्रयोग किया था। ऐसा ही एक उल्लेख इन दोनों फौजों के बीच 1456-57 ई. में हुए एक और टकराव के दौरान भी मिलता है। (मआसिरे-महमूदशाही पृष्ठ 57-58) इस समय प्रचलित आतिशे नफ्त और तीरे-आतिशी सम्भवतः यहां वर्णित अग्नियन्त्र ही थे। इनका विस्तार से वर्णन वास्तुमण्डनं के तीसरे अध्याय में आया है। (विशेष द्रष्टव्य- कला की कालकथा में तीर से तोप तक के यन्त्रों का वर्णन) ऐसे अग्निवर्षक बाणों का उल्लेख आकाशभैरवकल्प में आया है जो आकाश में भयङ्कर गर्जना अग्नि की चिनगारियां छोड़ते थे। (आकाश. साम्राज्यलक्ष्मीपीठिक पटल 107, 29-31) इसी प्रकार मनु ने धर्मयुद्ध में अग्नि लगाने वाले बाणों के प्रयोग का निषेध किया है। (मनु. 10, 83)
- यहाँ ग्रन्थकार ने निश्चय ही आग्नेयास्त्रों का वर्णन किया है और बारुदी प्रयोग का सङ्केत भी है। तोप को परवर्ती यन्त्र कहा जाता है, इतिहासकारों की यह धारणा अब मिथ्या सिद्ध हो चुकी हैं कि बारुद का आविष्कार 14वीं सदी में बर्थोल्ड श्वार्त्ज नामक पादरी ने किया था। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में कहा है कि बारुद का आविष्कार सम्भवतः चीन अथवा भारत में हुआ। (एनसाइक्लोपीडिया. पृष्ठ 5) यह मान्यता भी है कि तोप शब्द संस्कृत की तुप तुफ पीड़ार्थक धातु से निष्पन्न है और उसका भारतीय नाम नालिकास्त्र रहा है और बारुद को भारतीय ग्रन्थों में अग्निचूर्ण (शुक्रनीति), शुष्कमदिरा (शतघ्न्या शुष्कमदिरागोलकेन समन्विता। गर्गसंहिता 10, 33, 38-39 व 50), रञ्जक (वाशिष्ठ धनुर्वेद श्लोक 75) और जामदग्न्य चूर्ण (राजराजेश्वर परशुराम ग्रन्थ में उद्धृत जामदग्न्य धनुर्वेद) मानसोल्लास में पाषाण वर्षक व अग्नि लगाने वाले यन्त्रों से आक्रमण करने का निर्देश मिलता है— आरभेत ततो युद्धं यन्त्रपाषाणपातकैः। अनलं चानुकूलेन वायुना समुदापयेत्॥ पाषाणपातिभिर्यन्त्रैर्दाहहिनाद् दहनेन वा॥ (मानसो. 1, 2, 20, 1070-73) इसी प्रकार भुवनदेव के मुख्य उत्सकारक समराङ्गणसूत्रधार में कहा गया है कि दुर्ग की रक्षा के लिए अग्नि इत्यादि की सहायता से धनुष, शतघ्नी और उष्ट्रीवादि यन्त्रों का निर्माण करना चाहिए— ये चापाद्या ये शतघ्न्यादयोऽस्मिन्नुष्ट्रीग्रीवाद्याश्च दुर्गस्य गुप्तयै। ये क्रीडाद्या क्रीडनार्थं च राज्ञां सर्वेऽपि स्युर्योगतस्ते गुणानाम्॥ (समराङ्गण. 31, 10)
सूत्र-७३ 411 अक्षयं च दृढं युक्त्या नैकढिल्लिकसङ्कुलम्। एभिर्यन्त्रैः समायुक्तं प्राकारं भीमरूपकम् ॥ ५३ ॥ ये इतने दृढ़ और अक्षय है कि इनकी गर्जना अनेक ढोलों की गर्जना से भी अधिक घनघोर (सङ्कुल) होती है। अस्तु, इन जैसे यन्त्रों से, तोपों से सुसज्जित प्राकार अर्थात् नगर परकोटा बहुत ही भयानक परिदृश्य उत्पन्न करने वाला ही सिद्ध होता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महाराजाधिराजपुरनिवेशाधिकारो नाम द्वासप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७२ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महाराजाधिराज पुर निवेश अधिकार नामक बहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥ पुरलक्षणं त्रिसप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७३ ॥ विश्वकर्मोवाच — वक्ष्ये पुरस्य चाकारं साम्प्रतं लक्षणं पुनः । प्रशस्तं दोषरहितं पुरनामानि विंशतिः २० ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि अब मैं उन पुरों, नगरों के आकार और लक्षणों के बारे में कहता हूँ जो प्रशस्त है और दोष रहित हैं, उनके बीस नाम हैं। विंश पुरनामानि — माहेन्द्रं सर्वतोभद्रं सिंहावलोकवारुणे । नन्द्यावर्तं च नन्दाख्यं पुष्पकं चैव स्वस्तिकम् ॥ २ ॥ पार्श्वदण्डं जयन्तं च श्रीपुरं रिपुमर्दनम् । स्राहं दिव्यमुत्तरं च धर्मं कमलशक्रदे ॥ ३ ॥ महाजयं पौरुषं च साम्प्रतं कथितं बुधैः । पुराणां विंशतिश्चैव ख्याता भुवनमण्डनम् ॥ ४ ॥ इन पुरों में ( 1. ) माहेन्द्र, ( 2. ) सर्वतोभद्र, ( 3. ) सिंहावलोकन, ( 4. ) वारुण, ( 5. ) नन्द्यावर्त, ( 6. ) नन्द (नन्दाक्ष), ( 7. ) पुष्पक, ( 8. ) स्वस्तिक, ( 9. ) पार्श्वदण्ड, ( 10. ) जयन्त, ( 11. ) श्रीपुर, ( 12. ) रिपुमर्दन, ( 13. ) स्राह, ( 15. ) दिव्य, ( 15. ) उत्तर ( 16. ) धर्म, ( 17. ) कमल ( 18. ) शक्रद, ( 19. ) महाजय और ( 20. ) पौरुष— ये नाम विद्वानों ने अब तक कहे हैं। इस तरह से पुरों की
विंशति भुवन मण्डल स्वरूप में विख्यात है।¹ . नामस्य स्वरूपाणि — माहेन्द्रं चतुरश्रं च सर्वतोभद्रमायतम्। सिंहावलोकनं वृत्तं वृत्तायतं च वारुणम् ॥ ५ ॥ इनमें से माहेन्द्र नामक नगर चौकोर होता है और सर्वतोभद्र आयत रूप में होता है। सिंहावलोकन पुर वृत्तरूप में होता है और वारुण पुर वृत्तायत रूप का होता है। मुक्तकोणं च नन्दाक्षं (ख्यं !) नन्द्यावर्तं च स्वस्तिकम्। पुष्पकमष्टदलाख्यं स्वस्तिकं तु चाष्टाश्रकम्॥ ६ ॥ नन्दाक्ष पुर मुक्तकोण युक्त होता है और नन्द्यावर्त पुर, स्वस्तिक पुर, पुष्पक पुर, आठ पंखुड़ियों वाला और स्वस्तिक पुर आठ भुजाओं वाला होता है। यवाकृति जयन्तं च दण्डं स्यादतिदीर्घकम्। श्रीपुरं चैकप्राकारे द्वाभ्यां तु रिपुमर्दनम् ॥ ७ ॥ इसी प्रकार जयन्त पुर का आकार यव की आकृति जैसा होता है। जयन्त पुर
- मयमतं, मानसारदि में भी नगरों का वर्णन है। मानसार का नगरादि वर्णन तुलनीय है—नगरादि संग्रामं च प्रोक्तदुर्गं च सत्तमम्। राष्ट्रमध्ये नदीतीरे बहुपुण्यजनावृतम्॥ मध्ये राज्युतं चैव नगरं कृतमिष्यते। तत्रागते नगर्यन्तं यदि विष्ण्वालयं भवेत्॥ राजधानीति तन्नाम विद्वद्भिरुच्यते सदा। चतुर्दिक्षु चतुर्द्वारं गोपुरैश्च समन्वितम्॥ रक्षागृहैः समाकीर्णं विष्वक्सेनालयान्वितम्। वणिग्भिश्च समाकीर्णमापणैश्च समावृतम्॥ अन्तर्बहिर्जनैः पूर्णं नानादेवालयैरपि। केवलं नगरं प्रोक्तं य तत् तन्त्रपारगैः॥ काननोद्यानसंयुक्तं नानाजनगृहान्वितम्। क्रयविक्रयविद्भिश्च वैश्यरवेण संयुतम्॥ देवसप्तसमायुक्तं पुरमेतत्प्रकथ्येते। अस्यान्ते राजनिलय नगरीति तदिष्यते॥ नदीपर्वतप्रान्ते च शूद्रालय समन्वितम्। महाप्रावृतसंयुक्तं खेटमुक्तं पुरातनैः॥ परितः पर्वतैर्युक्तं नानाजातिगृहैर्वृतम्। सर्वप्रचारसंयुक्तमेतत् खर्वटमीरितम्॥ खेटखर्वटयोर्मध्ये सर्वमर्त्यालयान्वितम्। वप्राभावस्वत्वे तु तत् कुब्जकमुदाहृतम्॥ अब्धितीरप्रदेशे तु नानाजातिगृहैर्वृतम्। वणिग्जातिभिराकीर्णं क्रयविक्रयपूरितम्॥ रत्नैर्द्वीपान्तरानीतैः क्षौमैः कर्पूरकादिभिः। एतत्पत्तनमाख्यातं वप्रायतसमन्वितम्॥ अन्यभूपालभूम्यन्ते युद्धारम्भक्रियान्वितम्। सेनानामयुतानां च पृतनाभिः समन्वितम्॥ तदेतच्छिविरं प्रोक्तं तन्त्रविद्भिः पुरातनैः। नानाजनैश्च सम्पूर्णं भूपहर्म्येण संयुतम्॥ बहुरक्षसमोपेतमेतत्सेनामुखं भवेत्। नदीपार्श्वादिसंयुक्तं भूपलालय संयुतम्॥ बहुतक्ष्मायुक्तं नित्यं सन्नृपसंयुतम्। स्थानीय सर्वविद्वद्भिः प्रोक्तं बहुसुखावहम्॥ समुद्रतटिनीयुक्तं तटिन्या दक्षिणोत्तरे। वणिग्भिः सह नानाभिर्जनैर्युक्तं जनास्पदम्॥ नगरस्य प्रतितटे ग्राहकैश्च समावृतम्। क्रयविक्रयसंयुक्तं द्रोणान्तरमुदाहृतम्॥ महाग्रामसमीपे तु क्षुल्लकग्रामसंयुतम्। तन्नगरं स्यादाश्रयाद ग्रहोरोपजीविनाम्॥ तस्मात्तु तत्र विद्वद्भिः संविद्ध तदुदीरितम्। महाराजस्य मध्ये तु गृहं तत्कोल्कात्मकम्॥ द्विजाति चतुर्वर्णवर्णान्तरजनैर्वृतम्। बहुकर्मकरैर्युक्तं निगमं तदुदाहृतम्॥ नद्यादिकाननोपेतं बहुतीरजनालयम्। राजमन्दिरसंयुक्तं स्कन्धावारमुदाहृतम्॥ पार्श्वे चान्यद्विजातीनां गृहं तश्चेरिकमकम्। (मान. 10, 22-43)
सूत्र-७३ 413 और दण्डपुर अतिदीर्घ होते हैं। श्रीपुर के एक प्राकार, एक परकोटा होता है जबकि रिपुमर्दन पुर के दो प्राकार या दो परकोटे होते हैं। शैलकुक्षौ तथा स्राहं दिव्यकं शैलमस्तके। नद्युत्तरे च सौम्याख्यं सरिद्याम्ये तु धर्मकम्॥ 8 ॥ स्राह पुर पहाड़ी के तले में होता है और दिव्य पुर पहाड़ी के सिर पर होता है। सोम नामक पुर नदी के उत्तर की ओर तथा धर्म पुर नदी के दक्षिण में होता है। कमलं पश्चिमे नद्या नद्याः पूर्वे तु शक्रदम्। पौरुषं पुरुषाकारं नद्योश्चैवं महाजयम्॥ 9 ॥ कमल नामक पुर नदी के पश्चिम में और शक्र नामक पुर नदी की पूर्व दिशा में होता है। पौरुष नामक पुर पुरुषाकृति का और महाजय पुर नदियों के मध्य में स्थित होता है। पुरस्य फलाफलमाह - पुरं विंशतिसङ्ख्याकं रम्यं सुरनरोरगैः। स्वस्तिशान्तिकरं नित्यं गो-ब्राह्मण-धराभुजाम्॥ 10 ॥ ये विंशति संख्यात्मक पुर सुर-नर और नाग जाति के लोगों को शान्ति और खुशहाली लाने वाले हैं और नित्य गौ, ब्राह्मण और राजाओं को सुखप्रद हैं। माहेन्द्रं चतुरश्रं च प्रतापकीर्तिवर्द्धनम्। वृद्धदं सर्वतोभद्रं नित्यं तद्गदशान्तिदम्॥ 11 ॥ सिंहावलोकनं रम्यं हरे (ते) रिपुरिषाव (त) धी(वी)?। वारुणे तु प्रजावृद्धिर्नन्दाख्ये नन्दनं चिरम्॥ 12 ॥ इनमें माहेन्द्र नामक पुर चौकोर होता है और वह वहाँ रहने वाले लोगों की कीर्ति में अभिवृद्धि का कारक होता है, उनके यशः प्रताप को बढ़ाने वाला होता है। सर्वतोभद्र नामक पुर भी सदैव शुभ होता है और रिपुओं का नाश करने वाला तथा वारुण नामक पुर प्रजा वृद्धिकारक, और नन्द नामक पुर सदा आनन्ददायी होता है। नन्द्यावर्तं मङ्गलाख्यं त्रिदशानां च पुष्पकम्। स्वस्तिकृत्स्वस्तिकं प्रोक्तं जयन्तं च जयावहम्॥ 13 ॥ नन्द्यावर्त पुर मङ्गलकारी है और पुष्पक संज्ञक पुर देवताओं को भी मङ्गलकारी कहा गया है। स्वस्तिक पुर सदा स्वस्तिकारक होता है और जयन्त नामक पुर सदा जय कराता है।
वृद्धिदं पार्श्वदण्डं च श्रीपदं श्रीपुरं तथा। रिपुमर्दनं रिप्वन्तं त्राहं चैवाभयप्रदम् ॥ 14 ॥ पार्श्वदण्ड पुर वृद्धिकारक होता है और श्रीपुर नामक तो धनलक्ष्मी श्रीप्रद ही है। रिपुमर्दन पुर शत्रुओं का नाश करता है। त्राह नामक पुर भी अभय दिलाता है। दिव्यकं देवभवनमुत्तरं चोत्तमोत्तमम्। धर्मं धर्मकरं नित्यं कमलं शान्तिदायकम् ॥ 15 ॥ दिव्य पुर देव मन्दिरों-सा सुख और उत्तर नामक पुर सदा उत्तम से उत्तम सुख देता है। धर्म नामक पुर नित्य धार्मिक भाव बढ़ाता है और कमल नामक पुर शान्तिप्रद होता है। इन्द्रराज्योद्धवं शक्रं पौरुषं भीमविक्रमम्। महाजयं पुरं नाम सर्वदानन्दकारकम् ॥ 16 ॥ शक्र नामक पुर इन्द्र के स्वर्ग-सा सुखदायी और पौरुष नामक पुर बड़ा पराक्रम प्रदर्शित करवाता है। महाजय नामक पुर भी सर्वदा आनन्ददायक होता है। इत्थमाकृतयो गुणाः कथितास्तव मयाधुना। शुभानां सुप्रशस्तानां पुराणां विंशतिस्तथा ॥ 17 ॥ इति पुरगुणाधिकारः। इतनी इन पुरों की आकृतियों की गुण-गाथा मैंने अभी तुमसे कही, इस तरह पुरों की यह विंशति शुभ की और सुप्रशस्तियों की वृद्धि करने वाली होती है। इत्यमनन्तर अशुभ पुराकृतिमाह — अग्निदं वायवं चैव शकटं युग्मशाकटम्। वज्रं त्रिशूलमाख्यातं कर्णिकं चैव सप्तमम् ॥ 18 ॥ एताः सप्तपुरश्चैव महोदोषभयावहाः। तासां रूपं तथाकारं कथये तव साम्प्रतम् ॥ 19 ॥ अब कुछ अशुभ आकृतियों के पुरों को भी बताता हूँ। इनमें 1. अग्निद, 2. वायव, 3. शकट, 4. युग्मशाकट, 5. वज्र, 6. त्रिशूल, और 7. कर्णिक— ये सातों पुर महादोष, भयकार है। इनके रूप तथा उनके आकार अब तुम्हें कहता हूँ।¹
- इसी प्रकार कहा गया है— विस्तीर्णं सभाभागञ्च संस्थितं परिकीर्तितम्। चतुरस्रं चतुष्कोणं समभागं विभागतः ॥ वृत्तमेतत् समाख्यातं वास्तुलक्षण कोविदैः। चतुर्भिर्विभजेत् कोणैस्तद्वास्तुवृत्तमुच्यते ॥ आयतं चतुरस्रं च मध्यकोष्ठे भवेत् फलम्। यदि वर्तुलपीताभं स्थानं भद्रासनं विदुः ॥ चक्रवक्रसमाकारे विजयं निम्नतोन्नतम्। निम्नता चापकृष्टा च शक्रचापस्य कीर्तिता ॥ त्रिकोणं शकटाकारं तद्वास्तुकृदिहोच्यते।
सूत्र-७३ 415 अग्निदं च त्रिकोणाख्यं षट्कोणं चैव वायुवम्। शकटं शकटाकारं युग्मं द्विशकटाकृति ॥ २० ॥ अग्निद नामक पुर त्रिकोणाकृति का होता है। वायुव छह कोणों की आकृति वाला होता है। शकट पुर गाड़ी के आकार का होता है जबकि युग्मशाकट पुर दो गाड़ियों की जोड़ी के आकार वाला होता है। वज्रकं वज्रसङ्काशं त्रिशूलं त्रिशूलाकृति। कर्णिकारं विकर्ण तु चाकाराः कथितास्तव ॥ २१ ॥ वज्रक पुर वज्र जैसा कठोर दुःखदायक होता है और त्रिशूल पुर त्रिशूल की आकृति में बसाया हुआ होता है। कर्णिकपुर बिना कोणों का होता है— इतने इन सभी पुरों के आकारों को तुम्हें कह दिया है। तस्य फलोच्यते — अग्निदेऽग्निभयं घोरं वायुवं बहुक्लेशदम् । शकटं तु पुरं चैवं प्रजाक्लेशावहं स्मृतम् ॥ २२ ॥ अब उनके गुणों को सुनो— अग्निद पुर में सदा अग्निभय बना रहता है। वायुव पुर बहुत कष्ट देने वाला और शकट पुर में तो वहाँ की निवासी प्रजा क्लेश में बनी रहती है। पुरे द्विशकटाकारे तस्करादि भयं भवेत्। वज्राकृति पुरं यत्र वज्रपातस्तदोद्भवेत् ॥ २३ ॥ युग्म शकट पुर में भी चोरों-तस्करों का भय बना रहता है और वज्राकृति पुर में भी सदा वज्रपात होते रहते हैं। त्रिशूले च पुरे चैव सदा युद्धं समुद्भवेत्। कर्णिकारे च दुर्भिक्षं प्रजा तत्र न नन्दति ॥ २४ ॥ त्रिशूल पुर में सदा ही युद्ध की स्थिति बनी रहती है और कर्णिकाकार पुर में प्रायः दुर्भिक्ष-अकाल पड़ते रहते हैं और प्रजा दुःखी रहती है। दीर्घदण्डमिति ख्यातं पवनं पवनात्मकम् ॥ मुरजं मुरजाकारं बृहन्मध्यं प्रकीर्तितम् । अश्वत्थपर्णवत् कुम्भो धनुःकोणाकृतिर्धनुः ॥ शूर्प शूर्भनिभं ज्ञेयं गृहं गणितकोविदैः ॥ (वास्तुरत्नावली और राजमार्तण्ड में शिल्पशास्त्र के मत से उद्धृत) समराङ्गण में छिन्नकर्ण, विकर्ण, वज्र, सूचीख्य, वर्तुल, व्यजनाकार, धनुषाकार, द्विगुणायत, शकटद्विसमाकार, कुदिशस्थ, सर्पचक्र जैसे अप्रशस्त पुरों या अगर्हित पुरों का वर्णन मिलता है, जिनके नियोजन-निर्माण का निषेध किया गया है। (समराङ्गण, पुरनिवेश 53-54 व 67)
