भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-७३ 411 अक्षयं च दृढं युक्त्या नैकढिल्लिकसङ्कुलम्। एभिर्यन्त्रैः समायुक्तं प्राकारं भीमरूपकम् ॥ ५३ ॥ ये इतने दृढ़ और अक्षय है कि इनकी गर्जना अनेक ढोलों की गर्जना से भी अधिक घनघोर (सङ्कुल) होती है। अस्तु, इन जैसे यन्त्रों से, तोपों से सुसज्जित प्राकार अर्थात् नगर परकोटा बहुत ही भयानक परिदृश्य उत्पन्न करने वाला ही सिद्ध होता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महाराजाधिराजपुरनिवेशाधिकारो नाम द्वासप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७२ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महाराजाधिराज पुर निवेश अधिकार नामक बहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥ पुरलक्षणं त्रिसप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७३ ॥ विश्वकर्मोवाच — वक्ष्ये पुरस्य चाकारं साम्प्रतं लक्षणं पुनः । प्रशस्तं दोषरहितं पुरनामानि विंशतिः २० ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि अब मैं उन पुरों, नगरों के आकार और लक्षणों के बारे में कहता हूँ जो प्रशस्त है और दोष रहित हैं, उनके बीस नाम हैं। विंश पुरनामानि — माहेन्द्रं सर्वतोभद्रं सिंहावलोकवारुणे । नन्द्यावर्तं च नन्दाख्यं पुष्पकं चैव स्वस्तिकम् ॥ २ ॥ पार्श्वदण्डं जयन्तं च श्रीपुरं रिपुमर्दनम् । स्राहं दिव्यमुत्तरं च धर्मं कमलशक्रदे ॥ ३ ॥ महाजयं पौरुषं च साम्प्रतं कथितं बुधैः । पुराणां विंशतिश्चैव ख्याता भुवनमण्डनम् ॥ ४ ॥ इन पुरों में ( 1. ) माहेन्द्र, ( 2. ) सर्वतोभद्र, ( 3. ) सिंहावलोकन, ( 4. ) वारुण, ( 5. ) नन्द्यावर्त, ( 6. ) नन्द (नन्दाक्ष), ( 7. ) पुष्पक, ( 8. ) स्वस्तिक, ( 9. ) पार्श्वदण्ड, ( 10. ) जयन्त, ( 11. ) श्रीपुर, ( 12. ) रिपुमर्दन, ( 13. ) स्राह, ( 15. ) दिव्य, ( 15. ) उत्तर ( 16. ) धर्म, ( 17. ) कमल ( 18. ) शक्रद, ( 19. ) महाजय और ( 20. ) पौरुष— ये नाम विद्वानों ने अब तक कहे हैं। इस तरह से पुरों की