भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र-७३ 411 अक्षयं च दृढं युक्त्या नैकढिल्लिकसङ्कुलम्। एभिर्यन्त्रैः समायुक्तं प्राकारं भीमरूपकम् ॥ ५३ ॥ ये इतने दृढ़ और अक्षय है कि इनकी गर्जना अनेक ढोलों की गर्जना से भी अधिक घनघोर (सङ्कुल) होती है। अस्तु, इन जैसे यन्त्रों से, तोपों से सुसज्जित प्राकार अर्थात् नगर परकोटा बहुत ही भयानक परिदृश्य उत्पन्न करने वाला ही सिद्ध होता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महाराजाधिराजपुरनिवेशाधिकारो नाम द्वासप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७२ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महाराजाधिराज पुर निवेश अधिकार नामक बहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥ पुरलक्षणं त्रिसप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७३ ॥ विश्वकर्मोवाच — वक्ष्ये पुरस्य चाकारं साम्प्रतं लक्षणं पुनः । प्रशस्तं दोषरहितं पुरनामानि विंशतिः २० ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि अब मैं उन पुरों, नगरों के आकार और लक्षणों के बारे में कहता हूँ जो प्रशस्त है और दोष रहित हैं, उनके बीस नाम हैं। विंश पुरनामानि — माहेन्द्रं सर्वतोभद्रं सिंहावलोकवारुणे । नन्द्यावर्तं च नन्दाख्यं पुष्पकं चैव स्वस्तिकम् ॥ २ ॥ पार्श्वदण्डं जयन्तं च श्रीपुरं रिपुमर्दनम् । स्राहं दिव्यमुत्तरं च धर्मं कमलशक्रदे ॥ ३ ॥ महाजयं पौरुषं च साम्प्रतं कथितं बुधैः । पुराणां विंशतिश्चैव ख्याता भुवनमण्डनम् ॥ ४ ॥ इन पुरों में ( 1. ) माहेन्द्र, ( 2. ) सर्वतोभद्र, ( 3. ) सिंहावलोकन, ( 4. ) वारुण, ( 5. ) नन्द्यावर्त, ( 6. ) नन्द (नन्दाक्ष), ( 7. ) पुष्पक, ( 8. ) स्वस्तिक, ( 9. ) पार्श्वदण्ड, ( 10. ) जयन्त, ( 11. ) श्रीपुर, ( 12. ) रिपुमर्दन, ( 13. ) स्राह, ( 15. ) दिव्य, ( 15. ) उत्तर ( 16. ) धर्म, ( 17. ) कमल ( 18. ) शक्रद, ( 19. ) महाजय और ( 20. ) पौरुष— ये नाम विद्वानों ने अब तक कहे हैं। इस तरह से पुरों की

विंशति भुवन मण्डल स्वरूप में विख्यात है।¹ . नामस्य स्वरूपाणि — माहेन्द्रं चतुरश्रं च सर्वतोभद्रमायतम्। सिंहावलोकनं वृत्तं वृत्तायतं च वारुणम् ॥ ५ ॥ इनमें से माहेन्द्र नामक नगर चौकोर होता है और सर्वतोभद्र आयत रूप में होता है। सिंहावलोकन पुर वृत्तरूप में होता है और वारुण पुर वृत्तायत रूप का होता है। मुक्तकोणं च नन्दाक्षं (ख्यं !) नन्द्यावर्तं च स्वस्तिकम्। पुष्पकमष्टदलाख्यं स्वस्तिकं तु चाष्टाश्रकम्॥ ६ ॥ नन्दाक्ष पुर मुक्तकोण युक्त होता है और नन्द्यावर्त पुर, स्वस्तिक पुर, पुष्पक पुर, आठ पंखुड़ियों वाला और स्वस्तिक पुर आठ भुजाओं वाला होता है। यवाकृति जयन्तं च दण्डं स्यादतिदीर्घकम्। श्रीपुरं चैकप्राकारे द्वाभ्यां तु रिपुमर्दनम् ॥ ७ ॥ इसी प्रकार जयन्त पुर का आकार यव की आकृति जैसा होता है। जयन्त पुर


  1. मयमतं, मानसारदि में भी नगरों का वर्णन है। मानसार का नगरादि वर्णन तुलनीय है—नगरादि संग्रामं च प्रोक्तदुर्गं च सत्तमम्। राष्ट्रमध्ये नदीतीरे बहुपुण्यजनावृतम्॥ मध्ये राज्युतं चैव नगरं कृतमिष्यते। तत्रागते नगर्यन्तं यदि विष्ण्वालयं भवेत्॥ राजधानीति तन्नाम विद्वद्भिरुच्यते सदा। चतुर्दिक्षु चतुर्द्वारं गोपुरैश्च समन्वितम्॥ रक्षागृहैः समाकीर्णं विष्वक्सेनालयान्वितम्। वणिग्भिश्च समाकीर्णमापणैश्च समावृतम्॥ अन्तर्बहिर्जनैः पूर्णं नानादेवालयैरपि। केवलं नगरं प्रोक्तं य तत् तन्त्रपारगैः॥ काननोद्यानसंयुक्तं नानाजनगृहान्वितम्। क्रयविक्रयविद्भिश्च वैश्यरवेण संयुतम्॥ देवसप्तसमायुक्तं पुरमेतत्प्रकथ्येते। अस्यान्ते राजनिलय नगरीति तदिष्यते॥ नदीपर्वतप्रान्ते च शूद्रालय समन्वितम्। महाप्रावृतसंयुक्तं खेटमुक्तं पुरातनैः॥ परितः पर्वतैर्युक्तं नानाजातिगृहैर्वृतम्। सर्वप्रचारसंयुक्तमेतत् खर्वटमीरितम्॥ खेटखर्वटयोर्मध्ये सर्वमर्त्यालयान्वितम्। वप्राभावस्वत्वे तु तत् कुब्जकमुदाहृतम्॥ अब्धितीरप्रदेशे तु नानाजातिगृहैर्वृतम्। वणिग्जातिभिराकीर्णं क्रयविक्रयपूरितम्॥ रत्नैर्द्वीपान्तरानीतैः क्षौमैः कर्पूरकादिभिः। एतत्पत्तनमाख्यातं वप्रायतसमन्वितम्॥ अन्यभूपालभूम्यन्ते युद्धारम्भक्रियान्वितम्। सेनानामयुतानां च पृतनाभिः समन्वितम्॥ तदेतच्छिविरं प्रोक्तं तन्त्रविद्भिः पुरातनैः। नानाजनैश्च सम्पूर्णं भूपहर्म्येण संयुतम्॥ बहुरक्षसमोपेतमेतत्सेनामुखं भवेत्। नदीपार्श्वादिसंयुक्तं भूपलालय संयुतम्॥ बहुतक्ष्मायुक्तं नित्यं सन्नृपसंयुतम्। स्थानीय सर्वविद्वद्भिः प्रोक्तं बहुसुखावहम्॥ समुद्रतटिनीयुक्तं तटिन्या दक्षिणोत्तरे। वणिग्भिः सह नानाभिर्जनैर्युक्तं जनास्पदम्॥ नगरस्य प्रतितटे ग्राहकैश्च समावृतम्। क्रयविक्रयसंयुक्तं द्रोणान्तरमुदाहृतम्॥ महाग्रामसमीपे तु क्षुल्लकग्रामसंयुतम्। तन्नगरं स्यादाश्रयाद ग्रहोरोपजीविनाम्॥ तस्मात्तु तत्र विद्वद्भिः संविद्ध तदुदीरितम्। महाराजस्य मध्ये तु गृहं तत्कोल्कात्मकम्॥ द्विजाति चतुर्वर्णवर्णान्तरजनैर्वृतम्। बहुकर्मकरैर्युक्तं निगमं तदुदाहृतम्॥ नद्यादिकाननोपेतं बहुतीरजनालयम्। राजमन्दिरसंयुक्तं स्कन्धावारमुदाहृतम्॥ पार्श्वे चान्यद्विजातीनां गृहं तश्चेरिकमकम्। (मान. 10, 22-43)