416 अपराजितपृच्छा इत्यादिसप्तदोषांश्च वर्जयेत् पुरदोषदान्। विंशतिः सुखदाः ख्याता दोषदाः सप्त एव च ॥ 25 ॥ इस प्रकार उक्त सात पुरों के दोष होते हैं। अस्तु, इन आकारों में पुरों का निवेशन वर्जित जानना चाहिए। यहाँ प्रजा हितावह पुरों की विंशति और सात दोषकारक पुरों का वर्णन किया गया। अथाकारानुसारेण पुरग्रामादीनां प्रमाणमाह — पुरार्धेन भवेद् ग्रामो ग्रामार्धेन तु खेटकम्। खेटकार्धेन भवेत् कूटं कूटार्धेन तु कर्वटम् ॥ 26 ॥ अब विविध नामों के आकार प्रमाण कहता हूँ। पुर के आधे भाग पर बसी हुई बस्ती को ग्राम और ग्राम के आधे को खेटक कहा जाता है। खेट के आधे को कूट और कूट का आधा कर्वट कहलाता है।¹ पुरे सप्तदश मार्गा ग्रामो वै नवमार्गतः । खेटके पञ्च मार्गाः स्युस्त्रिभिर्मार्गैश्च कूटकम् ॥ 27 ॥ पुर नामक बस्ती में 17 सड़कें होती हैं जबकि ग्राम में 9 सड़कें ही होती हैं। खेटक में 5 मार्ग होते हैं और कूट में केवल 3 ही मार्ग होते हैं। द्वौ मार्गौ कर्वटे ख्यातौ छन्दाः पञ्च प्रकीर्तिताः । पुर-ग्राम-खेटकं च कूटं च कर्वटाभिधम् ॥ 28 ॥ इसी प्रकार कर्वट में तो 2 मार्ग ही होते हैं। इस तरह इनके ये पाँच छन्द—पुर, ग्राम, खेटक, कूट और कर्वट नाम से बताए गए हैं।² इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां पुरलक्षणाधिकारो नाम त्रिसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 73 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में पुर लक्षण अधिकार नामक तिहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 73 ॥
- अग्निपुराण में ग्राम बस्तियों का विस्तार 100 धनुषों के बराबर कहा गया है। नगर का विस्तार उससे दुगुना अथवा तिगुना माना गया है— धनुः शतं परीणाहो ग्रामस्य तु समन्ततः ॥ द्विगुणं त्रिगुणं वाऽपि नगरस्य च कल्पयेत् । (अग्नि. 227, 19-20)
- समराङ्गणसूत्रधार में कहा गया है— खेटं तदर्धविष्कम्भामाहुर्ग्रामं तदर्धतः । योजनने पुरात् खेटं खेटाद् ग्रामं प्रचक्षते। गव्यूतिपरिमाणेन ग्रामाद् ग्रामं प्रचक्षते ॥ द्विक्रोशाद् विषये सीमा तदर्धेन पुरस्य सा। खेटके पुरसीमार्थं ग्रामे खेटार्धतः स्मृता ॥ त्रिंशद्धनूंषि विष्कम्भः पुरे दिग्वर्त्मसु स्मृतः । विंशति खेटके मार्गो ग्रामे दश च दर्शितः ॥ (समराङ्गण. 10, 79-82)
सूत्र-७४ 417 वापीकूपतडादिनिर्णयो नाम चतुःसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 74 ॥ विश्वकर्मोवाच — पुरस्य बाह्याभ्यन्तरे विविधाः स्युर्जलाशयाः । वापी-कूप-तडागानि कुण्डानि विविधानि च ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि नगर के बाहर और अन्दर की ओर भी विविध प्रकार के जलाशयों की व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि जैसा कहा है कि जल ही जीवन है अस्तु, वहाँ वापी, कूप, तड़ाग, कुण्ड आदि विविध प्रकार के जलस्रोत बनाएँ।¹ दश₁₀ कूपांश्चतु₄र्वाप्यश्चत्वारि₄ कुण्डकानि च। तडागाः षड्विधाश्चैव₆ कथयाम्यपराजित ॥ 2 ॥ हे अपराजित ! अब मैं तुम्हें दस प्रकार के कूप, चार प्रकार की वापियाँ, चार प्रकार के कुण्डों और छह प्रकार के तड़ागों के बारे में कहता हूँ। दशविध कूपमाह — श्रीमुखो विजयः प्रान्तो दुन्दुभिश्च मनोहरः । चूडामणिश्च दिग्भद्रो जयो नन्दश्च शङ्करः ॥ 3 ॥ चतुर्हस्तादितो वृद्ध्यार्वद्धस्तस्त्रयोदशम् । श्रीमुखाद्याः शङ्करान्ता दश कूपाः प्रकीर्तिताः ॥ 4 ॥ (1.) श्रीमुख, (2.) विजय, (3.) प्रान्त, (4.) दुन्दुभि, (5.) मनोहर, (6.) चूडामणि, (7.) दिग्भद्र, (8.) जय, (9.) नन्द और (10.) शङ्कर— ये चार गज की चौड़ाई से लेकर क्रमशः एक-एक बढ़ते-बढ़ते तेरह गज की चौड़ाई के श्रीमुखादि से शङ्करान्त दस प्रकार के कूपों के लक्षण बताए गए हैं।² चतुर्हस्तः श्रीमुखः स्याद् विजयः पञ्चहस्तकः । षड्भिर्हस्तैर्भवेत् प्रान्तो दुन्दुभिः सप्तहस्तकः ॥ 5 ॥ मनोहरश्चाष्टहस्तश्चूडामणिर्नवकरः । दिग्भद्रो दशहस्तश्च ह्येकादशकरो जयः ॥ 6 ॥
