भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

430 अपराजितपृच्छा यह एक शाश्वत नियम समझें कि जो राजा अपनी प्रजा का पोषण करते हैं, प्रजा की सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखते हैं, उन राजाओं का प्रजा भी पोषण करती हैं और उन राजाओं का नित्य बल बढ़ाने में तत्पर रहती है। इस तरह से दोनों एक दूसरे का पोषण करते हुए चिरकाल तक अपने राष्ट्र को आनन्दित और सुखी रखते हैं।¹ प्रजाहानौ ध्रुवं वत्स राजा स्याद् दुःखभाजनम्। सर्वाङ्गं क्षीयते राष्ट्रं जीवन्तोऽपि मृता नृपाः ॥ २६ ॥ हे वत्स! यह भी ध्रुव सत्य समझ लो कि प्रजा को हानि पहुँचाने वाला राजा भी दुःख का भाजन हो जाता है और ऐसे राजा के सभी विभागों व क्षेत्रों में अव्यवस्था हो जाने से क्षय होने लगता है। इसके चलते ऐसे राजा जीवित होते हुए भी मरे के समान हो जाते हैं। स्वामी तु निर्दयः कालो दुर्भिक्षं चैव रौरवम्। अल्पोदकाश्च मेघाश्च अल्पशस्या च मेदिनी ॥ २७ ॥ जिस राज्य, देश, राष्ट्र का स्वामी निर्दयी होता है, वहाँ सदा काल पड़ता रहता है और यह दुर्भिक्ष भी रौरव नरक के समान दुःखदायी हो जाता हैं, वहाँ वर्षा के मेघों में पानी भी कम होता है जिससे धरती भी खेती की धन-धान्य की उपज की कमी वाली हो जाती है। अपराजित उवाच — यदा मेघा न वर्षन्ति काले वा फल्गुवर्षणम्। अनावृष्टौ स्वल्पवृष्टौ कथं लोका भवन्ति ते ॥ २८ ॥ कथं प्रवर्तते राष्ट्रं सुखिनश्च नृपाः कथम्। कथं च धान्यनिष्पत्तिर्धनादिसुखिनो जनाः ॥ २९ ॥ यह सुनकर अपराजित बोले कि यदि समयोचित वर्षा न हो निस्सार वर्षा हो, अवृष्टि और अनावृष्टि हो अथवा स्वल्प वृष्टि हो तब वहाँ के लोग कैसे रहते हैं? वहाँ सुख कैसे हो? लोग सुखी कैसे हों और राजा भी सुखी कैसे हो? वहाँ धन- धान्य की निष्पत्ति कैसे हो— ताकि वहाँ के लोग धनादि से सुखी हो सके।

  1. विश्वकर्मीयचित्रलक्षण में आया है कि अधर्मपूर्वक शासन सञ्चालित होने वाले देश में अकाल मौतें होती हैं। जहाँ पर राजा धर्मपूर्वक शासन करता है, उसके राज्य में कभी अकाल मृत्यु नहीं होती है— तव शासनकालेऽस्मिन् देशेऽकालमृतिर्यतः ॥ ततोऽधर्मेण राज्यं तं शाससीदं नृप निश्चितम्। विस्मयो य इतः पूर्वं न जातोऽसौ प्रवर्तते ॥ (चित्रलक्षणम् : नग्नजित्, सम्पादक : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा संस्कृत सीरिज, वाराणसी, 2007 ई. प्रथम परिच्छेद 20-21)

सूत्र-७५ 431 शस्यहानौ कुतो लोकाः कुतो राष्ट्रं सराजकम्। कुतः प्रवर्तते सृष्टिर्विश्वेश कथयस्व मे ॥ ३०॥ हे विश्वेश ! अब यह सब मुझे कहने की कृपा करें कि शस्य की हानि होने पर भी लोक और राष्ट्र कैसे सराजक अर्थात् प्रसन्न रह सके ?¹ विश्वकर्मोवाच — शृणु वत्स महागुह्यं त्वत्पृष्टमपराजित। वक्ष्यामि दुस्तरे काले तारणं समुदाहृतम् ॥ ३१॥ अपराजित के प्रश्न पर विश्वकर्मा बोले कि हे वत्स सुनो ! तुम्हारा पूछा गया यह प्रश्न महान गुह्य (गोपनीय या अति कठिन) है तथापि दुर्भिक्ष जैसे दुस्तर काल में भी तारण का उपाय ठीक-ठीक तरह से कहता हूँ।² दुर्भिक्षनिवारणोपाय — यच्छस्यानि प्ररोहन्ति स्वल्पवृष्टौ च पुत्रक। दुर्भिक्षं न भवेत्तत्र यदुपायेऽपराजित ॥ ३२॥ हे पुत्र अपराजित ! स्वल्प वृष्टि अथवा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में यदि ऐसे शस्य,

  1. अपराजित का यह प्रश्न मरुभूमि-जाङ्गल प्रदेश की ओर सङ्केत है जहाँ 12-12 वर्ष तक वर्षा नहीं होती आई है। इस प्रदेश की यह विषमता भी है कि लगातार तीसरे वर्ष लघु अकाल और बारह-बारह वर्ष पर महादुर्भिक्ष होता आया है। इस क्षेत्र में जल का सदा ही अभाव रहा है। भुवनदेव ने निश्चय ही अकालजन्य त्रासदियों को देखा है। मौर्य साम्राज्य ने भी बारह वर्ष तक अकाल का सामना किया था। इस ग्रंथ के रचनाकाल के आसपास ही देशभर में जलाशयों की विशेष आवश्यकता समझी गई थी। जगडूचरितम् में इस काल के अकाल का वर्णन है। मालवा, मेवाड़ और गुजरात में 12-13वीं सदी में अनेक जलाशय और बाँध बने और गाँव-गाँव बाँधों को बाँधने की प्रवृत्ति का विकास भी हुआ। मेवाड़ में शासक विस्तृत बाँधों का निर्माण करके अपने नाम के आगे भी समुद्र के पर्याय के रूप में 'रांण' (राणा) या 'महाराणा' जैसे उपाधियाँ धारण करने वाले हुए।
  2. चाणक्य का मत है कि दुर्भिक्ष जैसी आपातिक घटनाओं का सामना करने के लिए राजा सर्वप्रथम प्रजा के लिए बीज व खाद्य सामग्री (भक्त) का प्रबन्ध करता। इसके अतिरिक्त वह दुर्ग, सेतु के निर्माणादि से प्रजा को जीविकोपार्जन के साधन प्रदान करता। यदि ऐसा भी सम्भव नहीं होता तो अकाल राहत के रूप में प्रजा को खाद्य सामग्री देता (भक्त-संविभागम्) या कुछ समय के लिए अकाल पीड़ितों को किसी अन्य प्रदेश में भेज सकता है (देशनिक्षेपं वा) अथवा वह अपने किसी मित्र राज्य से सहायता ले सकता है या वह जनसंख्या के व्यवसायहीन लोगों को विदेश भेजकर (निरुपयोग जनानां तत्काले देशान्तर प्रेषणेन अल्पत्व करणम्), जनसंख्या को घटा (कर्षण) कर सकता है या बहुत बड़ी संख्या में अपनी प्रजा को किसी दूसरे समृद्ध देश में भेजने का प्रबन्ध कर सकता है या फिर वह समुद्र के तटवर्ती प्रदेश या किसी ऐसे देश की मदद ले सकता है जहाँ जलाशय हो ताकि वहाँ लोगों को मत्स्यादि आखेट कर उदरपूर्ति का आश्रय मिल सके। (अर्थशास्त्र अधि. 4, 3 तथा राधाकुमुद मुखर्जी : चन्द्रगुप्त मौर्य और उसका काल, पृष्ठ 100-101)