सूत्र-७३ 413 और दण्डपुर अतिदीर्घ होते हैं। श्रीपुर के एक प्राकार, एक परकोटा होता है जबकि रिपुमर्दन पुर के दो प्राकार या दो परकोटे होते हैं। शैलकुक्षौ तथा स्राहं दिव्यकं शैलमस्तके। नद्युत्तरे च सौम्याख्यं सरिद्याम्ये तु धर्मकम्॥ 8 ॥ स्राह पुर पहाड़ी के तले में होता है और दिव्य पुर पहाड़ी के सिर पर होता है। सोम नामक पुर नदी के उत्तर की ओर तथा धर्म पुर नदी के दक्षिण में होता है। कमलं पश्चिमे नद्या नद्याः पूर्वे तु शक्रदम्। पौरुषं पुरुषाकारं नद्योश्चैवं महाजयम्॥ 9 ॥ कमल नामक पुर नदी के पश्चिम में और शक्र नामक पुर नदी की पूर्व दिशा में होता है। पौरुष नामक पुर पुरुषाकृति का और महाजय पुर नदियों के मध्य में स्थित होता है। पुरस्य फलाफलमाह - पुरं विंशतिसङ्ख्याकं रम्यं सुरनरोरगैः। स्वस्तिशान्तिकरं नित्यं गो-ब्राह्मण-धराभुजाम्॥ 10 ॥ ये विंशति संख्यात्मक पुर सुर-नर और नाग जाति के लोगों को शान्ति और खुशहाली लाने वाले हैं और नित्य गौ, ब्राह्मण और राजाओं को सुखप्रद हैं। माहेन्द्रं चतुरश्रं च प्रतापकीर्तिवर्द्धनम्। वृद्धदं सर्वतोभद्रं नित्यं तद्गदशान्तिदम्॥ 11 ॥ सिंहावलोकनं रम्यं हरे (ते) रिपुरिषाव (त) धी(वी)?। वारुणे तु प्रजावृद्धिर्नन्दाख्ये नन्दनं चिरम्॥ 12 ॥ इनमें माहेन्द्र नामक पुर चौकोर होता है और वह वहाँ रहने वाले लोगों की कीर्ति में अभिवृद्धि का कारक होता है, उनके यशः प्रताप को बढ़ाने वाला होता है। सर्वतोभद्र नामक पुर भी सदैव शुभ होता है और रिपुओं का नाश करने वाला तथा वारुण नामक पुर प्रजा वृद्धिकारक, और नन्द नामक पुर सदा आनन्ददायी होता है। नन्द्यावर्तं मङ्गलाख्यं त्रिदशानां च पुष्पकम्। स्वस्तिकृत्स्वस्तिकं प्रोक्तं जयन्तं च जयावहम्॥ 13 ॥ नन्द्यावर्त पुर मङ्गलकारी है और पुष्पक संज्ञक पुर देवताओं को भी मङ्गलकारी कहा गया है। स्वस्तिक पुर सदा स्वस्तिकारक होता है और जयन्त नामक पुर सदा जय कराता है।

वृद्धिदं पार्श्वदण्डं च श्रीपदं श्रीपुरं तथा। रिपुमर्दनं रिप्वन्तं त्राहं चैवाभयप्रदम् ॥ 14 ॥ पार्श्वदण्ड पुर वृद्धिकारक होता है और श्रीपुर नामक तो धनलक्ष्मी श्रीप्रद ही है। रिपुमर्दन पुर शत्रुओं का नाश करता है। त्राह नामक पुर भी अभय दिलाता है। दिव्यकं देवभवनमुत्तरं चोत्तमोत्तमम्। धर्मं धर्मकरं नित्यं कमलं शान्तिदायकम् ॥ 15 ॥ दिव्य पुर देव मन्दिरों-सा सुख और उत्तर नामक पुर सदा उत्तम से उत्तम सुख देता है। धर्म नामक पुर नित्य धार्मिक भाव बढ़ाता है और कमल नामक पुर शान्तिप्रद होता है। इन्द्रराज्योद्धवं शक्रं पौरुषं भीमविक्रमम्। महाजयं पुरं नाम सर्वदानन्दकारकम् ॥ 16 ॥ शक्र नामक पुर इन्द्र के स्वर्ग-सा सुखदायी और पौरुष नामक पुर बड़ा पराक्रम प्रदर्शित करवाता है। महाजय नामक पुर भी सर्वदा आनन्ददायक होता है। इत्थमाकृतयो गुणाः कथितास्तव मयाधुना। शुभानां सुप्रशस्तानां पुराणां विंशतिस्तथा ॥ 17 ॥ इति पुरगुणाधिकारः। इतनी इन पुरों की आकृतियों की गुण-गाथा मैंने अभी तुमसे कही, इस तरह पुरों की यह विंशति शुभ की और सुप्रशस्तियों की वृद्धि करने वाली होती है। इत्यमनन्तर अशुभ पुराकृतिमाह — अग्निदं वायवं चैव शकटं युग्मशाकटम्। वज्रं त्रिशूलमाख्यातं कर्णिकं चैव सप्तमम् ॥ 18 ॥ एताः सप्तपुरश्चैव महोदोषभयावहाः। तासां रूपं तथाकारं कथये तव साम्प्रतम् ॥ 19 ॥ अब कुछ अशुभ आकृतियों के पुरों को भी बताता हूँ। इनमें 1. अग्निद, 2. वायव, 3. शकट, 4. युग्मशाकट, 5. वज्र, 6. त्रिशूल, और 7. कर्णिक— ये सातों पुर महादोष, भयकार है। इनके रूप तथा उनके आकार अब तुम्हें कहता हूँ।¹

  1. इसी प्रकार कहा गया है— विस्तीर्णं सभाभागञ्च संस्थितं परिकीर्तितम्। चतुरस्रं चतुष्कोणं समभागं विभागतः ॥ वृत्तमेतत् समाख्यातं वास्तुलक्षण कोविदैः। चतुर्भिर्विभजेत् कोणैस्तद्वास्तुवृत्तमुच्यते ॥ आयतं चतुरस्रं च मध्यकोष्ठे भवेत् फलम्। यदि वर्तुलपीताभं स्थानं भद्रासनं विदुः ॥ चक्रवक्रसमाकारे विजयं निम्नतोन्नतम्। निम्नता चापकृष्टा च शक्रचापस्य कीर्तिता ॥ त्रिकोणं शकटाकारं तद्वास्तुकृदिहोच्यते।

सूत्र-७३ 415 अग्निदं च त्रिकोणाख्यं षट्कोणं चैव वायुवम्। शकटं शकटाकारं युग्मं द्विशकटाकृति ॥ २० ॥ अग्निद नामक पुर त्रिकोणाकृति का होता है। वायुव छह कोणों की आकृति वाला होता है। शकट पुर गाड़ी के आकार का होता है जबकि युग्मशाकट पुर दो गाड़ियों की जोड़ी के आकार वाला होता है। वज्रकं वज्रसङ्काशं त्रिशूलं त्रिशूलाकृति। कर्णिकारं विकर्ण तु चाकाराः कथितास्तव ॥ २१ ॥ वज्रक पुर वज्र जैसा कठोर दुःखदायक होता है और त्रिशूल पुर त्रिशूल की आकृति में बसाया हुआ होता है। कर्णिकपुर बिना कोणों का होता है— इतने इन सभी पुरों के आकारों को तुम्हें कह दिया है। तस्य फलोच्यते — अग्निदेऽग्निभयं घोरं वायुवं बहुक्लेशदम् । शकटं तु पुरं चैवं प्रजाक्लेशावहं स्मृतम् ॥ २२ ॥ अब उनके गुणों को सुनो— अग्निद पुर में सदा अग्निभय बना रहता है। वायुव पुर बहुत कष्ट देने वाला और शकट पुर में तो वहाँ की निवासी प्रजा क्लेश में बनी रहती है। पुरे द्विशकटाकारे तस्करादि भयं भवेत्। वज्राकृति पुरं यत्र वज्रपातस्तदोद्भवेत् ॥ २३ ॥ युग्म शकट पुर में भी चोरों-तस्करों का भय बना रहता है और वज्राकृति पुर में भी सदा वज्रपात होते रहते हैं। त्रिशूले च पुरे चैव सदा युद्धं समुद्भवेत्। कर्णिकारे च दुर्भिक्षं प्रजा तत्र न नन्दति ॥ २४ ॥ त्रिशूल पुर में सदा ही युद्ध की स्थिति बनी रहती है और कर्णिकाकार पुर में प्रायः दुर्भिक्ष-अकाल पड़ते रहते हैं और प्रजा दुःखी रहती है। दीर्घदण्डमिति ख्यातं पवनं पवनात्मकम् ॥ मुरजं मुरजाकारं बृहन्मध्यं प्रकीर्तितम् । अश्वत्थपर्णवत् कुम्भो धनुःकोणाकृतिर्धनुः ॥ शूर्प शूर्भनिभं ज्ञेयं गृहं गणितकोविदैः ॥ (वास्तुरत्नावली और राजमार्तण्ड में शिल्पशास्त्र के मत से उद्धृत) समराङ्गण में छिन्नकर्ण, विकर्ण, वज्र, सूचीख्य, वर्तुल, व्यजनाकार, धनुषाकार, द्विगुणायत, शकटद्विसमाकार, कुदिशस्थ, सर्पचक्र जैसे अप्रशस्त पुरों या अगर्हित पुरों का वर्णन मिलता है, जिनके नियोजन-निर्माण का निषेध किया गया है। (समराङ्गण, पुरनिवेश 53-54 व 67)