- आदित्यपुराण में आए इसी प्रकार के वचनों को जलाशयतत्त्व में उद्धृत किया गया हैं— सेतुबन्धरता ये च तीर्थशौचरताश्च ये। तडागकूपकर्त्तारो मुच्यन्ते ते तृषाभयात्॥ (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 2, पृष्ठ 170) विष्णुधर्मोत्तर में कहा गया है कि जो तडाग, कूप को बनवाता है, कन्यादान करता है, छत्र, उपानह देता है वह व्यक्ति स्वर्ग को जाता है— तडागकूपकर्त्तारस्तथा कन्या प्रदायिनः। छत्रोपानहदातारन्ते नराः स्वर्गगामिनः॥ (तत्रैवोद्धृत)
- चक्रपाणि मिश्र ने भी कहा है— श्रीमुखो विजयः प्रान्तो दुन्दुभिश्च मनोहरः। चूडामणिश्च भद्रो जयो नन्दश्च शङ्कर॥ आरभ्य यावच्चतुष्करं ते व्यासेक्रमादेकक साभिवृद्ध्या। (विश्ववल्लभ 2, 14-15)
418 अपराजितपृच्छा नन्दे च द्वादशकराः शङ्करे च त्रयोदश। एवमादिगुणोपेतो वृत्तकूपा दशोत्तमाः ॥ 7 ॥ इति दशकूपाः। इनमें से श्रीमुख कूप 4 गज का चौड़ा, विजय कूप 5 गज का चौड़ा, प्रान्त कूप 6 गज का, दुन्दुभि 7 गज का, मनोहर 8 गज का, चूड़ामणि 9 गज का, दिग्भद्र 10 गज, जय 11 गज का, नन्द 12 गज का और शङ्कर 13 गज का होता है। इस प्रकार से दस वृत्त कूपों के आदि से गुणों को बताया गया है।¹ कूपिका सफलमाह – शेषास्तु कूपिका वत्स त्रिहस्ताश्चादिमादधः। द्विहस्ता वै प्रशस्ताश्च कर्त्तव्याः सर्वकामदाः ॥ 8 ॥ हे वत्स ! शेष तो छोटी कूपिकाएँ (कुइयाँ) कहलाती है जो 3 गज की चौड़ाई से भी कम की होती जाती हैं। इनमें 3 गज वाली, 2 गज वाली आदि कूपिकाओं में दो गज की चौड़ाई वाली कूपिकाएँ सभी काम में शुभ होती हैं। अस्तु, उन्हें कर्तव्य समझ कर बनाएँ² अथ चतुर्वाप्यः – नन्दा भद्रा जया चैव चतुर्थी विजया तथा। एकवक्त्रा त्रिकूटा च नन्दा नाम वरप्रदा ॥ 9 ॥ चार प्रकार की वापी या बावडियाँ होती हैं— (1.) नन्दा (2.) भद्रा (3.) जया (4.) विजया। इनमें से 'नन्दा' वापी एकमुखी होती है और तीन ओर से कूट अर्थात् बन्द होती है। इस तरह नन्दा नाम की वापी नामानुसार वरप्रदायक है।
- अल्प विस्तार से जहाँ मण्डलाकृति में भूमि को खोदा जाता है और जिस गर्त में पानी मिलता है, वह चाहे पक्का बन्धा हुआ हो या निर्बन्ध हो, 'कूप' कहा जाता है— भूमौ खातोऽल्पविस्तारो गम्भीरो मण्डलाकृतिः। बद्धोऽबद्धः स कूपः स्यात्तदम्भः कौपमुच्यते ॥ (भावप्रकाश) इसी प्रकार राजवल्लभ. में आया है— कूपाः श्रीमुखवैजयोऽपि तदनु प्रान्तस्तथा दुन्दुभिस्तस्मादेव मनोहरश्च परतः प्रोक्तस्तु चूडामणिः। दिग्भद्रो जयनन्दशङ्करमतो वेदादिहस्तैर्मिता विश्रान्तैः क्रमवर्द्धितैश्च कथिता वेदादधः कूपिका॥ (राजवल्लभ : चक्रपाणिमिश्र, 4, 27) विश्वकर्मीय दीपार्णव में कहा गया है— चतुर्हस्ताद्द्विकैका यावत् हस्त त्रयोदश। श्रीमुखो विजय चैव प्रान्तो दुन्दुभि श्रीमनोहरः ॥ चूडामणि दिग्भद्रो जया नन्दस्तु शङ्करः। श्रीमुखो चतुर्हस्ताद्य शङ्करस्य त्रयोदश॥ एव नामा द्विगुणोपेत वृत्तकूपादशोगमा। सङ्ख्याहस्तद्वयं कुर्यात् कूपिका नामतद्भवेत् ॥ (दीपार्णव उत्तर. 18, 2-4)
