भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 470

सू० ... शस्यावतारो नाम पञ्चसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 75 ॥ अथ युगलक्षणं। अपराजित उवाच - कृते पुण्यमयं सर्वं जगदेतत् चराचरम्। पुण्यात्मनः प्रजा राजा सुवृष्ट्या शोभना क्षितिः ॥ 1 ॥ पुण्यं त्रिभागं त्रेतायां द्विभागं द्वापरे तथा। एकभागं कलियुगे मेघाः स्वल्पजलप्रदाः ॥ 2 ॥ सम्प्राप्ते वै कलियुगे पुण्ये च प्रलयं गते। सर्वार्थनाशतो लोका व्याधिदुःखप्रपीडिताः ॥ 3 ॥ अपराजित बोले कि सतयुग में सारा जगत् चराचर पुण्यमय था तथा राजा और प्रजाजन भी पुण्यात्मा थे। अस्तु, सर्वत्र सुवृष्टि होती रहने से पृथ्वी भी बड़ी शोभायमान थी। इसके बाद, त्रेतायुग में पुण्य तीन भाग; द्वापर युग में पुण्य दो भाग तथा कलियुग में केवल एक भाग ही पुण्य रह गया जिससे मेघ उत्तरोत्तर कम वर्षा करते गए और जब वे कलियुग तक आया तब तो पुण्य तो प्रलय ही हो गया और सर्वार्थों का समस्त लोक में विनाश हो गया और लोग व्याधि, दुःख से पीड़ा भोगने लगे। त्वं पिता जगतां नाथ प्रभो विश्वस्य पालक। प्राप्ते कलियुगो घोरः कथं लोकस्तरिष्यति ॥ 4 ॥ हे प्रभु! आप जगत् के परमपिता हैं, कृपया हे प्रभु! विश्व के पालक!! यह बताएँ कि इस घोर कलियुग के प्राप्त होने पर लोग किस तरह उससे तैरकर पार होंगे? विश्वकर्मोवाच - अधर्मस्थं शिवो हन्ति सृष्टिस्थितिप्रणाशकृत्। अधर्मस्य शिवः कालो नित्यं संहारहेतुकः ॥ 5 ॥ विश्वकर्मा बोले कि शिव अधर्म में लगे हुए लोगों का संहार कर-करके सृष्टि की ऐसी स्थिति का नाश कर देंगे क्योंकि अधर्म के लिए तो शिव स्वयं काल- स्वरूप हैं और नित्य उस अधर्म का संहार करने के हेतु लगे हुए हैं। कलियुगे कृतयुगं शिवपादाब्जसेवनात्। अन्नं नराणामाधारो वाहनानां तु पोषणम् ॥ 6 ॥ भगवान् शिव के चरण कमलों की सेवा करने से कलियुग में भी सतयुग जैसी प्राप्ति हो जाती है क्योंकि इस कलियुग में भी अन्न ही मनुष्य मात्र का जीवन आधार है और सभी के पोषण का वाहक है।