416 अपराजितपृच्छा इत्यादिसप्तदोषांश्च वर्जयेत् पुरदोषदान्। विंशतिः सुखदाः ख्याता दोषदाः सप्त एव च ॥ 25 ॥ इस प्रकार उक्त सात पुरों के दोष होते हैं। अस्तु, इन आकारों में पुरों का निवेशन वर्जित जानना चाहिए। यहाँ प्रजा हितावह पुरों की विंशति और सात दोषकारक पुरों का वर्णन किया गया। अथाकारानुसारेण पुरग्रामादीनां प्रमाणमाह — पुरार्धेन भवेद् ग्रामो ग्रामार्धेन तु खेटकम्। खेटकार्धेन भवेत् कूटं कूटार्धेन तु कर्वटम् ॥ 26 ॥ अब विविध नामों के आकार प्रमाण कहता हूँ। पुर के आधे भाग पर बसी हुई बस्ती को ग्राम और ग्राम के आधे को खेटक कहा जाता है। खेट के आधे को कूट और कूट का आधा कर्वट कहलाता है।¹ पुरे सप्तदश मार्गा ग्रामो वै नवमार्गतः । खेटके पञ्च मार्गाः स्युस्त्रिभिर्मार्गैश्च कूटकम् ॥ 27 ॥ पुर नामक बस्ती में 17 सड़कें होती हैं जबकि ग्राम में 9 सड़कें ही होती हैं। खेटक में 5 मार्ग होते हैं और कूट में केवल 3 ही मार्ग होते हैं। द्वौ मार्गौ कर्वटे ख्यातौ छन्दाः पञ्च प्रकीर्तिताः । पुर-ग्राम-खेटकं च कूटं च कर्वटाभिधम् ॥ 28 ॥ इसी प्रकार कर्वट में तो 2 मार्ग ही होते हैं। इस तरह इनके ये पाँच छन्द—पुर, ग्राम, खेटक, कूट और कर्वट नाम से बताए गए हैं।² इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां पुरलक्षणाधिकारो नाम त्रिसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 73 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में पुर लक्षण अधिकार नामक तिहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 73 ॥

  1. अग्निपुराण में ग्राम बस्तियों का विस्तार 100 धनुषों के बराबर कहा गया है। नगर का विस्तार उससे दुगुना अथवा तिगुना माना गया है— धनुः शतं परीणाहो ग्रामस्य तु समन्ततः ॥ द्विगुणं त्रिगुणं वाऽपि नगरस्य च कल्पयेत् । (अग्नि. 227, 19-20)
  2. समराङ्गणसूत्रधार में कहा गया है— खेटं तदर्धविष्कम्भामाहुर्ग्रामं तदर्धतः । योजनने पुरात् खेटं खेटाद् ग्रामं प्रचक्षते। गव्यूतिपरिमाणेन ग्रामाद् ग्रामं प्रचक्षते ॥ द्विक्रोशाद् विषये सीमा तदर्धेन पुरस्य सा। खेटके पुरसीमार्थं ग्रामे खेटार्धतः स्मृता ॥ त्रिंशद्धनूंषि विष्कम्भः पुरे दिग्वर्त्मसु स्मृतः । विंशति खेटके मार्गो ग्रामे दश च दर्शितः ॥ (समराङ्गण. 10, 79-82)

सूत्र-७४ 417 वापीकूपतडादिनिर्णयो नाम चतुःसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 74 ॥ विश्वकर्मोवाच — पुरस्य बाह्याभ्यन्तरे विविधाः स्युर्जलाशयाः । वापी-कूप-तडागानि कुण्डानि विविधानि च ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि नगर के बाहर और अन्दर की ओर भी विविध प्रकार के जलाशयों की व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि जैसा कहा है कि जल ही जीवन है अस्तु, वहाँ वापी, कूप, तड़ाग, कुण्ड आदि विविध प्रकार के जलस्रोत बनाएँ।¹ दश₁₀ कूपांश्चतु₄र्वाप्यश्चत्वारि₄ कुण्डकानि च। तडागाः षड्विधाश्चैव₆ कथयाम्यपराजित ॥ 2 ॥ हे अपराजित ! अब मैं तुम्हें दस प्रकार के कूप, चार प्रकार की वापियाँ, चार प्रकार के कुण्डों और छह प्रकार के तड़ागों के बारे में कहता हूँ। दशविध कूपमाह — श्रीमुखो विजयः प्रान्तो दुन्दुभिश्च मनोहरः । चूडामणिश्च दिग्भद्रो जयो नन्दश्च शङ्करः ॥ 3 ॥ चतुर्हस्तादितो वृद्ध्यार्वद्धस्तस्त्रयोदशम् । श्रीमुखाद्याः शङ्करान्ता दश कूपाः प्रकीर्तिताः ॥ 4 ॥ (1.) श्रीमुख, (2.) विजय, (3.) प्रान्त, (4.) दुन्दुभि, (5.) मनोहर, (6.) चूडामणि, (7.) दिग्भद्र, (8.) जय, (9.) नन्द और (10.) शङ्कर— ये चार गज की चौड़ाई से लेकर क्रमशः एक-एक बढ़ते-बढ़ते तेरह गज की चौड़ाई के श्रीमुखादि से शङ्करान्त दस प्रकार के कूपों के लक्षण बताए गए हैं।² चतुर्हस्तः श्रीमुखः स्याद् विजयः पञ्चहस्तकः । षड्भिर्हस्तैर्भवेत् प्रान्तो दुन्दुभिः सप्तहस्तकः ॥ 5 ॥ मनोहरश्चाष्टहस्तश्चूडामणिर्नवकरः । दिग्भद्रो दशहस्तश्च ह्येकादशकरो जयः ॥ 6 ॥

  1. आदित्यपुराण में आए इसी प्रकार के वचनों को जलाशयतत्त्व में उद्धृत किया गया हैं— सेतुबन्धरता ये च तीर्थशौचरताश्च ये। तडागकूपकर्त्तारो मुच्यन्ते ते तृषाभयात्॥ (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 2, पृष्ठ 170) विष्णुधर्मोत्तर में कहा गया है कि जो तडाग, कूप को बनवाता है, कन्यादान करता है, छत्र, उपानह देता है वह व्यक्ति स्वर्ग को जाता है— तडागकूपकर्त्तारस्तथा कन्या प्रदायिनः। छत्रोपानहदातारन्ते नराः स्वर्गगामिनः॥ (तत्रैवोद्धृत)
  2. चक्रपाणि मिश्र ने भी कहा है— श्रीमुखो विजयः प्रान्तो दुन्दुभिश्च मनोहरः। चूडामणिश्च भद्रो जयो नन्दश्च शङ्कर॥ आरभ्य यावच्चतुष्करं ते व्यासेक्रमादेकक साभिवृद्ध्या। (विश्ववल्लभ 2, 14-15)

418 अपराजितपृच्छा नन्दे च द्वादशकराः शङ्करे च त्रयोदश। एवमादिगुणोपेतो वृत्तकूपा दशोत्तमाः ॥ 7 ॥ इति दशकूपाः। इनमें से श्रीमुख कूप 4 गज का चौड़ा, विजय कूप 5 गज का चौड़ा, प्रान्त कूप 6 गज का, दुन्दुभि 7 गज का, मनोहर 8 गज का, चूड़ामणि 9 गज का, दिग्भद्र 10 गज, जय 11 गज का, नन्द 12 गज का और शङ्कर 13 गज का होता है। इस प्रकार से दस वृत्त कूपों के आदि से गुणों को बताया गया है।¹ कूपिका सफलमाह – शेषास्तु कूपिका वत्स त्रिहस्ताश्चादिमादधः। द्विहस्ता वै प्रशस्ताश्च कर्त्तव्याः सर्वकामदाः ॥ 8 ॥ हे वत्स ! शेष तो छोटी कूपिकाएँ (कुइयाँ) कहलाती है जो 3 गज की चौड़ाई से भी कम की होती जाती हैं। इनमें 3 गज वाली, 2 गज वाली आदि कूपिकाओं में दो गज की चौड़ाई वाली कूपिकाएँ सभी काम में शुभ होती हैं। अस्तु, उन्हें कर्तव्य समझ कर बनाएँ² अथ चतुर्वाप्यः – नन्दा भद्रा जया चैव चतुर्थी विजया तथा। एकवक्त्रा त्रिकूटा च नन्दा नाम वरप्रदा ॥ 9 ॥ चार प्रकार की वापी या बावडियाँ होती हैं— (1.) नन्दा (2.) भद्रा (3.) जया (4.) विजया। इनमें से 'नन्दा' वापी एकमुखी होती है और तीन ओर से कूट अर्थात् बन्द होती है। इस तरह नन्दा नाम की वापी नामानुसार वरप्रदायक है।