432 अपराजितपृच्छा धान्यादि की बुवाई करें जो कि अल्पवृष्टि में भी अङ्कुरित होकर बढ़ सके तो इस उपाय से वहाँ दुर्भिक्ष कभी भी नहीं पड़ सकता है। उत्पद्यते यतः शस्यं नराणां जलसङ्ग्रहात्। जलाशये बन्धिते च क्षिप्रं शस्यं प्ररोहति ॥ ३३ ॥ इसके साथ ही जिन प्रदेशों के लोग खेती के लिए जहाँ कहीं भी जल संग्रह करने में सजग और तत्पर रहेंगे वहाँ भी धान्यों के उपजने में सुविधा होगी क्योंकि जलाशयों के बाँधने से धान्य जल्दी-जल्दी अङ्कुरित होकर वृद्धि को प्राप्त होते हैं। केचिन्महानदीतीरे केचिच्च सरिदाश्रये। केचित्कूपोदके वत्स अष्टाष्टौ शस्यसम्भवाः ॥ ३४ ॥ हे वत्स! सजग रहकर यदि श्रमपूर्वक कतिपय महानदियों या अन्य नदियों के किनारों पर और कुओं के जल से खेती की जाए तो आठ-आठ, कुल सोलहों प्रकार के धान्यों¹ की खेती करना सम्भव हो सकता है। नगरे च पुरे ग्रामे खेटे कूटे च कर्वटे। वापी-कूप-तडागानां नदीनां बन्धनादिकम् ॥ ३५ ॥ अतएव इस बात को गाँठ बाँध लो कि नगरों में, पुरों में, खेट, कूट और कर्वट में जहाँ भी अवसर मिले वहाँ वापी, कूप, तड़ागों की और नदियों पर बाँध बनाने और जल संरक्षण के लिए सदा तत्परता दिखाएँ।² अरहट्टप्रवाहाणां सारणीनां तथैव च। सञ्चये सर्वशस्यानि जलं वै भूमिसंस्थितम् ॥ ३६ ॥

  1. पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में विविध धान्यों के नाम आए हैं— श्याम-माष-मसूरश्च धान्य-कोद्रव- सर्षपाः। मुष्टको राजमाषश्च तुमुरो जुमरस्तथा॥ यव-गोधूम-मुद्गाश्च तिलक-ङ्गु-कुलुत्थकाः। गवेधुकाश्च नीवारा आतकश्च कलायकाः॥ माण्डुको वज्रकोरङ्क कीचको वडकतथा। तिलकाश्चणकाद्याश्च धान्यानि कथितानि वै॥ (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 2, पृष्ठ 792) इसी प्रकार विष्णुपुराण में आया है कि व्रीहि (धान), यव (जौ), गोधूम (गेहूँ), अणव (छोटे धान्य), तिल, प्रियङ्गु (काँगणी), उदार (ज्वार), कोरदूष (कोदो), सतीनक (उनालू ग्वार या छोटी मटर), माष (उड़द), मुद्ग (मूँग), मसूर, निष्पाव (बड़ी मटर), कुलुत्थ (कुलथ), आढक्य (अरहर), चणक (चना) और सन (सण)— ये सत्रह प्रकार की ग्राम्य ओषधिवर्ग में हैं जिनमें से सन को छोड़कर सब खाद्याहार है। (विष्णु. 1, 6, 20-
  1. विष्णुधर्मोत्तरपुराण में भी आया है—उदकेन विना वृत्तिर्नास्ति लोकद्वये सदा। तस्माज्जलाशयाः कार्याः पुरुषेण विपश्चिता॥ अग्निष्टोमसभः कूपः सोऽश्वमेधसमो मरौ। कूपः प्रवृत्तपानीयः सर्वं हरति दुष्कृतम्॥ कूपकृत्स्वर्गमासाद्य सर्वान्भोगानुपानुते। तत्रापि भोगनैपुण्यं स्थानाभ्यासात्प्रकीर्तितम्॥ (विष्णुधर्मोत्तर. 3, 296, 5-7)

सूत्र-७५ 433 इसी प्रकार वहाँ रहट, प्रवाहमार्ग- नाली-धोरे, कुल्या-नहर आदि की व्यवस्था होनी चाहिए¹ ताकि भूमिस्थ जल का सञ्चय हो और वह समस्त प्रकार के धान्यों की निष्पत्ति के निमित्त सिंचाई के कार्य आ सके। पातालोद्भवा मेघाश्च घटिका ²मोघधारिणः । सेतुबन्धभवा नद्याः शस्योभयतटोद्भवाः ॥ 37 ॥ समझ लो कि भूमिगत जल को (दकार्गल³ विद्या से) प्राप्त करके एक तरह से हम पातालों में उत्पन्न हुए बादलों से जल प्राप्त करते हैं। वह जल रहट के विज्ञान से अर्थात् रहट की माल के घड़ों में ही बादलों को धारण करके लाने के समान है। इसी तरह नदियों पर भी स्थान-स्थान पर सेतु बाँधकर दोनों तटों की भूमि में भी खेती की जा सकती है।

  1. मौर्यकाल में नदीपाल नामक अधिकारी की नियुक्ति का विधान किया गया है। चाणक्य ने सीताध्यक्ष के लिए नदी, झील, जलाशय व कूहों के जलद्वारों के नियमन द्वारा पानी के उचित वितरण की व्यवस्था का निर्देश किया है— उद्घाटं उद्घाट्यते निस्सार्यते जल अननति उद्घाटो अरघट्टकादियन्त्रम् ॥ (अर्थशास्त्र अधि. 3, 9) काश्यपीयकृषिसूक्ति में आया है कि जलाशयों, जलस्रोतों के अभाव में पेयजल का प्रबन्ध नहीं होगा, जल के अभाव में न तो सांध्यकर्म होगा न ही स्नान हो सकता है फिर भला पौधों की वृद्धि कैसे हो सकती है ? इसी कारण मुनियों ने कहा है कि पानी के अभाव में सुख नहीं होता, यह निश्चित है अतः प्रजारक्षा का सङ्कल्प करने वाले शासक को चाहिए कि वह सर्व प्रयत्न पूर्वक जलस्रोतों का भी विकास करें। पुनः कहा गया है कि शासक को चाहिए कि वह ग्राम, देश के वनखण्ड में गम्भीर, वृहदाकार जलाशयों का निर्माण करवाएँ। जलाशयों से नहरों को भी निकाला जाए जो बहुत मजबूत बनी हो और हमेशा उनमें पानी का प्रवाह बना रहे। बड़ी नहरों से जुड़ी अनेक शाखाओं या वितरिकाओं का विस्तार भी किया जाना चाहिए जो अन्तःसम्बद्ध हो। इनका और जलाशयों का निर्माण बहुत मजबूत करवाना चाहिए— जलाशयविहीने तु सुखं नैवोपजायते। न सान्ध्यकर्म न स्नानं वृक्षाणामपि वर्द्धनम् ॥ न स्यादित्येव मुनिभिः सौख्यं त्विति विनिश्चितम्। अतः सर्वप्रयत्नेन भूपालो रक्षणव्रती ॥ ग्रामेष्वपि च देशेषु वनमध्ये तु वा पुनः। स्थापयित्वा तु गम्भीरं जलाशयममन्दितः ॥ कुल्यां दृढतरां नित्यं सुलभोदकनिः स्रवाम्। नानाशाखासमाक्रांतां महाकुल्यायुतां तथा ॥ जलाशयेन सहितां स्थापयेत् बहुशोटढाम्। (काश्यपीय. 3, 107-110 तुलनीय कृषिपाराशर 196-97)
  2. मेघ धारिणः स्यात्।
  3. दकार्गल विद्या एक प्रकार से भूमिगत पानी के ज्ञान की कुञ्जी मानी जाती है। वराहमिहिर के मतानुसार सारस्वत मुनि ने इस विद्या का सूत्रपात किया। बाद में मनु, बलदेव, काश्यप आदि ने इसे लिखा। वराह ने इसे बृहत्संहिता में आर्यादि विविध छन्दों में निरूपित किया— धर्म्यं यशस्यं च वदाम्यतोऽहं दकार्गलं येन जलोपलब्धिः। पुंसां यथाङ्गेषु शिरास्तथैव क्षितावपि प्रोन्नतनिम्नसंस्थाः ॥ एकेन वर्णेन रसेन चाम्भश्च्युतं नभोस्तो वसुधाविशेषात्। नानारसत्वं बहुवर्णतां च गतं परीक्ष्यं क्षितितुल्यमेव ॥ (बृहत्संहिता 54, 1-2) इसके बाद सुरपाल ने वृक्षायुर्वेद में उद्धृत किया और 1577 ई. में चक्रपाणि मिश्र ने इसको पुनः नए अनुभवों के साथ भी लिखा। (विशेष द्रष्टव्य— डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' सम्पादित वृक्षायुर्वेद और विश्ववल्लभ-वृक्षायुर्वेद)

