अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें430 अपराजितपृच्छा यह एक शाश्वत नियम समझें कि जो राजा अपनी प्रजा का पोषण करते हैं, प्रजा की सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखते हैं, उन राजाओं का प्रजा भी पोषण करती हैं और उन राजाओं का नित्य बल बढ़ाने में तत्पर रहती है। इस तरह से दोनों एक दूसरे का पोषण करते हुए चिरकाल तक अपने राष्ट्र को आनन्दित और सुखी रखते हैं।¹ प्रजाहानौ ध्रुवं वत्स राजा स्याद् दुःखभाजनम्। सर्वाङ्गं क्षीयते राष्ट्रं जीवन्तोऽपि मृता नृपाः ॥ २६ ॥ हे वत्स! यह भी ध्रुव सत्य समझ लो कि प्रजा को हानि पहुँचाने वाला राजा भी दुःख का भाजन हो जाता है और ऐसे राजा के सभी विभागों व क्षेत्रों में अव्यवस्था हो जाने से क्षय होने लगता है। इसके चलते ऐसे राजा जीवित होते हुए भी मरे के समान हो जाते हैं। स्वामी तु निर्दयः कालो दुर्भिक्षं चैव रौरवम्। अल्पोदकाश्च मेघाश्च अल्पशस्या च मेदिनी ॥ २७ ॥ जिस राज्य, देश, राष्ट्र का स्वामी निर्दयी होता है, वहाँ सदा काल पड़ता रहता है और यह दुर्भिक्ष भी रौरव नरक के समान दुःखदायी हो जाता हैं, वहाँ वर्षा के मेघों में पानी भी कम होता है जिससे धरती भी खेती की धन-धान्य की उपज की कमी वाली हो जाती है। अपराजित उवाच — यदा मेघा न वर्षन्ति काले वा फल्गुवर्षणम्। अनावृष्टौ स्वल्पवृष्टौ कथं लोका भवन्ति ते ॥ २८ ॥ कथं प्रवर्तते राष्ट्रं सुखिनश्च नृपाः कथम्। कथं च धान्यनिष्पत्तिर्धनादिसुखिनो जनाः ॥ २९ ॥ यह सुनकर अपराजित बोले कि यदि समयोचित वर्षा न हो निस्सार वर्षा हो, अवृष्टि और अनावृष्टि हो अथवा स्वल्प वृष्टि हो तब वहाँ के लोग कैसे रहते हैं? वहाँ सुख कैसे हो? लोग सुखी कैसे हों और राजा भी सुखी कैसे हो? वहाँ धन- धान्य की निष्पत्ति कैसे हो— ताकि वहाँ के लोग धनादि से सुखी हो सके।
- विश्वकर्मीयचित्रलक्षण में आया है कि अधर्मपूर्वक शासन सञ्चालित होने वाले देश में अकाल मौतें होती हैं। जहाँ पर राजा धर्मपूर्वक शासन करता है, उसके राज्य में कभी अकाल मृत्यु नहीं होती है— तव शासनकालेऽस्मिन् देशेऽकालमृतिर्यतः ॥ ततोऽधर्मेण राज्यं तं शाससीदं नृप निश्चितम्। विस्मयो य इतः पूर्वं न जातोऽसौ प्रवर्तते ॥ (चित्रलक्षणम् : नग्नजित्, सम्पादक : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा संस्कृत सीरिज, वाराणसी, 2007 ई. प्रथम परिच्छेद 20-21)