  1. अल्प विस्तार से जहाँ मण्डलाकृति में भूमि को खोदा जाता है और जिस गर्त में पानी मिलता है, वह चाहे पक्का बन्धा हुआ हो या निर्बन्ध हो, 'कूप' कहा जाता है— भूमौ खातोऽल्पविस्तारो गम्भीरो मण्डलाकृतिः। बद्धोऽबद्धः स कूपः स्यात्तदम्भः कौपमुच्यते ॥ (भावप्रकाश) इसी प्रकार राजवल्लभ. में आया है— कूपाः श्रीमुखवैजयोऽपि तदनु प्रान्तस्तथा दुन्दुभिस्तस्मादेव मनोहरश्च परतः प्रोक्तस्तु चूडामणिः। दिग्भद्रो जयनन्दशङ्करमतो वेदादिहस्तैर्मिता विश्रान्तैः क्रमवर्द्धितैश्च कथिता वेदादधः कूपिका॥ (राजवल्लभ : चक्रपाणिमिश्र, 4, 27) विश्वकर्मीय दीपार्णव में कहा गया है— चतुर्हस्ताद्द्विकैका यावत् हस्त त्रयोदश। श्रीमुखो विजय चैव प्रान्तो दुन्दुभि श्रीमनोहरः ॥ चूडामणि दिग्भद्रो जया नन्दस्तु शङ्करः। श्रीमुखो चतुर्हस्ताद्य शङ्करस्य त्रयोदश॥ एव नामा द्विगुणोपेत वृत्तकूपादशोगमा। सङ्ख्याहस्तद्वयं कुर्यात् कूपिका नामतद्भवेत् ॥ (दीपार्णव उत्तर. 18, 2-4)
  2. गर्त, कूपिका, कुल्या, आलवाल आदि बिना मान के होते हैं—भवन्ति गर्तानि च कूपिकाश्च कुल्यालवालादि विनैव मानम्॥ (विश्ववल्लभ 2, 15)

सूत्र-७४ 419 द्विवक्त्रा च षट्कूटा भद्रा नाम सुशोभिता। त्रिवक्त्रा नवकूटा च जया वै देवदुर्लभा ॥ 10 ॥ दूसरी 'भद्रा' नामक वापी के दो ओर मुख होते हैं अर्थात् उसमें दो ओर से आवागमन होता है, उनके छह ओर से रोक होती है— इस प्रकार भद्रा सुशोभित है।¹ तीन ओर के आवागमन या मार्ग के मुखों वाली तीसरी 'जया' नामक वापी के नौ ओर रोक होती है। यह बड़ी ही उत्तम होती है। देवताओं को भी ऐसी वापी दुर्लभ मानी जाती है। चतुर्वक्त्रा सूर्यकूटा विजया सर्वतोमुखी। वाप्यश्च कथिता वत्स कुण्डानि शृणु सम्प्रति ॥ 11 ॥ इति चतुर्वाप्यः। 'विजया' वापी के चारों और मुख होते हैं अर्थात् आवागमन योग्य सीढ़ियाँ होती हैं जिसके बारह रोक होती है²— ऐसे हे वत्स! मैंने बावड़ियों के बारे में कहा। अब तुम कुण्डों के बारे में सुनो। चतुर्विधकुण्डानि — भद्रकं सुभद्रकं च नन्दाख्यं परिघं तथा। कुण्डानि देवताग्रेषु कार्याणि शान्तिमिच्छता ॥ 12 ॥ (1.) भद्रक, (2.) सुभद्रक, (3.) नन्दाख्य व (4.) परिघ— ये चार प्रकार के कुण्ड होते हैं, शान्ति के इच्छुकों को इनको देवमन्दिरों के आगे बनाना चाहिए।¹ चतुरस्रं भद्रकं स्यात् सुभद्रं भद्रसंयुतम्। नन्दाख्यं प्रतिभद्रेषु परिघं मध्यभिट्टकम् ॥ 13 ॥ भद्रक कुण्ड चौकोर होता है और सुभद्र कुण्ड के चारों ओर दीवारें या भद्र होते हैं। नन्दाख्य कुण्ड के भी प्रतिभद्र होती है और परिघ कुण्ड के मध्य में भिट्ट

  1. राजवल्लभ में कहा गया है— भद्राख्यकुण्डं चतुरस्रकं च सुभद्रकं भद्रयुतं द्वितीयम्। नन्दाख्यकं स्यात् प्रतिभद्रयुक्तं मध्ये सभिट्टं परिघं चतुर्थम्॥ (राजवल्लभ. 4, 31) दीपार्णव में कहा गया है— कुण्डानां लक्षणं चैव चतुर्विध मुदाहृतः ॥ चतुरश्र भद्रकं नाम सुभद्र भद्रसंयुत। नन्दा क्षौ प्रतिभद्रेषु परिघो मध्यभिट्टोद्भवं ॥ प्रवेशा निर्गमा चैव कर्तव्यास्तेरनेकधाः । (दीपार्णव 18, 7-9)
  2. राजवल्लभ में कहा गया है—वापी च नन्दैकमुखी त्रिकूटा षट्कूटिका युग्ममुखा च भद्रा। जया त्रिवक्त्रा नवकूटयुक्तास्त्वर्कैस्तु कूटैर्विजया मता सा॥ (वही 4, 28) अपराजित के अनुसार ही दीपार्णव में वापियों के लक्षण व भेद इस प्रकार स्पष्ट किए गए हैं— एक वक्त्रां त्रिकूटाश्चं नन्दा नाम वरप्रदा। द्विवक्त्रा षटकूटाश्च भद्रा नाम सुशोभना॥ त्रिवक्त्रा नवकूटाश्च जयास्तु देवदुर्लभा। चर्तुवक्त्रा द्वादशकूटा विजया सर्वतो मुख ॥ चतुर्वापि भवेत्प्राज्ञ नन्दाद्या शुभलक्षणम् ॥ (दीपार्णव 18, 5-7)

420 अपराजितपृच्छा की रचना होती है। चतुर्द्वाराणि सर्वाणि सगवाक्षाणि मध्यतः। गवाक्षमस्तकान्येवं प्रवेशो वाम-दक्षिणे ॥ 14 ॥ इन कुण्डों के चारों और चार द्वार बने होते हैं और उन द्वार पर गोखड़े बने होते हैं। मध्य की ओर तथा उन गवाक्षों-गोखड़ों के मस्तक की ओर से बायें-दायें प्रवेश मार्ग बने होते हैं। प्रवेशा निर्गमास्तत्र विधातव्या ह्यनेकधा। कर्णे चतुष्किकाः कार्यास्तवङ्गपट्टशालिकाः ॥ 15 ॥ मध्ये भिट्टं तु कर्त्तव्यं माडं च तद्धि श्रीधरम्। इसी प्रकार वहाँ, कुण्ड में प्रवेश और निर्गम अनेक प्रकार के बनाने चाहिए। इनके कोनों पर चौकियाँ भी बनानी चाहिए। ये चौकियाँ तवङ्ग एवं पट्टशालिका से युक्त छतरियों के रूप में बनाएँ जिसमें श्रीधर नामक माड की प्रतिष्ठा करें।¹ तत्रैवार्च्चा निर्देशमाह — तन्मध्ये जलशायी स्याद् वाराहो वा तथोच्यते ॥ 16 ॥ भद्रे चैकादश रुद्राः प्रशस्ता द्वारके तथा। दुर्वासा नारदश्चैव विविधा गणनायकाः ॥ 17 ॥ कुण्ड के मध्य में जलशायी वाराह बनाया जाना चाहिए (अथवा जल तक पहुँचने वाली सीढ़ियाँ हों)। कुण्डों के दीवारों (भद्र) पर और द्वारों पर एकादश रुद्र मूर्तियाँ और महर्षि दुर्वासा, देवर्षि नारद व विविध गण नायक देवताओं की मूर्तियाँ प्रशस्त मानी गई हैं। क्षेत्रपालो भैरवश्च तथा चोमामहेश्वरः। कृष्णशङ्करः कर्तव्या दण्डपाणिर्विशेषतः ॥ 18 ॥ इन मूर्तियों की शृङ्खला में क्षेत्रपाल, भैरव, उमा-महेश्वर, कृष्णशङ्कर और विशेष करके दण्डपाणि यमराज-धर्मराज की भी स्थापना करनी चाहिए। कात्यायनी चण्डिका च भल्लस्वामी च भास्करः। हरिहरपितामहश्चन्द्रादित्यपितामहः ॥ 19 ॥