434 अपराजितपृच्छा अजलाश्र्व जलाकीर्णा अवृष्ट्याैकार्णवीकृता । धर्मस्त्राता च दुर्भिक्षे धर्मराजो महोत्सवः ॥ ३८ ॥ उक्त सभी उपायों से जहाँ की भूमि में जल का अभाव देखा गया हो, वहाँ की भूमि जलाकीर्ण अर्थात् जल से लबालब तालाबों वाली हो जाएगी और अवृष्टि होने पर भी चारों ओर सागरों से भरी-पूरी सी होगी क्योंकि दुर्भिक्ष में यही ज्ञान धर्मत्राता बनकर आता है। अस्तु, इस धर्मराज के महोत्सव अर्थात् जल संग्रह के श्रमदान- अनुष्ठान को महोत्सव की तरह मनाकर जल सञ्चय से सुखी होना चाहिए। सम्प्राप्तो धर्मराजत्वं वरुणस्त्रिदशैः सह। तं देशं स्वर्गमाख्याति चेन्द्रतुल्यस्य भूपतेः ॥ ३९ ॥ इस प्रकार के श्रमदान या धर्म की साधना से धर्मराजत्व की सम्प्राप्ति होती है और वरुण देवता के साथ अन्य देवताओं की कृपा से वह देश स्वर्ग कहलाने लगता है और वहाँ ऐसे जल सञ्चय और संरक्षण करने के उद्योग में लगे रहने वाला राजा भी इन्द्र के समान आदरणीय और सुखी रहता है। रसो रसायनं ज्ञानं धनधान्यादिसम्भवः । सर्वं प्राप्तं फलं तेन येन वै सञ्चितं जलम् ॥ ४० ॥ सभी प्रकार के रसों और रसायनों का ज्ञान भी धन-धान्य सम्भव होने पर ही होता है। अस्तु, जिसने जल सञ्चयन का विज्ञान प्राप्त कर लिया, उसने सभी फलों को प्राप्त कर लिया— ऐसा समझें। स्वर्णपुष्पफलैर्युक्तो नित्यं स त्वपराजित । नृपेण सूत्रधारेण महीशस्यादिभूषिता ॥ ४१ ॥ हे अपराजित ! यह समझ लो कि ऐसे उद्योगों के कर्ता और समझदार राजा ने सूत्रधार के ज्ञान की सहायता से इस भूमि को धन-धान्य से भूषित करके मानों स्वर्ण-पुष्प-फलों की खेती-बाड़ी का अनुष्ठान कर लिया है।¹

  1. जिस देश की माटी सोना उगले और जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़ियाँ गीत-गुञ्जार करे— ऐसा खुशहाल देश हो, इसी प्रकार के जल सञ्चय और जल संग्रहण के अनुष्ठान से छोटे-छोटे चेकडेम, एनीकट के प्रयोग जैसे कार्य आज अति आवश्यक है। अपराजित शिल्पशासन ने लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व ऐसे उपाय बताए हैं। इन निर्देशों का मेवाड़ के राजाओं ने सर्वाधिक पालन किया। इस ग्रन्थ के रचनाकाल के आसपास ही, 1265 ई. में घाघसा (चित्तौड़गढ़) गाँव में वापी का निर्माण हुआ था। यहाँ से कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा संवत् 1322 की प्रशस्ति मिली है जिसमें अपराजित के वंशज जैत्रसिंह द्वारा गुजरात के तुरुष्कों व शाकम्भरी के शासकों को पराजित करने का वर्णन है। इसकी रचना आचार्य रत्नप्रभ ने की जो आचार्य भुवनदेव सिंहसूरी का शिष्य था। इस प्रशस्ति के ठीक तीन साल पहले

सूत्र-७५                     १७७ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां शस्यावतारधिकारो नाम पञ्चसप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७५ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में शस्यावतार अधिकार नामक पचहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ७५ ॥ महाराजनिवेशोनाम षट्सप्ततितमं सूत्रम् ॥ ७६ ॥ विश्वकर्मोवाच — चतुःषष्टिपदैर्भक्ते राजवेश्मनि वास्तुनि। देववेश्य( ?म )राजवेश्म मैत्रपदे समाश्रितम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि राजभवन के वास्तु में चौंसठ पद विन्यास के वास्तुमण्डल के अनुसार जो भवन बनाए जाते हैं, वे देववेश्म अथवा राजवेश्म जो भी हों, मैत्रपद के समाश्रित होते हैं। उच्चरङ्गिका प्रमाणमाह — प्रदक्षिणान्ते मार्गांश्च निवेशयेत्तु वेश्मनः। गजस्कन्धसमोत्सेधा प्रथमा ह्युच्चरङ्गिका ॥ २ ॥ उन वेश्मों अर्थात् भवनों में प्रदक्षिणा के अन्त में मार्गों का निवेश होना चाहिए अर्थात् मार्गों को बनाएँ। उनमें जो पहली उच्चरङ्गिका बनाएँ, उसे हाथी के कन्धे जितनी ऊँचाई की बनाएँ। अन्य गृहादीनां — इन्द्रेन्द्रजयोर्मध्ये च राजमातुर्निवेशनम्। रुद्रे रुद्रदासे चैव वेश्मनः पेटमादिकम् ॥ ३ ॥ इसी प्रकार उसमें इन्द्र और इन्द्रजय पद विन्यास के भाग में राजमाता के लिए भवन बनाना चाहिए। रुद्र और रुद्रदास वाले पद विन्यास में पेटमादिक के भवन बनाने चाहिए अर्थात शृङ्गार-पेटियों और टोकरियों, थैलों का भण्डार गृह बनाना चाहिए। चौहानवंशी चाचिगदेव द्वारा जोधपुर के निकट सुण्डा या सुगन्धाद्रि पर्वत पर अपराजितेश के मन्दिर के लिए स्वर्ण कलश व ध्वजा बनवाने का वर्णन वहाँ से प्राप्त प्रशस्ति में मिलता है। जयसमुद्र के पास वीरपुरा में रहट सहित कुएँ वाली भूमि का दान हुआ। आहाड़ में भी रहट-हल-निवाण की भूमि का दान गजराज के चाणक षोथा धींग ने किया था।