- गर्त, कूपिका, कुल्या, आलवाल आदि बिना मान के होते हैं—भवन्ति गर्तानि च कूपिकाश्च कुल्यालवालादि विनैव मानम्॥ (विश्ववल्लभ 2, 15)
सूत्र-७४ 419 द्विवक्त्रा च षट्कूटा भद्रा नाम सुशोभिता। त्रिवक्त्रा नवकूटा च जया वै देवदुर्लभा ॥ 10 ॥ दूसरी 'भद्रा' नामक वापी के दो ओर मुख होते हैं अर्थात् उसमें दो ओर से आवागमन होता है, उनके छह ओर से रोक होती है— इस प्रकार भद्रा सुशोभित है।¹ तीन ओर के आवागमन या मार्ग के मुखों वाली तीसरी 'जया' नामक वापी के नौ ओर रोक होती है। यह बड़ी ही उत्तम होती है। देवताओं को भी ऐसी वापी दुर्लभ मानी जाती है। चतुर्वक्त्रा सूर्यकूटा विजया सर्वतोमुखी। वाप्यश्च कथिता वत्स कुण्डानि शृणु सम्प्रति ॥ 11 ॥ इति चतुर्वाप्यः। 'विजया' वापी के चारों और मुख होते हैं अर्थात् आवागमन योग्य सीढ़ियाँ होती हैं जिसके बारह रोक होती है²— ऐसे हे वत्स! मैंने बावड़ियों के बारे में कहा। अब तुम कुण्डों के बारे में सुनो। चतुर्विधकुण्डानि — भद्रकं सुभद्रकं च नन्दाख्यं परिघं तथा। कुण्डानि देवताग्रेषु कार्याणि शान्तिमिच्छता ॥ 12 ॥ (1.) भद्रक, (2.) सुभद्रक, (3.) नन्दाख्य व (4.) परिघ— ये चार प्रकार के कुण्ड होते हैं, शान्ति के इच्छुकों को इनको देवमन्दिरों के आगे बनाना चाहिए।¹ चतुरस्रं भद्रकं स्यात् सुभद्रं भद्रसंयुतम्। नन्दाख्यं प्रतिभद्रेषु परिघं मध्यभिट्टकम् ॥ 13 ॥ भद्रक कुण्ड चौकोर होता है और सुभद्र कुण्ड के चारों ओर दीवारें या भद्र होते हैं। नन्दाख्य कुण्ड के भी प्रतिभद्र होती है और परिघ कुण्ड के मध्य में भिट्ट
- राजवल्लभ में कहा गया है— भद्राख्यकुण्डं चतुरस्रकं च सुभद्रकं भद्रयुतं द्वितीयम्। नन्दाख्यकं स्यात् प्रतिभद्रयुक्तं मध्ये सभिट्टं परिघं चतुर्थम्॥ (राजवल्लभ. 4, 31) दीपार्णव में कहा गया है— कुण्डानां लक्षणं चैव चतुर्विध मुदाहृतः ॥ चतुरश्र भद्रकं नाम सुभद्र भद्रसंयुत। नन्दा क्षौ प्रतिभद्रेषु परिघो मध्यभिट्टोद्भवं ॥ प्रवेशा निर्गमा चैव कर्तव्यास्तेरनेकधाः । (दीपार्णव 18, 7-9)
- राजवल्लभ में कहा गया है—वापी च नन्दैकमुखी त्रिकूटा षट्कूटिका युग्ममुखा च भद्रा। जया त्रिवक्त्रा नवकूटयुक्तास्त्वर्कैस्तु कूटैर्विजया मता सा॥ (वही 4, 28) अपराजित के अनुसार ही दीपार्णव में वापियों के लक्षण व भेद इस प्रकार स्पष्ट किए गए हैं— एक वक्त्रां त्रिकूटाश्चं नन्दा नाम वरप्रदा। द्विवक्त्रा षटकूटाश्च भद्रा नाम सुशोभना॥ त्रिवक्त्रा नवकूटाश्च जयास्तु देवदुर्लभा। चर्तुवक्त्रा द्वादशकूटा विजया सर्वतो मुख ॥ चतुर्वापि भवेत्प्राज्ञ नन्दाद्या शुभलक्षणम् ॥ (दीपार्णव 18, 5-7)
420 अपराजितपृच्छा की रचना होती है। चतुर्द्वाराणि सर्वाणि सगवाक्षाणि मध्यतः। गवाक्षमस्तकान्येवं प्रवेशो वाम-दक्षिणे ॥ 14 ॥ इन कुण्डों के चारों और चार द्वार बने होते हैं और उन द्वार पर गोखड़े बने होते हैं। मध्य की ओर तथा उन गवाक्षों-गोखड़ों के मस्तक की ओर से बायें-दायें प्रवेश मार्ग बने होते हैं। प्रवेशा निर्गमास्तत्र विधातव्या ह्यनेकधा। कर्णे चतुष्किकाः कार्यास्तवङ्गपट्टशालिकाः ॥ 15 ॥ मध्ये भिट्टं तु कर्त्तव्यं माडं च तद्धि श्रीधरम्। इसी प्रकार वहाँ, कुण्ड में प्रवेश और निर्गम अनेक प्रकार के बनाने चाहिए। इनके कोनों पर चौकियाँ भी बनानी चाहिए। ये चौकियाँ तवङ्ग एवं पट्टशालिका से युक्त छतरियों के रूप में बनाएँ जिसमें श्रीधर नामक माड की प्रतिष्ठा करें।