  1. राजवल्लभ. में उक्त प्रमाण के साथ ही चारों कोनों में पट्टशाला के निर्माण का निर्देश भी दिया गया है— कराष्टतो हस्तशतं प्रमाणं द्वारैश्चतुर्भिः सहितानि कुर्युः। मध्ये गवाक्षाश्च दिशो विभागे कोणे चतुष्कास्त्वपि पट्टशालाः ॥ (राजवल्लभ. 4, 32)

सूत्र-७४ 421 हरिहरस्वर्णगर्भः पट्टशाला वाराणासी। तदनुक्रमं वक्ष्यामि यदुक्तं परमेश्वरैः ॥ २० ॥ इसी तरह कात्यायनी, चण्डिका, मल्लस्वामी, भास्कर, हरिहर पितामह तथा चन्द्रादित्यपितामह, हरिहर स्वर्णगर्भ, पट्टशाला वाराणसी के बारे में भी मैं तदनुक्रम से कहूँगा जैसा कि परमेश्वर ने पूर्व में कहा है। चतुर्दशेशलिङ्गानि रुद्रांश्चैवकादशैव तु। सर्वे च द्वादशादित्या द्वादशाथ गणाधिपाः ॥ २१ ॥ चौदह ईश अर्थात् महादेव के लिङ्गों को तथा एकादश रुद्रों के लिङ्गों तथा सभी द्वादश आदित्यों और द्वादश गणाधिपों को भी स्थापित करना चाहिए। पञ्चलीला नवदुर्गा लोकपालांश्च पञ्चधा। त्रयोऽग्नयश्च दिक्पाला मातृणां च तथाष्टकम् ॥ २२ ॥ अब्धयश्चैव चत्वारो गङ्गा च सरिदुत्तमा। तन्मध्ये तु प्रकर्तव्या वाराणासी पद्मासने ॥ २३ ॥ इसी प्रकार पञ्चलीलाओं को, नवदुर्गा, पाँच तरह के लोकपालों, तीनों अग्नियों, अष्ट दिक्पालों तथा आठों मातृकाओं, चारों समुद्रों और गङ्गा आदि उत्तम सरिताओं को बनाकर उसके सबके मध्य में वाराणसी को पद्मासन पर विराजमान करना चाहिए।¹ यच्च वाराणासीवासे तत्पुण्यं नित्यदर्शनात्। नित्यमेव स्नानपूजा गङ्गास्नानादिकं फलम् ॥ २४ ॥ वाराणसी (काशी या बनारस) में आवास करने का जैसा पुण्य फल वहाँ नित्य दर्शनों से मिलता है, वैसा ही पुण्यफल इस तरह की देवमूर्तियों के कुण्ड की दीवाल पर स्थापित करके गंगा स्नानोपरान्त पूजन-अर्चन करने से मिलता है। तस्यार्चने भवेन्मोक्षो यथा गङ्गाजलामृतौ। पतन्ति नैव संसारे यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥ २५ ॥ उनकी अर्चना से वैसे ही मुक्ति मिलती है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है जैसे कि गङ्गा जल रूपी अमृत से मिलती है। मृतकों और मनुष्य का पुनर्जन्म होकर इस संसार-सागर में जब तक सूर्य-चन्द्रमा-तारागण स्थित हैं, तब तक पतन नहीं होता।

  1. मण्डन ने देवार्चाओं के सन्दर्भ में यही मत दिया है- गङ्गाद्या रवयो हरेश दशकं रुद्रा दशैकाधिका दुर्गा भैरवमातृका गणपतिर्वह्नेस्त्रिकं चण्डिका। दुर्वासा मुनिनारदस्तु सकला द्वारावतीलीलिका लोकाः पञ्च पितामहादिविबुधाः स्युर्मध्यदेशे सदा॥ (राजवल्लभ. 4, 33)

422 इत्यमनन्तर तीर्थवर्णनं — कृते च नैमिषं तीर्थं त्रेतायां पुष्करं तथा। द्वापरे च कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गा प्रशस्यते ॥ २६ ॥ अब तीर्थों के बारे में कहता हूँ। सतयुग में नैमिषारण्य की महिमा रही है, त्रेतायुग में पुष्करराज की; द्वापर में कुरुक्षेत्र की महिमा रही और कलियुग में गङ्गा को प्रशस्त तीर्थ माना जाता है। गङ्गाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते। स्नात्वा कनखले तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते ॥ २७ ॥ अस्तु, गङ्गाद्वार (गङ्गोत्री), कुशावर्त (द्वारिका), बिल्व, नीलपर्वत (पुरी), कनखल में स्नान करने पर पुनर्जन्म नहीं होता है। गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि। मुच्यतेसर्वपापेभ्यः स्वस्थानेऽपि वसन्नरः ॥ २८ ॥ यहाँ तक कि आदमी कहीं भी स्नान करते हुए भी गङ्गा का नामोच्चारण करता रहे तो गङ्गा से सैकड़ों योजन दूर होने पर भी अपने स्थान पर स्नान करता हुआ समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। या गतिर्योगमुक्तानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्। सा गतिः सर्वभूतानामन्तर्वेदिनिवासिनाम् ॥ २९ ॥ जो सद्गति योग से मुक्ति प्राप्त करने वालों को तथा ऊर्ध्वरेतस् मुनियों की होती है, वैसी ही सद्गति अन्तर्वेदी निवासी समस्त प्राणियों की भी होती है। फलं तस्य दशगुणं प्राप्नोति चैव नित्यशः। नरोत्तमः स चाप्नोति नित्यं वाराणसीफलम् ॥ ३० ॥ इस प्रकार से बनाए गए कुण्डों में स्नानोपरान्त पूजा-अर्चना से नित्य उससे दश गुना फल मिलता है उतना ही जितना कोई नरोत्तम नित्य वाराणसी में रहकर गङ्गास्नान का फल प्राप्त करता है। तस्य तुलादिकपुण्यं स्थाने वाराणसी भवेत्। धर्मार्थकाममोक्षांश्च यथेच्छं प्राप्नुयान्नरः ॥ ३१ ॥ इति चतुःकुण्डवाराणसी। ऐसे व्यक्ति को वाराणसी में होने वाले पुण्य के तुल्य पुण्य उन्हीं कुण्ड स्थानों में स्नान करने से भी मिल जाता है और मनुष्य यथेच्छ धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष

प्राप्त कर लेता है।¹ अथ सरोवरमाह — सरो महासरश्चैव भद्रकं च तृतीयकम्। चतुर्थं यन्मया प्रोक्तं सुभद्राख्यं तदुच्यते ॥ ३२ ॥ परिघं युग्मपरिघं तडागं षड्विधं स्मृतम्। अब सरोवरों के विषय में कहता हूँ—(1.) सर, (2.) महासर, (3.) भद्रक, (4.) सुभद्राख्य, (5.) परिघ और (6.) युग्मपरिघ— इस तरह तड़ाग छह प्रकार के होते हैं। बकैकस्थलं परिघं युग्मपरिघं तद् द्वितः ॥ ३३ ॥ इसमें से वहाँ एक स्थल पर बकादि पक्षियों के बैठने का स्थल और परिघ यदि दो एक साथ हों तो युग्मपरिघ कहलाते हैं।² अर्धचन्द्रः सरः प्रोक्तं वृत्ताकारं महासरः। भद्रकं चतुरश्रं स्यात् सुभद्रं भद्रसंयुतम् ॥ ३४ ॥ इनमें 'सर' अर्धचन्द्राकार तड़ाग होता है। 'महासर' गोलाकार अथवा वृतीय होता है। 'भद्रक' तड़ाग चौकोर और 'सुभद्र' तड़ाग भद्रयुक्त अर्थात् पाल-दीवार युक्त होता है।