436 अपराजितपृच्छा वेदाक्षेन्द्रजयोर्मध्ये भ्रमणी पदमध्यगा। राजभुवनस्यार्धे तु भ्रमणी मार्गनिर्गता ॥ 4 ॥ उक्त इन्द्र और इन्द्रजय के चारों पद विन्यास के मध्य में पदों के मध्य से गुजरती हुई भ्रमणी बनानी चाहिए। उस राजभवन के आधे से बनने वाली भ्रमणी मार्ग के बाहर की ओर निकलती हुई बनानी चाहिए। तदूवीथ्यग्रसन्धौ च प्रतोलीः कारयेच्छुभाः। कार्याश्च भ्रमणीमध्ये गजशालास्तथोत्तमाः ॥ 5 ॥ उन वीथियों के अर्थात् मार्गों के अग्रभाग की सन्धि पर एक सुन्दर प्रतोली अर्थात् पोल बनाएँ। उन भ्रमणियों के मध्य वाले भाग में उत्तम गजशाला (हाथीखाना) का निर्माण करना चाहिए। पूर्वार्धे तु त्रिभिर्मांडैः पङ्क्तिरेका तु संस्थिता। अपरयाम्योत्तराणि ? शालाकिन उदाहृताः ॥ 6 ॥ उसके पूर्वार्ध भाग में तीन-तीन माड़ों की एक कतार बनानी चाहिए और दूसरी पश्चिम और उत्तर दिशा की ओर भी शाला ऐसी ही बनानी चाहिए। तद्वाह्यतोऽन्तर्मार्गश्च कर्तव्यं शुभलक्षणम्। महिषीगृहल्पहीनं राजमातृगृहं भवेत् ॥ 7 ॥ उनमें बाहर जाने और भीतर आने के अन्तःमार्ग भी भली प्रकार आरामदायक बनाए जाने चाहिए। यह भी ध्यान में रखें कि राजमहिषी अर्थात् राजरानी या पटरानी के महल से राजमाता का महल आकारादि में थोड़ा न्यून होना चाहिए। मैत्रान्ते पुरतो भागे द्वारगर्भस्तथान्तरे। गोपुराकृतिः कर्तव्यो दृढार्गलसमन्वितः ॥ 8 ॥ वास्तुपद विन्यास के अनुसार मैत्रान्त तक के पद भाग पर नगर के लिए आगे के भाग में द्वारगर्भ बनाना चाहिए जिसकी आकृति गोपुरम् के आकार की हो। उनमें भी कपाट बन्द होने के बाद सुदृढ़ अर्गला लगाकर सुरक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। तत्सूत्रेण कृतं द्वारं राजमातृगृहात्परम्। मैत्राग्निकर्णे कुर्याच्च सभामांडं सुशोभितम् ॥ 9 ॥ इसी द्वार की सीध के सूत्र में राजमाता के गृह का भी द्वार भी उसके परे होना चाहिए और वास्तुपद विन्यास के मैत्राग्रिपद कर्ण पर एक सुन्दर सुशोभित सभामांड अर्थात् सभामण्डप बनाएँ अर्थात् मैत्रपद के अग्निकोण वाले भाग पर सभामण्डप बनेगा।

सूत्र-७६ 437 सिंहासनसमायुक्ता याम्यस्था चोत्तरानना। सिंहावलोकनयुक्ता महाराजसभा भवेत् ॥ 10 ॥ इसी तरह मैत्रपद के पश्चिमी भाग में उत्तराभिमुख सिंहासन से युक्त सजी हुई ऊँचे सिंहावलोकनयुक्त अर्थात् बड़े-बड़े, विशाल झरोखों वाली महाराज सभा का निर्माण कराना चाहिए। सभामध्ये तु कर्तव्यं वेद्यां सिंहासनं महत्। श्रीधरोद्भवमाडं च सुवर्णरत्नभूषितम् ॥ 11 ॥ सभा भवन के मध्य भाग में ऊँची वेदिका बनाकर उस पर बृहद् सिंहासन की स्थापना करें। उस पर स्वर्ण, रत्नादिकों से भूषित श्रीधर नामक माड़ की रचना होगी। ब्रह्मस्थानार्धतः स्तम्भैः सिंहद्वारं गर्भोत्तरे। याम्योत्तरे तु कर्तव्या गजयुधा गजोत्तमाः ? ॥ 12 ॥ इसके बाद, ब्रह्मस्थान के आधे भाग से उत्तर की ओर बीचो-बीच सिंहद्वार, बनाएँ और ब्रह्मद्वार के बने सिंहद्वार के उत्तर-दक्षिण दोनों भागों में अच्छे बलवान हाथियों की लड़ाई करने के गजयुध के अग्गड़ बनाए जाए, जहाँ हाथियों की नियमित बल परीक्षा हो सके। तदग्रे चाट्टालकानि प्राकारे स्याद्रथाकृतिः। राजगृहाद् द्वे प्रतोल्यौ प्राकारान्तर्विनिर्गते ॥ 13 ॥ उन गजयुधों अर्थात् हाथियों के लड़ाई के अग्गड़-ठाणों के आगे ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ बनाई जाए जिनकी दीवार की आकृति रथ के समान हो अर्थात् उनसे चारों ओर फिर करके हाथियों की लड़ाई देखने का मनोरञ्जन हो सके। उन्हीं अट्टालिकाओं के प्राकारान्त से लगी राजगृह कीं ओर से आती हुई मार्ग पर दो बड़ी पोलें कुछ आगे की ओर निकली हुई बनानी चाहिए। राजमातुः पट्टराज्ञ्याः प्राकारो गृहतो भवेत्। सिंहद्वारसमानान्त्यनेकद्वाराणि कारयेत् ॥ 14 ॥ जहाँ से राजमाता, पटरानियाँ आदि प्राकार, परकोटे पर बने हुए गृहों से सिंहद्वार के समान बने हुए अनेक झरोखों के द्वारों से यह गजयुद्ध का मनोरञ्जन देख सके। विवस्वत् पृथ्वीधरार्धे प्राकारः पूर्वनिर्गतः। ब्रह्मणोऽन्ते तु प्राकारो जयद्वारं गर्भोत्तरे ॥ 15 ॥

