अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपालिप्रमाणमाह — दण्डसहस्रकं ज्येष्ठं मध्यमं च तदर्धकम्। मध्यमार्धं कनिष्ठं च त्रिविधं पालिदैर्घ्यतः ॥ ३५ ॥ इनमें भी हजार दण्ड की लम्बाई वाला तड़ाग ज्येष्ठ, पाँच सौ दण्ड वाला मध्यम और ढाई सौ दण्ड प्रमाण वाला तड़ाग पाल की लम्बाई के अनुसार कनिष्ठ माना जाता है— ये तीन भेद हैं। पञ्चाशद्धस्तकैर्ज्येष्ठं मध्यमं च तदर्धकम्। कनिष्ठं द्वादशकरः पालिमानं च विस्तरे ॥ ३६ ॥ तड़ाग के पाल-मान के अनुसार 50 गज की दीर्घता वाली पाल ज्येष्ठ, 25 गज वाली मध्यम और 12 गज वाली कनिष्ठ पाल होती है। वापीकूपतडागानि नैकश उदगाश्रयाः । जलाश्रयं च सम्पाद्य कुर्यात् पुण्यं महोत्सवम् ॥ ३७ ॥ वापी, कूप, तड़ाग इत्यादि अनेकों जलाशय होते हैं। अस्तु, ऐसे कोई भी जलस्रोत का निर्माण कराकर पुण्य महोत्सव मनाना चाहिए। यस्य गोपदमात्रं तु ह्युदकं धारयेन्मही। वर्षषष्टिसहस्राणि शिवलोकं स गच्छति ॥ ३८ ॥ यह एक ध्रुव सत्य है कि जो कोई पुण्यार्थी इस धरती पर गाय के खुर प्रमाण का भी जलाशय बनवाता है, वह व्यक्ति साठ हजार वर्षों तक शिवलोक का निवासी होने का पुण्यफल प्राप्त करता है।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वापीकूपतडादिनिर्णयाधिकारो नाम चतुःसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 74 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वापी कूप तडागादि निर्णय अधिकार नामक चौहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 74 ॥
- भविष्योत्तरपुराण में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर के प्रति जलाश्रयों की महिमा इसी प्रकार कही गई है। जीवन में जलस्रोतों का निर्माण करवाना पुण्यकारक है। तडाग, देवालय, बावड़ी और सघन छायादार वृक्षों के आरोपण से चतुर्थ फल या मोक्ष की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार पुत्र अपने निजी गुणों द्वारा माता का शील स्वभाव प्रकट करता है, उसी प्रकार जल के आस्वादन द्वारा उसके कर्ता का शुभ ज्ञात होता है। अतः शुभ कर्म द्वारा उपार्जित धन तडाग आदि जलाशयों के निर्माण पर खर्च करना उचित ही है— तडाग देवभवनं वापीवृक्षोघनच्छदः ॥ चतुर्थकं फलं प्राप्तं कारितेऽस्मिंश्चतुष्टये। यथा मातुः समाचष्टे पुत्रः शीलं स्वकैर्गुणैः॥ तथा स्वादेन च जलं कर्तुः सर्वं शुभाशुभम्। अतः शुभागतं द्रव्यं तडागादिषु लापयेत् ॥ (भविष्य. उत्तर 127. 71-73)