भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 474

सूत्र-७५ 429 यत्र देशे प्रजाः स्वस्था दिव्यलेपनलेपिताः । सर्वभोगप्रभोग्यश्च स देशो देवदुर्लभः ॥ २० ॥ इसी तरह जिस देश की प्रजा स्वस्थ है और दिव्य लेपन से लेपित है अर्थात् अगरु-चन्दनाचित देह और सभी तरह के भोग भोगने में समर्थ, सम्पन्न हो— वह देश देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, देवता भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते। सुभिक्षे तु सदा सौख्यं दुर्भिक्षे तत्कथं भवेत्। यस्य कीर्तिः सुराष्ट्रैश्च नित्यमिच्छन्ति तं नृपम् ॥ २१॥ यह स्मरणीय है कि सुभिक्ष में सदा सुख रहता है और दुर्भिक्ष में वह कैसे हो सकता है ? उसमें तो दुःख ही होता रहेगा। अस्तु, जो राजा अपनी, अपनी प्रजा की और अपने राष्ट्र की सुराष्ट्र के रूप में कीर्ति की नित्य इच्छा रखता है वही वास्तव में नृप कहलाने का अधिकारी है। लोकाः सुभद्रैर्युक्ताश्च गजैश्चाश्वोष्ट्रवाहनैः । ¹( नाना द्रव्यभोक्ताश्च नित्यनन्दप्रमोदितम् ) ॥ २२ ॥ ऐसे राजा के राज्य में रहने वालों में समृद्धि होती है और वे हाथी, घोड़े, ऊँट आदि वाहनों को रखने में सक्षम होते हैं। वे नाना द्रव्यों के भोक्ता और नित्य ही आनन्दित, प्रमुदित रहते हैं। सुभिक्षे² तु प्रजाः स्वस्था राजा तत्र प्रमोदते । प्रजास्वास्थ्ये नृपाः स्वस्था आसमुद्रवसुन्धरम् ॥ २३ ॥ सुकाल होने पर प्रजा स्वस्थ रहती है और प्रजा के स्वस्थ रहने से राजा भी प्रमुदित रहता है। प्रजा के स्वास्थ्य से नृप भी स्वस्थ रहते हैं और समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वी भी प्रमुदित रहती है। दुर्भिक्षे क्षीयते धर्मो धन-धान्यक्षयो भवेत्। प्रजाराजक्षयश्चैव दुर्भिक्षा द्रक्षति प्रभुः ॥ २४ ॥ इसके विपरीत, जिस राष्ट्र में दुर्भिक्ष, अकाल पड़ जाता है, वहाँ के निवासियों के धर्म, आचार, विचार, धन-धान्य आदि सब क्षय को प्राप्त होते हुए नष्टभूत हो जाते हैं, दुर्भिक्ष से प्रजा व राजा और राजा की प्रभुता भी क्षय को प्राप्त हो जाती है। प्रजां पोषयते राजा राजानं पोषयेत् प्रजा । अन्योन्यपोषणान्नित्यं राष्ट्रं नन्दति तच्चिरम् ॥ २५ ॥

  1. प्रकाशित पाठे नोपलभ्यते।
  2. 'दुर्भिक्षे' इति प्रकाशित पाठः । (इस पाठ को स्वीकृत करने पर विपरीतार्थ होगा और व्यंग्योक्ति होगी) ।