  1. दीपार्णव में कुण्डों पर माड, देवार्चाओं के सन्दर्भ में यही मत पाठभेद से दिया गया है— मध्यभिट्ट कर्तव्या मण्डपे श्रीधरोत्तमम्। तन्मध्ये तु जलशायी वाराह वाथ उच्यते॥ रुद्रएकादशकार्या द्वारिकायां संयुता। दुर्वासा नारदं चैव विघ्नस्य गणनायकम्॥ क्षेत्रपाल भैरवञ्च उमा महेश्वरं तथा। कृष्णशङ्कर कर्तव्यं दण्डपाणि महेश्वर॥ कात्यायनि चण्डिका च सौम्यादित्य मेव च। हरिहरपितामह चन्द्रार्कश्वपितामह ॥ हरिहरहिरण्यगर्भ पट्टशाला वाराणसि। तस्यानुक्रमं वक्ष्ये यदुक्तं परमेष्ठितम्॥ चतुर्दश लिङ्गानी रुद्रैकादशस्तथा। द्वादशार्क गणनाधिप्यं केशवाश्च द्वादश॥ पञ्चलीला नवदुर्गा लोकपालस्यपञ्चक। तथाग्रिदशदिग्पालो मातृका च तथाष्टकम्॥ द्विविध पतिपातता चैव गङ्गा च सरितोत्तमे। तन्मध्ये च कर्तव्या वाराणसी पद्मशाने॥ बहित्रिभागे कुण्डस्य चतुर्दश व्यवस्थितम्। ब्रह्माविष्णु शिवादीनां विविध सद्यसुन्दरम्॥ वाराणसि ता यत्पुण्यं नित्यं पुण्ये दर्शनात्। नित्य स्नानादिकं पूजा गङ्गास्नानादिकं फलम्॥ तस्यार्चने भवेत् सौरव्यं गङ्गाते मरणं तथा। तपतेविव संसारे यावच्चन्द्रार्क तारकम्॥ कृते च नैमिषं तीर्थं त्रेतायां पुष्करं तथा। द्वापरे कुरुक्षेत्रे कलो गङ्गा प्रशस्यते॥ गङ्गाद्वारे कुशावर्त बिल्वके नीलपर्वते। स्नानं कनखले तीर्थे न लमेश पुनर्भव॥ याग तीर्थाग मुक्ताना मुनीनामुर्ध्वरेतसा। सागरति सर्व भूताना मन्त्रवेध निवासिनम्॥ तस्मादशगुण्यं पुण्यं नित्य प्रासाति नित्यस। तस्य तुल्य दिक् पुण्यं कुण्डे वात्र वाराणसि। धर्मार्थकाममोक्षाणां इच्छं प्राप्नोति मानवः ॥ (दीपार्णव 18, 10–25)
  2. राजवल्लभवास्तुशास्त्र में भी यही वर्णन आया है। वहाँ सुभद्र में पक्षियों के बैठने के स्थान का वर्णन भी किया गया है— सरोऽर्धचन्द्रं च महासरश्च वृत्तं चतुष्कोणकमैव भद्रम्। भद्रैः सुभद्रं परिधैकयुग्मं बकाश्रैकगतेन परिघः ॥ (राजवल्लभ ४. २७)

पालिप्रमाणमाह — दण्डसहस्रकं ज्येष्ठं मध्यमं च तदर्धकम्। मध्यमार्धं कनिष्ठं च त्रिविधं पालिदैर्घ्यतः ॥ ३५ ॥ इनमें भी हजार दण्ड की लम्बाई वाला तड़ाग ज्येष्ठ, पाँच सौ दण्ड वाला मध्यम और ढाई सौ दण्ड प्रमाण वाला तड़ाग पाल की लम्बाई के अनुसार कनिष्ठ माना जाता है— ये तीन भेद हैं। पञ्चाशद्धस्तकैर्ज्येष्ठं मध्यमं च तदर्धकम्। कनिष्ठं द्वादशकरः पालिमानं च विस्तरे ॥ ३६ ॥ तड़ाग के पाल-मान के अनुसार 50 गज की दीर्घता वाली पाल ज्येष्ठ, 25 गज वाली मध्यम और 12 गज वाली कनिष्ठ पाल होती है। वापीकूपतडागानि नैकश उदगाश्रयाः । जलाश्रयं च सम्पाद्य कुर्यात् पुण्यं महोत्सवम् ॥ ३७ ॥ वापी, कूप, तड़ाग इत्यादि अनेकों जलाशय होते हैं। अस्तु, ऐसे कोई भी जलस्रोत का निर्माण कराकर पुण्य महोत्सव मनाना चाहिए। यस्य गोपदमात्रं तु ह्युदकं धारयेन्मही। वर्षषष्टिसहस्राणि शिवलोकं स गच्छति ॥ ३८ ॥ यह एक ध्रुव सत्य है कि जो कोई पुण्यार्थी इस धरती पर गाय के खुर प्रमाण का भी जलाशय बनवाता है, वह व्यक्ति साठ हजार वर्षों तक शिवलोक का निवासी होने का पुण्यफल प्राप्त करता है।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वापीकूपतडादिनिर्णयाधिकारो नाम चतुःसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 74 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वापी कूप तडागादि निर्णय अधिकार नामक चौहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 74 ॥

  1. भविष्योत्तरपुराण में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर के प्रति जलाश्रयों की महिमा इसी प्रकार कही गई है। जीवन में जलस्रोतों का निर्माण करवाना पुण्यकारक है। तडाग, देवालय, बावड़ी और सघन छायादार वृक्षों के आरोपण से चतुर्थ फल या मोक्ष की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार पुत्र अपने निजी गुणों द्वारा माता का शील स्वभाव प्रकट करता है, उसी प्रकार जल के आस्वादन द्वारा उसके कर्ता का शुभ ज्ञात होता है। अतः शुभ कर्म द्वारा उपार्जित धन तडाग आदि जलाशयों के निर्माण पर खर्च करना उचित ही है— तडाग देवभवनं वापीवृक्षोघनच्छदः ॥ चतुर्थकं फलं प्राप्तं कारितेऽस्मिंश्चतुष्टये। यथा मातुः समाचष्टे पुत्रः शीलं स्वकैर्गुणैः॥ तथा स्वादेन च जलं कर्तुः सर्वं शुभाशुभम्। अतः शुभागतं द्रव्यं तडागादिषु लापयेत् ॥ (भविष्य. उत्तर 127. 71-73)

सू० ... शस्यावतारो नाम पञ्चसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 75 ॥ अथ युगलक्षणं। अपराजित उवाच - कृते पुण्यमयं सर्वं जगदेतत् चराचरम्। पुण्यात्मनः प्रजा राजा सुवृष्ट्या शोभना क्षितिः ॥ 1 ॥ पुण्यं त्रिभागं त्रेतायां द्विभागं द्वापरे तथा। एकभागं कलियुगे मेघाः स्वल्पजलप्रदाः ॥ 2 ॥ सम्प्राप्ते वै कलियुगे पुण्ये च प्रलयं गते। सर्वार्थनाशतो लोका व्याधिदुःखप्रपीडिताः ॥ 3 ॥ अपराजित बोले कि सतयुग में सारा जगत् चराचर पुण्यमय था तथा राजा और प्रजाजन भी पुण्यात्मा थे। अस्तु, सर्वत्र सुवृष्टि होती रहने से पृथ्वी भी बड़ी शोभायमान थी। इसके बाद, त्रेतायुग में पुण्य तीन भाग; द्वापर युग में पुण्य दो भाग तथा कलियुग में केवल एक भाग ही पुण्य रह गया जिससे मेघ उत्तरोत्तर कम वर्षा करते गए और जब वे कलियुग तक आया तब तो पुण्य तो प्रलय ही हो गया और सर्वार्थों का समस्त लोक में विनाश हो गया और लोग व्याधि, दुःख से पीड़ा भोगने लगे। त्वं पिता जगतां नाथ प्रभो विश्वस्य पालक। प्राप्ते कलियुगो घोरः कथं लोकस्तरिष्यति ॥ 4 ॥ हे प्रभु! आप जगत् के परमपिता हैं, कृपया हे प्रभु! विश्व के पालक!! यह बताएँ कि इस घोर कलियुग के प्राप्त होने पर लोग किस तरह उससे तैरकर पार होंगे? विश्वकर्मोवाच - अधर्मस्थं शिवो हन्ति सृष्टिस्थितिप्रणाशकृत्। अधर्मस्य शिवः कालो नित्यं संहारहेतुकः ॥ 5 ॥ विश्वकर्मा बोले कि शिव अधर्म में लगे हुए लोगों का संहार कर-करके सृष्टि की ऐसी स्थिति का नाश कर देंगे क्योंकि अधर्म के लिए तो शिव स्वयं काल- स्वरूप हैं और नित्य उस अधर्म का संहार करने के हेतु लगे हुए हैं। कलियुगे कृतयुगं शिवपादाब्जसेवनात्। अन्नं नराणामाधारो वाहनानां तु पोषणम् ॥ 6 ॥ भगवान् शिव के चरण कमलों की सेवा करने से कलियुग में भी सतयुग जैसी प्राप्ति हो जाती है क्योंकि इस कलियुग में भी अन्न ही मनुष्य मात्र का जीवन आधार है और सभी के पोषण का वाहक है।