वास्तुपद विन्यास के भवन निर्माण क्षेत्र के विवस्वत और पृथ्वीधर के भाग के आधे क्षेत्र में पूर्व दिशा की ओर निकलते हुए प्राकार अर्थात् परकोटा बनाएँ। इसी तरह ब्रह्मभाग वाले पद स्थान के गर्भ से उत्तर की ओर परकोटा बनाकर उसके आगे जयद्वार की रचना करें। तत्प्राकारमध्यकर्णे गजशालावुभौ मतौ। तस्य बाह्ये गृहमन्यं राजपिण्डपाद्यादिकम् ॥ 16 ॥ उस परकोटे के मध्यवर्ती कोनों पर भी दोनों ओर हाथियों के ठाण या गजशालाएँ बनाएँ। फिर, उनके बाहर की ओर अन्य कोई गृह निर्माण किया जाए जिसमें राजा के पिण्ड अर्थात् खाद्य और पाद्य अर्थात् पीने की सामग्री के संग्रह की व्यवस्था होगी। आपवत्समरीच्यर्धे राजवेश्म गृहोत्तमम्। कपिशीर्षयुतश्चैव प्राकारो वास्तुबाह्यतः ॥ 17 ॥ वास्तुपद विन्यास के आपवत्स और मरीचि पद के क्षेत्र के आधे में उत्तम राजवेश्म या राजमहल बनाए जाएँ जिनके बाहर के परकोटे पर कपिशीर्ष अर्थात् सुन्दर कंगूरे बने हुए हों। पित्रग्नीशरोगकर्णेष्वट्टालकचतुष्टयम्। महाप्रतोल्या माहेन्द्रे गिरिसंस्था तथोत्तरे ॥ 18 ॥ इसी तरह वास्तुपद विन्यास के क्षेत्र के पितृ, अग्नि, रोग और ईश— इन चारों कोनों के पद भागों पर चार बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बनाई जाएँ जिन्हें 'अट्टालक चतुष्टय' नाम दिया गया है तथा वास्तुपद विन्यास के उत्तर भाग में माहेन्द्र, गिरि के स्थान पर एक महा प्रतोली या बड़ी पोल बनाई जाए। भास्वतो यमदिग्भागे समस्ता च वलूरिका। राजवेश्मान्तर्भागे च वाद्यशाला तथोत्तरा ॥ 19 ॥ वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के दक्षिण दिशा के भाग में सभी प्रकार की वलूरिकाएँ, वनकुञ्ज, पर्णशाला, झुरमुट, निकुञ्ज, बीहड़ क्षेत्र आदि रखे जाएँ। महल की ओर के अन्तरङ्ग भाग में बाह्यशाला का निर्माण अवश्य होना चाहिए जहाँ राजमहल की रमणियाँ, महिलाएँ गाने-बजाने, सङ्गीत का आनन्द ले सकें और आमोद-प्रमोद में अपना रहन-सहन स्थिर कर सके। वितथे गिरिसंस्थाने रथरन्ध्राणि कारयेत्। गिरौ काष्ठाङ्गं चैव वितथे चाम्भसां गृहम् ॥ 20 ॥

सूत्र-७६ 439

वास्तुपद विन्यास के दक्षिण की ओर वितथ, गिरि पद भाग पर रथों (यानों के रखने के) रथखाना आदि बनाने चाहिए। गिरि के भाग में काष्ठगृह (काठ, ईंधन गोदाम, टाल, बाड़ा) बनाएँ, उसके पास के ही वितथ पदभाग में जल भण्डारण (पानी के हौज और सभी प्रकार के जल संग्रह के उपाय) की समुचित व्यवस्था का क्षेत्र बनाएँ अर्थात् जल विभाग के भवनों का निर्माण हो। सुग्रीवनन्दिसन्धौ च युद्धद्वारं पराङ्मुखम्। असुरशेषसन्धौ च द्वारमम्भोगृहैर्युतम् ॥ 21 ॥ वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के सुग्रीव व नन्दी के पद भाग के सन्धि-स्थल में पश्चिम दिशोन्मुख युद्धद्वार का निर्माण करना चाहिए। इसी तरह असुर व शोष पद भाग के सन्धि-स्थल में पश्चिम दिशा की ओर पानेरा रूपी जल गृहों युक्त द्वार का निर्माण करना चाहिए। सुग्रीवपुष्पदन्तयोर्वरुणासुरयोस्तथा। अश्वशाला द्वादशैव कर्तव्याश्च शुभोत्तमाः ॥ 22 ॥ इसी तरह सुग्रीव व पुष्पदन्त के सन्धि-स्थल पद पर तथा वरुण और असुर के सन्धि-स्थल पद पर बारहों प्रकार की अश्वशालाएँ अर्थात् घुड़साल बड़े ही सुन्दर ढंग की, व्यवस्थित बनानी चाहिए। अर्धे तवङ्गनिष्कास ? सैन्यविस्तरविस्तृतम्। प्राकारासमुत्सेधानि त्रिमाडानि तदूर्ध्वतः ॥ 23 ॥ जिनके आधे में तवङ्गों का निष्कास होना चाहिए जो सेना के विस्तार के अनुरूप ही विस्तार वाली हो अर्थात् सेना अश्वारोही सैनिकों की समस्त अश्व पूर्ति करने में समर्थ हो। उनके बाहर पर्या स ऊँचा परकोटा भी बनाना चाहिए, परकोटे पर ऊपर के भाग में तीन माड भी बनाए जाए। कार्यं दौवारिके भिट्टं गजस्कन्धसमोच्छ्रितम्। द्वाराग्रे तु भवेन्माडं मल्लैरग्रे तु युध्यते ॥ 24 ॥ उस परकोटे की भिट्ट पर हाथी के कन्धे के बराबर ऊँचाई वाले द्वारपालों की विशाल मूर्तियाँ भी बनानी चाहिए। दरवाजे के विशाल माड गृह भी बनाने चाहिए जिसके आगे अखाड़े में मल्ल-पहलवान लोग तरह तरह के मल्लयुद्ध का अभ्यास कर सकें। पूर्वापरद्वारद्वयं द्वात्रिंशत्₃₂ स्तम्भभूषितम्। तद्वृत्तमाडं वृत्तं तु पञ्चविंशतिभिः₂₅ करैः ॥ 25 ॥ पूर्व दिशा में और पश्चिम दिशा में ऐसे दो बड़े द्वार हों जिनमें प्रत्येक द्वार बत्तीस

440 अपराजितपृच्छा स्तम्भों से विभूषित हों और उनका वृत्त भी पच्चीस गज के विस्तार वाला होगा। स्तम्भे स्तम्भे पताका च द्विजालोककलोद्भवम्। रक्तपुष्पसमाकीर्णं द्वारिकं चतुरङ्गुलम्॥ २६॥ उन प्रत्येक स्तम्भ पर पताकाएँ फहराती हुई हो जो (द्विजालोक कलोद्भवं) चार अङ्गुल मोटे लाल पुष्पमालाओं से समाकीर्ण अर्थात् सजे-धजे दो-दो जालोक अर्थात् झरोखों पर उठी हुई शोभायमान होती है। खड्गविद्याविज्ञयुद्धं छुरिकायुद्धमुत्तमम्। तथैव मल्लयुद्धं च गात्रभङ्गैरनेकधा॥ २७॥ निरीक्ष्यते यतः सर्वं खड्गाद्यायोधनं तथा। एवं युद्धोद्भवा राजप्रासादे च महोत्सवाः॥ २८॥ इस प्रकार के द्वारगृहों वाले राजप्रासादों में खड्ग विद्याविज्ञ युद्ध अर्थात् तलवारों से लड़ने के पैंतरेबाज योद्धाओं के अभ्यास, छुरी से लड़ाई के विविध दाँव-पेंच के अभ्यास तथा पहलवानी के कुश्ती के अनेक प्रकार के गात्रभङ्ग अर्थात् दाँव-पेंच, पटकनी देने के तौर-तरीकों के जानकार यहाँ आकर खड्गादि युद्धकला के करतब देखने को आते रहते हैं और ऐसे युद्ध सम्बन्धी महोत्सव भी राजमहल के आङ्गन में समय-समय पर होते रहें। नियन्त्रितोभयद्वारं माडं रश्माक्ष्यमुन्नतम्। भिट्टे चापरद्वाराणि कार्याणि चासुरोन्मुखम्॥ २९॥ इन दोनों दरवाजों पर उन्नत ढंग की रस्सियों से नियन्त्रित ऊँचा माड बनाना चाहिए (सम्भवतया यह कनात युक्त तम्बू या छौलदारी की मजबूत रस्सियों वाली व्यवस्था दरवाजों के ऊपर समय-समय पर आवश्यकतानुसार बनाई जाने वाली अस्थायी माड़ के बारे में सङ्केत है)। भिट्ट के अन्य द्वारों को भी वास्तुपद विन्यास के अनुसार असुर पद भाग पर बनाने चाहिए। बाह्यदेवपङ्क्तिमध्ये राजवेश्मान्तमार्गतः। मुख्यभल्लाटसौम्येषु गजशालपङ्क्तिद्वयम्॥ ३०॥ राजमहलों के अन्त में बाहरी देवपङ्क्ति के मध्य के मार्ग पर वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के मुख्य, भल्लाट और सौम्य पद भाग तक उत्तर की दिशा में गजशालाओं की दो पङ्क्तियों को बनाना चाहिए। याम्योत्तरमुखं कार्यं प्रशस्तं सर्वकामदम्। सौम्यन्ते हस्तिनीवेश्म तद्द्वारमपरोन्मुखम्॥ ३१॥

