अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 455, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंअचिन्त्यमुद्गराघातं ज्वालावलि शराकुलम् ॥ 52 ॥ ये सभी छह प्रकार के यन्त्र बड़े ही अकल्पनीय आघात करने वाले मूसल, मुद्गर या गोलों को शरयुक्त¹ श्रृङ्खलाबद्ध अग्नि विस्फोटों और ज्वालाओं के साथ छोड़ने वाले भयानक हथियार हैं।² भैरव यन्त्र, नाग यन्त्र, त्रिशूल यन्त्र, रज्जु यन्त्र, मौसल यन्त्र, विषकण्टक यन्त्र, शूलमुख यन्त्र और धनुर्यन्त्रादि को स्थापित करने का उल्लेख है— नाभिमात्रे ततस्सालवलये पङ्किशः क्रमात्। शिलामु भैरवयन्त्रं नागयन्त्रञ्च मौसलम्॥ विषकण्टकयन्त्रञ्च शुक्लं शूलमुखं तथा॥ धनुर्यन्त्रादियन्त्रादि व्यस्तामिति यन्त्रकम्॥ (आकाश. साम्राज्यदीपिका, अष्टविध सालदुर्गकथनं, 17-19) सूत्रधार मण्डन ने आठों यन्त्रों के नाम बताएं हैं जो क्रमशः भैरव यन्त्र, चन्द्र यन्त्र, सूर्य यन्त्र, भीमगज यन्त्र, युग्म यन्त्र, शिखी यन्त्र, यमदण्ड यन्त्र व महाभैरव यन्त्र है। इनका प्रमाण इस प्रकार होगा— हस्ता अष्ट च भैरवो नवकराश्चान्द्रो दशाढ्यो भवेद् रुद्रोभीमगजोऽपि भास्करकरैर्युग्मं च विश्वैः शिखी। प्रोक्तोऽसौ यमदण्ड एव मुनिभिस्तिथ्या महाभैरवो ... ॥ (राजवल्लभ. 4, 22)
- कुम्भाकाल में अग्निवर्षक बाणों का उल्लेख इतिहास में आया है। वर्ष 1446-68 ई. में मालवा में खिलजी शासन में लिखित 'मआसिरे-महमूदशाही' में बान नामक आग्नेयास्त्रों का वर्णन मिलता है। माण्डलगढ़ के निकट कुम्भा की सेना व सुल्तान महमूद खिलजी की फौजों के बीच 1443 ई. में जो मुठभेड़ हुई, उसमें कुम्भा ने नैफ्ता की आग 'आतिशे-नफ्त' और तीरे हवाई का प्रयोग किया था। ऐसा ही एक उल्लेख इन दोनों फौजों के बीच 1456-57 ई. में हुए एक और टकराव के दौरान भी मिलता है। (मआसिरे-महमूदशाही पृष्ठ 57-58) इस समय प्रचलित आतिशे नफ्त और तीरे-आतिशी सम्भवतः यहां वर्णित अग्नियन्त्र ही थे। इनका विस्तार से वर्णन वास्तुमण्डनं के तीसरे अध्याय में आया है। (विशेष द्रष्टव्य- कला की कालकथा में तीर से तोप तक के यन्त्रों का वर्णन) ऐसे अग्निवर्षक बाणों का उल्लेख आकाशभैरवकल्प में आया है जो आकाश में भयङ्कर गर्जना अग्नि की चिनगारियां छोड़ते थे। (आकाश. साम्राज्यलक्ष्मीपीठिक पटल 107, 29-31) इसी प्रकार मनु ने धर्मयुद्ध में अग्नि लगाने वाले बाणों के प्रयोग का निषेध किया है। (मनु. 10, 83)
- यहाँ ग्रन्थकार ने निश्चय ही आग्नेयास्त्रों का वर्णन किया है और बारुदी प्रयोग का सङ्केत भी है। तोप को परवर्ती यन्त्र कहा जाता है, इतिहासकारों की यह धारणा अब मिथ्या सिद्ध हो चुकी हैं कि बारुद का आविष्कार 14वीं सदी में बर्थोल्ड श्वार्त्ज नामक पादरी ने किया था। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में कहा है कि बारुद का आविष्कार सम्भवतः चीन अथवा भारत में हुआ। (एनसाइक्लोपीडिया. पृष्ठ 5) यह मान्यता भी है कि तोप शब्द संस्कृत की तुप तुफ पीड़ार्थक धातु से निष्पन्न है और उसका भारतीय नाम नालिकास्त्र रहा है और बारुद को भारतीय ग्रन्थों में अग्निचूर्ण (शुक्रनीति), शुष्कमदिरा (शतघ्न्या शुष्कमदिरागोलकेन समन्विता। गर्गसंहिता 10, 33, 38-39 व 50), रञ्जक (वाशिष्ठ धनुर्वेद श्लोक 75) और जामदग्न्य चूर्ण (राजराजेश्वर परशुराम ग्रन्थ में उद्धृत जामदग्न्य धनुर्वेद) मानसोल्लास में पाषाण वर्षक व अग्नि लगाने वाले यन्त्रों से आक्रमण करने का निर्देश मिलता है— आरभेत ततो युद्धं यन्त्रपाषाणपातकैः। अनलं चानुकूलेन वायुना समुदापयेत्॥ पाषाणपातिभिर्यन्त्रैर्दाहहिनाद् दहनेन वा॥ (मानसो. 1, 2, 20, 1070-73) इसी प्रकार भुवनदेव के मुख्य उत्सकारक समराङ्गणसूत्रधार में कहा गया है कि दुर्ग की रक्षा के लिए अग्नि इत्यादि की सहायता से धनुष, शतघ्नी और उष्ट्रीवादि यन्त्रों का निर्माण करना चाहिए— ये चापाद्या ये शतघ्न्यादयोऽस्मिन्नुष्ट्रीग्रीवाद्याश्च दुर्गस्य गुप्तयै। ये क्रीडाद्या क्रीडनार्थं च राज्ञां सर्वेऽपि स्युर्योगतस्ते गुणानाम्॥ (समराङ्गण. 31, 10)