426 अपराजितपृच्छा अथात्र प्रशंसामाह — अन्नं तत्र दयाहेतु भोगलिङ्गं महीतले। निग्रहानुग्रहे शक्तः स भवेत् पृथिवीपतिः ॥ 7 ॥ अस्तु, इस महीतल पर जो भी व्यक्ति अन्न का संग्रह करने और उस राशन का अनुग्रहपूर्वक जनता में दया करके भोग कराने में समर्थ होगा, वही यहाँ का पृथ्वीपति अर्थात् राजा के समान माननीय होगा। गृहे वा नगरे ग्रामे आधिपत्यं च दुर्लभम्। किं पुना राज्यलब्धौ तु चाधिपत्यं महीतले ॥ 8 ॥ अरे, इस बात को समझो कि जब व्यक्ति को अपने घर में, नगर में या ग्राम में भी आधिपत्य मिलना दुर्लभ है, तो फिर इस भूमि पर महीतल पर राज्य-शासन पाना और आधिपत्य कर पाना कितना महत्त्वपूर्ण है ! राज्यार्थं धार्यते शस्यं शस्यार्थं तु जलाशयः। भूमिर्भागपरीक्षार्थं सूत्रधारं परीक्षयेत् ॥ 9 ॥ अस्तु, ऐसा राज्याधिकार पाने के लिए सदा अन्न संग्रह करके उस पर अधिकार रखना चाहिए और इस अन्नोत्पादन कार्य को बढ़ाने के लिए जगह-जगह जलाश्रयों की व्यवस्था करनी चाहिए। इन जलाशयों के लिए उपयुक्त भूमि भाग की परीक्षा हेतु सदा सूत्रधार शिल्पी, गजधर या शिल्पशास्त्रों के ज्ञान की सेवा लेना चाहिए कि वह सूत्रधार शास्त्र ज्ञान सम्पन्न हैं भी या नहीं?1 प्रजाहीनो ध्रुवं वत्स राजा दुःखस्य भाजनम्। शेषं भुङ्क्ते महादुःखे विषये स्वेऽपराजित ॥ 10 ॥ इस तरह यह पाया गया कि प्रजा का आधार अन्न है और राजा, जलाशय और अन्न— इन तीनों का आधार सूत्रधार का शिल्पज्ञान है जिससे वह भूमिजल को उपलब्ध कराता है। इसके अभाव में राज्य प्रजाहीन हो जाता है। हे वत्स! यह राजा के लिए भी बड़े दुःख की बात होगी और वहाँ रहने वाले जो शेष जन समुदाय होंगे, वे भी महान् दुःख भोगेंगे।

  1. काश्यपीयकृषिसूक्ति में आया है कि भूमि की शुभाशुभता की परीक्षा के लिए ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त किया जाना चाहिए जो कि गुणों, लक्षणों के आधार पर उसका वर्गीकरण करने की पर्याप्त दक्षता रखते हों। भूमिविद् चाहे ब्राह्मण हो, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हो, उनके लिए यह भी आवश्यक है कि वे भूमिगत जलानुसन्धान की विधियों के ज्ञाता हो और कृषिशास्त्र विशारद भी होने चाहिए— भूपरीक्षाक्रविदो गुणाढ्या नृपचोदिताः ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वापि विशः शूद्रास्तु वा पुनः। दकार्गल प्रमाणज्ञाः कृषिशास्त्रविशारदाः ॥ (काश्यप. 2, 46-47)

सूत्र-७५ 427 लोकमङ्गलमूलमाह — लोको मूलं भूश्च वृक्षश्चाम्भो भूपालरक्षणम्। तेनाक्षयं भवेद्राष्ट्रं प्रजावांस्तु चिन्तामणिः ॥ 11 ॥ हे अपराजित! लोगों के मङ्गल का मूल है— भूमि, वृक्षं, जल, भूपाल और सबका रक्षण। अस्तु, यदि इनमें से किसी का भी क्षय होता है तो राष्ट्र और राष्ट्र की प्रजा के लिए बड़ी चिन्तामणि अर्थात् शोचनीय स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सारांश यह कि सूत्रधार का जलशोधन का शिल्पशास्त्रीय ज्ञान सबको चिन्तामुक्त कर सकता है। बहुपुण्यप्रभावेण प्रसन्नः साम्प्रतं शिवः। प्रजास्तु पीडिता येन तद्राष्ट्रं गच्छति क्षयम्॥ 12 ॥ यह सब कुछ बहुत पुण्य के प्रभाव से ही सम्भव होता है जिसके कारण शिव तत्काल प्रसन्नता ही समझें। अस्तु, शास्त्रज्ञान से जल की उपलब्धि सर्वोपरि शिव की प्रसन्नता ही समझें। जिस राजा के राज्य में प्रजा को पीड़ा पहुँचती है, उस राष्ट्र का क्षय हो जाता है।¹ अन्यायद्रव्यनिरता न्यायं त्यक्त्वा तु लोभतः। कुलमूलविनाशार्थं राजा हन्ति प्रजां समाम्॥ 13 ॥ जिस राजा के राज्याधिकारी अन्याय से धन कमाने में लगे हों, रिश्वत और भ्रष्टाचार से न्यायमार्ग छोड़कर लोभ में पड़ गए हो, ऐसा बेसुध और अयोग्य शासक राजा अपना, अपने कुल और अपनी तमाम प्रजा के भी नाश का कारण बनता है और स्वयं आत्म हन्ता होता है। वसुधायाः प्रजा मूलं ²धान्यो यस्तां विशेषतः। प्रतिपालयते भूपः सर्वकामफलप्रदः ॥ 14 ॥ इसलिए यह बात सदा अपने ध्यान में रखें कि इस पृथ्वी पर उसका मूल प्रजा ही है और उसमें भी धान्यों की अपनी विशेषता है। प्रजा के जीवनाधार के रूप में और जो राजा अपनी प्रजा का धन-धान्य से पालन करता है, जलाशयों की सुख-


  1. गोस्वामी तुलसीदास ने भी यही बात कही है- जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥ (रामचरितमानस बालकाण्ड, 70, 6)
  2. 'धन्यो' इति प्रकाशित पाठः। काश्यप मुनि का मत है कि देवताओं ने पृथ्व्योत्पन्न धान्य, धागे को माङ्गलिक सूत्र कहा है। इस पर होने वाला धान्य एवं शाक जीवनाड़ी अथवा जीवनदायिनी है, वे पृथ्वी पर जीवनतत्त्व का निर्माण करने वाली है— माङ्गल्यसूत्रं च तथा सस्यमाहुर्दिवौकसः। सस्यादिरेव मेदिन्याः जीवनाडी कलात्मिका॥ (काश्यप. 1, 17)