सूत्र-७६ 441 बुधे यमे च गन्धर्वे तद्रूपा च द्वितीयका। शोषे क्षये च रोगे च कोष्ठागारं तथादिमम् ॥ ३२ ॥ जिनका मुख उत्तर-दक्षिण दिशाओं की ओर बनाना प्रशस्त कहा गया है, जो सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है और सौम्य वास्तु पद के अन्त में हस्तिनिवेश अर्थात् गजशाला (हाथी के ठाण) हो और उसके द्वार के परे दूसरी ओर दक्षिण दिशा के वास्तुपद विन्यास के बुध, यम और गन्धर्व पद भाग पर भी वैसा ही दूसरा द्वार भी उसी के अनुरूप बनाए और वास्तुपद विन्यास के शोष, पापयक्ष्मा और रोग के पद भाग पर बड़ा-सा कोठार बनाएँ जो आरम्भ से ही भरा-पूरा भण्डार गृह हो। पित्रिमृगभृङ्गेषु च कोष्ठागारं द्वितीयकम्। गोष्ठागारं कार्यमित्थं प्रोक्तं च विश्वकर्मणा ॥ ३३ ॥ इसी तरह से वास्तुपद विन्यास के दक्षिण-पश्चिम कोण में स्थित पितर, मृग, और भृङ्ग पद भाग पर भी दूसरा वैसा ही विशाल कोठार या भण्डारगृह बनाएँ। उसी के पास ऐसा ही गोठ (आमोद-प्रमोद हेतु गोष्ठागार) भी बनाया जाना चाहिए— ऐसा भगवान् विश्वकर्मा¹ ने कहा है। ईशादितिदितिषु च भाण्डागारमापार्धतः। पुष्पागारं सवित्रर्धे ह्याग्नौ भृत्यान्तरिक्षयोः ॥ ३४ ॥ तृणशाला प्रकर्तव्या प्रशस्ता शुभकर्मणा। पूर्वोक्त वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के उत्तर-पूर्वी कोण पर स्थित ईश, दिति और अदिति के पद भाग पर बड़ा भाण्डागार अर्थात् भण्डार बनाए जाए। उत्तर-पूर्व कोण पर आप के पद के आधे भाग पर पुष्पागार और दक्षिण-पूर्व के सवित्र-पद के आधे में, अग्नि, भृत्य और अन्तरिक्ष पद भाग पर तृणशाला बनाई जाए, जो सभी शुभ कार्यों में प्रशस्त कही गई है। पर्जन्ये चाधिकरणं राज्ञः कार्यं पराङ्मुखम् ॥ ३५ ॥ शुभा प्रतोली माहेन्द्रे जये श्रीकरणादिकम्। आदित्ये वप्रकरणं सम्मुखं श्रीकरादिषु ॥ ३६ ॥ धर्माधिकरणं सत्ये कर्तव्यं चापराङ्मुखम्। वास्तुपद विन्यास के पूर्व की ओर पर्जन्य के पद पर अधिकरण हो, राजा का कार्य पराङ्मुख होगा। माहेन्द्र पद पर सुन्दर प्रतोली होगी। जय के पदस्थान पर

  1. यहाँ ग्रन्थकार आद्य विश्वकर्मा के ग्रन्थ का स्मरण करता है। सम्भवतः यह ग्रन्थ विश्वकर्मप्रकाश हो अथवा विश्वकर्मीय शिल्पशास्त्र हो। समराङ्गण में भी राजनिवेश में ऐसा निर्देश आया है।

442 राजकार्य के लिए (श्रीकरणादिकं) कार्यालय भवन हो, वप्रकरण व सन्मुख सूर्य पद भाग पर कोषाधिकारी तथा सत्य पद भाग पर धर्माधिकारी का भवन भी दूसरी ओर मुख किए हुए बनाएँ अर्थात् सत्य पद भाग और श्री मन्दिर, परकोटे के साथ न्यायालय के भवन (धर्माधिकरण) बनाएँ जाएँ। कर्णोर्ध्वे भूमिश्चैव तदग्रार्धे चतुष्किका ॥ ३७॥ जयस्य बाह्यपक्षे तु कुर्यात् कारागृहं तथा। कात्यायनी च माहेन्द्रे प्रतोल्याः ¹पुरतबुधः ? ॥ ३८ ॥ इसके पास ही वास्तुपद विन्यास के कोने के आधे भाग में ऊँची भूमि पर चौकी बनाकर जय पद भाग के बाहर की ओर कारागृह भवनों का निर्माण कराएँ और पूर्व दिशा में (महेन्द्र पद ?) प्रतोली या पोल बनाएँ जिसके पास कात्यायनी देवी का मन्दिर भी बनाएँ- ऐसा विद्वानों का मत है। आदित्याग्रे च बाह्ये तु कुर्याद् द्वयकरणाद्यकम् ? । रूपकं दुःसाध्यकानां चतुष्कं तु राजादिकम् ? ॥ ३९ ॥ इसी प्रकार वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के सूर्य पद भाग के बाहर की ओर आगे दोनों कोनों पर दो लेखागार भवन (दस्तावेजों के लिखित प्रमाणीकरण हेतु बनाएँ अर्थात् आधुनिक पञ्ज्यक कार्यालय भवन की तरह के दो भवन बनाएँ) जिसके चौक में दुःसाध्य को अर्थात् गुण्डे-बदमाशों को राजादिकों अर्थात् राजकर्मचारियों, पुलिस विभाग के अधिकारियों द्वारा बन्दी बनाए और दण्डित करने की अवस्था में बेड़ी, हथकड़ी युक्त दशा में दिखाए जाएँ- ऐसी मूर्तियाँ बनाएँ। ऐसी मूर्तियों से रूपकों से दुःसाहसी गुण्डे बदमाशों में भय उत्पन्न हो सके और राजतन्त्र का दब-दबा प्रकट हो सके। मरीचिस्थ गर्भोत्तरे देवी राजकुलार्चिता। पृथ्वीयजाख्यः प्रासादस्तेजःप्रतापवर्धकः ॥ ४० ॥ वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के गर्भभाग अर्थात् ब्रह्म क्षेत्र के उत्तर-पूर्व (मरीचिस्थ) भाग में राजकुल की अर्चिता देवी की प्रतिमा स्थापित की जाए। उसका नाम पृथ्वीजय प्रासाद रखें जो राजा के प्रताप और तेज का वर्धक स्वरूप हो। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महाराजवेशाधिकारो नाम षट्सप्ततितमं सूत्रम्॥ ७६ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महाराज निवेश अधिकार नामक छिहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥

  1. 'पुरतबधुः ?' इति प्रकाशित पाठः।

सूत्र-७७ 443 सभाष्टकवेदीनिर्णयो नाम सप्तसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 77 ॥ विश्वकर्मोवाच – नन्दा-भद्रा-जया-पूर्णा-दिव्या-यक्षी च रत्नजा । उत्पला तदनुज्ञेया सभा अष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ 1 ॥¹ विश्वकर्मा बोले कि आठ सभाएँ होती हैं, जिनके नाम हैं— (1.) नन्दा, (2.) भद्रा, (3.) जया, (4.) पूर्णा, (5.) दिव्या, (6.) यक्षी, (7.) रत्नजा और (8.) उत्पला। सभा निर्माण प्रकारलक्षणञ्च – चतुरश्रीकृते क्षेत्रे द्विरष्टपदभाजिते । मध्यमपदचतुष्केण चतुष्कोऽलिन्दशेषतः ॥ 2 ॥ सभाओं के लिए किसी चौकोर क्षेत्र को सोलह भागों में विभाजित करें। मध्य के चार पदों की चौकड़ी के बाद शेष चार अलिन्द या चबूतरे हो जाते हैं। नन्दा नाम समाख्याता सर्वकामफलप्रदा । चतुष्के भद्रविस्तार एकोभागश्च निर्गमः ॥ 3 ॥ इनमें नन्दा नाम से विख्यात् सभा में चौकड़ी की दीवार का एक भाग निर्गम, द्वार युक्त होता है। यह सभी सर्वकाम फलप्रद करने वाली होती है। भद्रा त्वेवं समाख्याता तेजःप्रतापवर्धका । भद्रं भद्रं चतुष्के तु जया नित्यं जयावहा ॥ 4 ॥ इसी तरह भद्रा नाम की सभा भी तेज और प्रताप को बढ़ाने वाली होती है। उसके समान ही जया नामक सभा के भी प्रत्येक दीवार में निर्गम, द्वार होते हैं जो नित्य ही जय कराने वाले कहे गए हैं। अलिन्दैर्वेष्टितं सर्वं निर्यूहाच्छाद्यकं तथा । तथा पूर्णा भवत्येवं सर्व कल्याणकारिका ॥ 5 ॥ पूर्णा नामक सभा के सभी ओर के अलिन्दों, बरामदों में निर्व्यूह निकले होते हैं जिन पर छज्जे बने होते हैं। ऐसी सभा भी सर्व कल्याणकारक होती है। नवांशानुसारेण सुन्दरीशालाः – चतुरश्रं समं क्षेत्रं विभक्तं च नवांशकैः । केवला नवशालाश्च दिव्या नामापि सुन्दरी ॥ 6 ॥

  1. सभादि का वर्णन समराङ्गणसूत्रधार (अध्याय 27, 1) में भी आया है।

444 अपराजितपृच्छा (उक्त शालाओं के अतिरिक्त यदि) चौकोर क्षेत्र को नौ भागों में विभाजित किया जाए तो केवल नवशालाएँ बनती हैं। इसका नाम सुन्दरी दिव्या है। निष्कान्ता च चतुर्भद्रैर्यक्षी कार्या सुशोभना। भद्रे भद्रे दिशालानि सा मता रत्नसम्भवा ॥ 7 ॥ यक्षी सभा के चारों ओर की दीवारों में निकलने के लिए सुन्दर सुशोभन द्वार बनाने चाहिए। रत्नसम्भवा नामक सभा की प्रत्येक दीवार से सटी हुई दो शाला अर्थात् कमरे बने हुए होते हैं। तस्याश्च प्रत्येकशालं प्रतिभद्रविभूषितम्। उत्पला च समाख्याता महाराजेन्द्रवल्लभा ॥ 8 ॥ उत्पला नामकी सभा की भी प्रत्येक दीवार पर एक-एक शाला (प्रतिभद्र) से शोभा बढ़ाई जाती है, ऐसी सभा महाराजाओं को बड़ी प्रिय लगती है। लम्बिन्याख्यवितानानि विचित्राणि च मध्यतः। अनेकाकाररूपाश्च राजक्रीडोचिताः स्थिताः ॥ 9 ॥ इन सभाओं के ऊपर लम्बिनाख्य वितान अर्थात् झालरदार चन्दोवों से छतों की सजावट और बड़े ही विचित्र, विविध प्रकारों से सभा मध्य में की जाती है जिनमें अनेक तरह के रूपाकार जो राजक्रीड़ाओं से सम्बन्धित विषयाधारित होते हैं। शालभञ्ज्यादि प्रतिमा स्तम्भविमानसम्भवाः। मुक्तलूमच्छाद्योपरि घण्टाकूटैरलङ्कृताः ॥ 10 ॥ उन सभाओं के स्तम्भों पर शालभञ्जिका (शालद्रुम की शाखा तोड़ती युवती) की मूर्तियों से सजावट होती है। स्तम्भशीर्षों पर विमानों की रचना और छत से लटकती हुई मुक्तलूम अर्थात् मोतियों की मालाओं के लूम-लुम्बक लटकते हुए और घण्टा, घण्टियों के समूह से सजे हुए बनाए जाते हैं। दिव्यसौवर्णकलशैर्मत्तवारणसम्युताः । सुरसद्मोपमाश्चैव नृपसद्माग्रमण्डपाः ॥ 11 ॥ इति सभाष्टकम् ।

  1. समराङ्गणसूत्रधार में आठ सभाओं के नाम आए हैं किन्तु नामों में भेद है, भाविता, दक्षा, प्रवरा व विदुरा— ये चार अन्य नाम हैं और इनमें नन्दादि चार के लिए क्षेत्र को सोलह भागों में और भावितादि के लिए क्षेत्र को छह भागों में विभाजित कर कर्णभित्ति करने विभाजित करने का निर्देश है— नन्दा भद्रा जया पूर्णा सभा स्याद्भाविता तथा। दक्षा च प्रवरा तद्वद् विदुरा चाष्टमी मता ॥ चतुरश्रीकृते क्षेत्रे ततः षोढा विभाजिते। मध्ये पदचतुष्कं स्यात् सीमालिन्दस्तु भागिकः ॥ तद्वाह्योऽलिन्दकस्तद्वद् भवेत्