¹ तत्रैवार्च्चा निर्देशमाह — तन्मध्ये जलशायी स्याद् वाराहो वा तथोच्यते ॥ 16 ॥ भद्रे चैकादश रुद्राः प्रशस्ता द्वारके तथा। दुर्वासा नारदश्चैव विविधा गणनायकाः ॥ 17 ॥ कुण्ड के मध्य में जलशायी वाराह बनाया जाना चाहिए (अथवा जल तक पहुँचने वाली सीढ़ियाँ हों)। कुण्डों के दीवारों (भद्र) पर और द्वारों पर एकादश रुद्र मूर्तियाँ और महर्षि दुर्वासा, देवर्षि नारद व विविध गण नायक देवताओं की मूर्तियाँ प्रशस्त मानी गई हैं। क्षेत्रपालो भैरवश्च तथा चोमामहेश्वरः। कृष्णशङ्करः कर्तव्या दण्डपाणिर्विशेषतः ॥ 18 ॥ इन मूर्तियों की शृङ्खला में क्षेत्रपाल, भैरव, उमा-महेश्वर, कृष्णशङ्कर और विशेष करके दण्डपाणि यमराज-धर्मराज की भी स्थापना करनी चाहिए। कात्यायनी चण्डिका च भल्लस्वामी च भास्करः। हरिहरपितामहश्चन्द्रादित्यपितामहः ॥ 19 ॥
- राजवल्लभ. में उक्त प्रमाण के साथ ही चारों कोनों में पट्टशाला के निर्माण का निर्देश भी दिया गया है— कराष्टतो हस्तशतं प्रमाणं द्वारैश्चतुर्भिः सहितानि कुर्युः। मध्ये गवाक्षाश्च दिशो विभागे कोणे चतुष्कास्त्वपि पट्टशालाः ॥ (राजवल्लभ. 4, 32)
सूत्र-७४ 421 हरिहरस्वर्णगर्भः पट्टशाला वाराणासी। तदनुक्रमं वक्ष्यामि यदुक्तं परमेश्वरैः ॥ २० ॥ इसी तरह कात्यायनी, चण्डिका, मल्लस्वामी, भास्कर, हरिहर पितामह तथा चन्द्रादित्यपितामह, हरिहर स्वर्णगर्भ, पट्टशाला वाराणसी के बारे में भी मैं तदनुक्रम से कहूँगा जैसा कि परमेश्वर ने पूर्व में कहा है। चतुर्दशेशलिङ्गानि रुद्रांश्चैवकादशैव तु। सर्वे च द्वादशादित्या द्वादशाथ गणाधिपाः ॥ २१ ॥ चौदह ईश अर्थात् महादेव के लिङ्गों को तथा एकादश रुद्रों के लिङ्गों तथा सभी द्वादश आदित्यों और द्वादश गणाधिपों को भी स्थापित करना चाहिए। पञ्चलीला नवदुर्गा लोकपालांश्च पञ्चधा। त्रयोऽग्नयश्च दिक्पाला मातृणां च तथाष्टकम् ॥ २२ ॥ अब्धयश्चैव चत्वारो गङ्गा च सरिदुत्तमा। तन्मध्ये तु प्रकर्तव्या वाराणासी पद्मासने ॥ २३ ॥ इसी प्रकार पञ्चलीलाओं को, नवदुर्गा, पाँच तरह के लोकपालों, तीनों अग्नियों, अष्ट दिक्पालों तथा आठों मातृकाओं, चारों समुद्रों और गङ्गा आदि उत्तम सरिताओं को बनाकर उसके सबके मध्य में वाराणसी को पद्मासन पर विराजमान करना चाहिए।¹ यच्च वाराणासीवासे तत्पुण्यं नित्यदर्शनात्। नित्यमेव स्नानपूजा गङ्गास्नानादिकं फलम् ॥ २४ ॥ वाराणसी (काशी या बनारस) में आवास करने का जैसा पुण्य फल वहाँ नित्य दर्शनों से मिलता है, वैसा ही पुण्यफल इस तरह की देवमूर्तियों के कुण्ड की दीवाल पर स्थापित करके गंगा स्नानोपरान्त पूजन-अर्चन करने से मिलता है। तस्यार्चने भवेन्मोक्षो यथा गङ्गाजलामृतौ। पतन्ति नैव संसारे यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥ २५ ॥ उनकी अर्चना से वैसे ही मुक्ति मिलती है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है जैसे कि गङ्गा जल रूपी अमृत से मिलती है। मृतकों और मनुष्य का पुनर्जन्म होकर इस संसार-सागर में जब तक सूर्य-चन्द्रमा-तारागण स्थित हैं, तब तक पतन नहीं होता।
- मण्डन ने देवार्चाओं के सन्दर्भ में यही मत दिया है- गङ्गाद्या रवयो हरेश दशकं रुद्रा दशैकाधिका दुर्गा भैरवमातृका गणपतिर्वह्नेस्त्रिकं चण्डिका। दुर्वासा मुनिनारदस्तु सकला द्वारावतीलीलिका लोकाः पञ्च पितामहादिविबुधाः स्युर्मध्यदेशे सदा॥ (राजवल्लभ. 4, 33)