सुविधा का सूत्रधार के शास्त्रज्ञान से प्रबन्ध कराता है, वह सभी कामनाओं को पूरा करने का फल प्राप्त करता है। वसुधा तु ध्रुवं पुष्पं फल राष्ट्रेषु वै प्रजा। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रजा पाल्या महीभृता ॥ 15 ॥ क्योंकि, यह समझ लें कि यह वसुधा तो केवल पुष्प मात्र है, यह ध्रुव सत्य है परन्तु वही पुष्प राष्ट्र की प्रजा के रूप में फल बन जाता है, इसलिए राजा को चाहिए कि वह सारे प्रयत्न करके अपनी प्रजा के न्यायपूर्वक पालन-पोषण में वृद्धि करें। स्वस्थ देशलक्षणं - यत्र देशे प्रजाः स्वस्थाः सदा च धनिनो जनाः। तत्र देशे च कल्याणमिच्छासिद्धिर्भवेन्नृपः ॥ 16 ॥ जिस देश की प्रजा स्वस्थ या तन्दुरुस्त है, वहाँ के सभी उद्योग-धन्धे सुचारू रूप से चलते हैं और प्रजा अपने उद्यम व उद्योग से धनवान होती है। ऐसे ही स्वस्थ और धनवान प्रजा वाले देशों में सदा कल्याण बना रहता है और वहाँ के राजाओं को भी सभी इच्छाओं की सिद्धि मिलती रहती है। यत्र देशे प्रजाः स्वस्था हेमरत्नविभूषिताः। स देशो दुर्लभो वत्स स्वर्गादिभोगदायकः ॥ 17 ॥ हे वत्स ! मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि जिस देश की प्रजा स्वस्थ है और इतनी धनवान है किसभी लोग सोने-चाँदी-रत्नों आदि के आभूषणों से सुशोभित हो, ऐसा देश इस धरती पर दुर्लभ है और वह स्वर्ग के समस्त भोगों का अधिकारी है। यत्र देशे प्रजाः स्वस्था उत्तमाधममध्यमाः। सर्वकार्येषु सोत्साहाः स देशो दुर्लभः सुरैः ॥ 18 ॥ जिस देश की प्रजा-उत्तम, मध्यम और अधमादि रूप से स्वस्थ-सानन्द हैं और सब कामों में सोत्साह लगी रहती है, वह देश तो देवताओं को लिए भी दुर्लभ है अर्थात् देवताओं से भी बढ़-चढ़कर सुखी है। यत्र देशे प्रजाः स्वस्था दिव्यवस्त्रविभूषिताः। दिव्यभोगा नष्टरिपुः स देशो देवदुर्लभः ॥ 19 ॥ जिस राज्य अथवा देश की प्रजा स्वस्थ है और दिव्य वस्त्रों को धारण करने वाली सम्पन्नता से युक्त है, जिसको दिव्य भोग प्राप्त हैं और जिसके समस्त शत्रु नष्ट हो चुके है- ऐसा देश देवों को भी दुर्लभ है।

सूत्र-७५ 429 यत्र देशे प्रजाः स्वस्था दिव्यलेपनलेपिताः । सर्वभोगप्रभोग्यश्च स देशो देवदुर्लभः ॥ २० ॥ इसी तरह जिस देश की प्रजा स्वस्थ है और दिव्य लेपन से लेपित है अर्थात् अगरु-चन्दनाचित देह और सभी तरह के भोग भोगने में समर्थ, सम्पन्न हो— वह देश देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, देवता भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते। सुभिक्षे तु सदा सौख्यं दुर्भिक्षे तत्कथं भवेत्। यस्य कीर्तिः सुराष्ट्रैश्च नित्यमिच्छन्ति तं नृपम् ॥ २१॥ यह स्मरणीय है कि सुभिक्ष में सदा सुख रहता है और दुर्भिक्ष में वह कैसे हो सकता है ? उसमें तो दुःख ही होता रहेगा। अस्तु, जो राजा अपनी, अपनी प्रजा की और अपने राष्ट्र की सुराष्ट्र के रूप में कीर्ति की नित्य इच्छा रखता है वही वास्तव में नृप कहलाने का अधिकारी है। लोकाः सुभद्रैर्युक्ताश्च गजैश्चाश्वोष्ट्रवाहनैः । ¹( नाना द्रव्यभोक्ताश्च नित्यनन्दप्रमोदितम् ) ॥ २२ ॥ ऐसे राजा के राज्य में रहने वालों में समृद्धि होती है और वे हाथी, घोड़े, ऊँट आदि वाहनों को रखने में सक्षम होते हैं। वे नाना द्रव्यों के भोक्ता और नित्य ही आनन्दित, प्रमुदित रहते हैं। सुभिक्षे² तु प्रजाः स्वस्था राजा तत्र प्रमोदते । प्रजास्वास्थ्ये नृपाः स्वस्था आसमुद्रवसुन्धरम् ॥ २३ ॥ सुकाल होने पर प्रजा स्वस्थ रहती है और प्रजा के स्वस्थ रहने से राजा भी प्रमुदित रहता है। प्रजा के स्वास्थ्य से नृप भी स्वस्थ रहते हैं और समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी भी प्रमुदित रहती है। दुर्भिक्षे क्षीयते धर्मो धन-धान्यक्षयो भवेत्। प्रजाराजक्षयश्चैव दुर्भिक्षा द्रक्षति प्रभुः ॥ २४ ॥ इसके विपरीत, जिस राष्ट्र में दुर्भिक्ष, अकाल पड़ जाता है, वहाँ के निवासियों के धर्म, आचार, विचार, धन-धान्य आदि सब क्षय को प्राप्त होते हुए नष्टभूत हो जाते हैं, दुर्भिक्ष से प्रजा व राजा और राजा की प्रभुता भी क्षय को प्राप्त हो जाती है। प्रजां पोषयते राजा राजानं पोषयेत् प्रजा । अन्योन्यपोषणान्नित्यं राष्ट्रं नन्दति तच्चिरम् ॥ २५ ॥

  1. प्रकाशित पाठे नोपलभ्यते।
  2. 'दुर्भिक्षे' इति प्रकाशित पाठः । (इस पाठ को स्वीकृत करने पर विपरीतार्थ होगा और व्यंग्योक्ति होगी) ।

430 अपराजितपृच्छा यह एक शाश्वत नियम समझें कि जो राजा अपनी प्रजा का पोषण करते हैं, प्रजा की सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखते हैं, उन राजाओं का प्रजा भी पोषण करती हैं और उन राजाओं का नित्य बल बढ़ाने में तत्पर रहती है। इस तरह से दोनों एक दूसरे का पोषण करते हुए चिरकाल तक अपने राष्ट्र को आनन्दित और सुखी रखते हैं।¹ प्रजाहानौ ध्रुवं वत्स राजा स्याद् दुःखभाजनम्। सर्वाङ्गं क्षीयते राष्ट्रं जीवन्तोऽपि मृता नृपाः ॥ २६ ॥ हे वत्स! यह भी ध्रुव सत्य समझ लो कि प्रजा को हानि पहुँचाने वाला राजा भी दुःख का भाजन हो जाता है और ऐसे राजा के सभी विभागों व क्षेत्रों में अव्यवस्था हो जाने से क्षय होने लगता है। इसके चलते ऐसे राजा जीवित होते हुए भी मरे के समान हो जाते हैं। स्वामी तु निर्दयः कालो दुर्भिक्षं चैव रौरवम्। अल्पोदकाश्च मेघाश्च अल्पशस्या च मेदिनी ॥ २७ ॥ जिस राज्य, देश, राष्ट्र का स्वामी निर्दयी होता है, वहाँ सदा काल पड़ता रहता है और यह दुर्भिक्ष भी रौरव नरक के समान दुःखदायी हो जाता हैं, वहाँ वर्षा के मेघों में पानी भी कम होता है जिससे धरती भी खेती की धन-धान्य की उपज की कमी वाली हो जाती है। अपराजित उवाच — यदा मेघा न वर्षन्ति काले वा फल्गुवर्षणम्। अनावृष्टौ स्वल्पवृष्टौ कथं लोका भवन्ति ते ॥ २८ ॥ कथं प्रवर्तते राष्ट्रं सुखिनश्च नृपाः कथम्। कथं च धान्यनिष्पत्तिर्धनादिसुखिनो जनाः ॥ २९ ॥ यह सुनकर अपराजित बोले कि यदि समयोचित वर्षा न हो निस्सार वर्षा हो, अवृष्टि और अनावृष्टि हो अथवा स्वल्प वृष्टि हो तब वहाँ के लोग कैसे रहते हैं? वहाँ सुख कैसे हो? लोग सुखी कैसे हों और राजा भी सुखी कैसे हो? वहाँ धन- धान्य की निष्पत्ति कैसे हो— ताकि वहाँ के लोग धनादि से सुखी हो सके।

  1. विश्वकर्मीयचित्रलक्षण में आया है कि अधर्मपूर्वक शासन सञ्चालित होने वाले देश में अकाल मौतें होती हैं। जहाँ पर राजा धर्मपूर्वक शासन करता है, उसके राज्य में कभी अकाल मृत्यु नहीं होती है— तव शासनकालेऽस्मिन् देशेऽकालमृतिर्यतः ॥ ततोऽधर्मेण राज्यं तं शाससीदं नृप निश्चितम्। विस्मयो य इतः पूर्वं न जातोऽसौ प्रवर्तते ॥ (चित्रलक्षणम् : नग्नजित्, सम्पादक : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा संस्कृत सीरिज, वाराणसी, 2007 ई. प्रथम परिच्छेद 20-21)