सूत्र-७७ 445 उन सभाओं के द्वारों पर चमकदार स्वर्ण के घड़े हुए कलशों से कुम्भों से सजे हुए मत्तवारण शोभायमान होते हैं जिससे ये राजमहलों के आगे बने मण्डप स्वर्ग के सुन्दर मण्डपों की समानता करते हुए उपमा लिए प्रतीति देते हैं। इत्यमनन्तर वेदीलक्षणं - तन्मध्ये याम्यभद्रे तु वेदी सिंहासनान्विता। श्रीधर्याद्या तथा चैव वैराजकुलसम्भवा ॥ 12 ॥ इन सभाओं के मध्य में दक्षिणी भद्र या दीवार से सटी हुई वेदी बनाई जाए जिस पर सिंहासन रखा हुआ हो। ये श्रीधरादि वैराज्यकुल से उत्पन्न होने वाली वेदियाँ कही जाती हैं। स्वस्तिका भद्रिका चैव श्रीधरी पद्मिनी तथा। चतुर्विधा भवेद् वेदी सर्वशान्तिकरी नृणाम् ॥ 13 ॥ वेदियाँ चार प्रकार की हैं- (1.) स्वस्तिका, (2.) भद्रिका, (3.) श्रीधरी और (4.) पद्मिनी। ये राजाओं को सभी प्रकार से सुख-शान्ति प्रदान करने वाली हैं। स्वस्तिका चतुरश्रा स्याद् भद्रिका भद्रसम्युता। श्रीधरी विंशतिकोणा प्रतिभद्रैर्विभूषिता ॥ 14 ॥ पद्मिनी वै पद्मदला ह्यष्टकोणैर्विभूषिता। इन वेदियों में स्वस्तिका वेदी चौकोर होती है; भद्रिका वेदी भद्रों सहित अर्थात् दीवारों वाली होती है; श्रीधरी वेदी बीस कोणों वाली होती है और उसका प्रत्येक भद्र या दीवार अलंकृत होती है। पद्मिनी वेदी पद्म-कमल की आठ पङ्खुड़ियों के आकार वाली अर्थात् आठ कोणों से अलंकृत होती है। वर्णानुसारेण वेदीप्रमाणमाह - विप्राणां सप्तहस्ता₇ च क्षत्रियाणां तु षट्करा₆ ॥ 15 ॥ ¹वैश्यानां पञ्चहस्ता₅ च शूद्राणां वेदहस्तिका₄। प्रतिसराभिधः। प्राग्ग्रीवाख्यस्तृतीयश्च बहिः क्षेत्राच्चतुर्दिशम्॥ निसृष्टसौर्ध(धे) यैर्वा स्यादेकस्यां वा यदा दिशि। नन्दा भद्रा जया पूर्णा क्रमेण स्युः सभास्तदा॥ षड्भागभाजिते क्षेत्रे कर्णीभित्तिं निवेशयेत्। सभा स्याद् भाविता नाम सप्राग्ग्रीवात्र पञ्चमी॥ स्तम्भान् षट्त्रिंशदेतासु पञ्चस्वपि निवेशयेत्। स्तम्भान् प्राग्ग्रीवसम्बद्धान पृथगेभ्यो विनिर्दिशेत्॥ दक्षेति षष्ठी परितस्तृतीयालिन्दवेष्टिता। प्रवरा सप्तमी द्वारैर्युक्तेषा परिकीर्तिता॥ प्राग्ग्रीवद्वारसंयुक्ता विदुरेत्यष्टमी सभा। सभानामिदमष्टानां लक्षणं समुदाहृतम्॥ इत्यष्टानां लक्ष्म सम्यक् सभानामेतत् प्रोक्तं दिग्भवालिन्दभेदात्। तद्वद् द्वारालिन्दसंयोगतश्च ज्ञातेऽत्र स्याद् भूभृतां स्थानयोगः॥ (समराङ्गण. 27, 1-9)

  1. विप्रेषु सप्तहस्ता च षड्हस्ता क्षत्रियेषु। पञ्चहस्ता भवेद्वैश्ये शूद्रे वेदाः प्रकीर्तिताः॥ इति पाठः।

त्रिहस्ता कर्षकाणां च प्रकृतेर्द्वयेकहस्तिका ॥ 16 ॥ विप्रों के लिए वेदी सात गज के प्रमाण वाली, क्षत्रियों के लिए छह गज, वैश्यों के लिए पाँच गज, शूद्रों के लिए चार गज और कृषकों के लिए तीन गज की हो किन्तु सामान्य जनों के लिए वेदी दो गज की कही जाती है। कार्यानुसारेण वेदीप्रयोगमाह — विवाहेषु च सर्वेषु स्वस्तिका सर्वकामदा। भद्रा भद्रा नरेन्द्राणां सर्वकल्याणकारिका ॥ 17 ॥ देवतास्थापने चैव स्वस्तिका भद्रा श्रीधरी। देवानां च प्रतिष्ठादौ पूजायां चैव पद्मिनी ॥ 18 ॥ सभी प्रकार के वैवाहिक और माङ्गलिक कार्यों के लिए स्वस्तिका वेदी समस्त कामनाओं को पूरी करने वाली कही गई है। भद्रा वेदी राजाओं के लिए सर्वप्रकारेण कल्याणकारक है। देवी-देवताओं के स्थापना कार्य में स्वस्तिका, भद्रा, श्रीधरी वेदी उचित रहती है और देवताओं की प्रतिष्ठादि या पूजा का कार्य हो तो पद्मिनी वेदी उचित ही मानी गई है।¹ सिंहासनं तदूर्ध्वे च भद्रासनमथापि वा। पट्टप्रस्तारिका चैवं गदिकाद्यं तथोत्तरे ॥ 19 ॥ प्रयोजन के अवसर पर वेदिका के ऊपर सिंहासन अथवा भद्रासन लगाया जाए जिस पर महीन चद्दर से ढकी हुई गद्दी उत्तर मुखी लगी हो। अन्यदप्याह — चतुःस्तम्भसमायुक्तं छाद्यत्रयविभूषितम्। ऊर्ध्वे च घण्टाकलशं मत्तवारणशोभितम् ॥ 20 ॥ वेदी के चारों ओर चार स्तम्भों से युक्त तीन चन्दोवे तने हुए हों जिन पर घण्टा, कलश युक्त मत्तवारणों की शोभा होनी चाहिए।

  1. सिद्धान्तशेखर में आया है कि वेदियाँ चतुरस्र, पद्मिनी, श्रीधरी व सर्वतोभद्रा होती हैं। दीक्षा, स्थापनादि अवसरों पर चतुरस्रा का प्रयोग सर्वफलप्रद होता है। तड़ागादि की प्रतिष्ठा के अवसर पर पद्म के आकार वाली पद्मिनी का प्रयोग होगा। राज्याभिषेक के अवसर पर चतुर्भद्रा का प्रयोग होगा, विवाह में श्रीधरी का प्रयोग होगा जो कि बीस कोष वाली, दर्पणोदर जैसी समस्तरीयता लिए होंगी : वेदी चतुर्विधा प्रोक्ता चतरस्रा च पद्मिनी। श्रीधरी सर्वतोभद्रा दीक्षासु स्थापनादिषु ॥ चतुरस्रा चतुःकोणा वेदी सर्वफलप्रदा। तड़ागादिप्रतिष्ठायां पद्मिनी पद्मसंन्निभा॥ राज्ञां स्यात्सर्वतोभद्रा चतुर्भद्राभिषेचने। विवाहे श्रीधरी वेदी विंशत्यस्रसमन्विता॥ दर्पणोदरसङ्काशा निष्प्रोन्नत विवर्जिता। (कुण्डरत्नावली : सम्पादक- मिताली देव, वाराणसी, 2003 ई. पृष्ठ 19)

सूत्र-७८ 447 शुक्लपट्टैश्च शोभाढ्यं पुष्परागविभूषितम् । इन्द्रनीलसमं कान्त्या हेमरत्नैश्च शोभितम् ॥ 21 ॥ ऐसी वेदी के ऊपर राजा का आसन लगाया जाए जो स्वच्छ, श्वेत, रेशमी चद्दरों से ढका हुआ हो और उस पर पुष्पों की सुगन्ध वाला इत्रादि छिड़का हो। उसकी कान्ति इन्द्रनील के समान और स्वर्ण व रत्नों के जड़ाव का अलंकरण होना चाहिए। मुक्ताफलैरनेकश्च सूर्यकान्तिमनोरमैः । एवं पुष्पकमाडं च वेद्यूर्ध्वं च नृपासनम् ॥ 22 ॥ इसी प्रकार उन पर अनेकों मोतियों की मनोरम मालाएँ सूर्य की प्रभा विस्फारित करती प्रतीत होनी चाहिए, ऐसा पुष्पक माड नामक वेदी के ऊपर नृप के बैठने का स्थान होता है। उत्तराभिमुखं कृत्वा याम्यायां स्थापयेद्दिशि । तथाग्रे च समस्ताश्च भक्ता ये स्वामिनः स्थले ॥ 23 ॥ यह आसन उत्तर दिशा की ओर मुख वाला और दक्षिण दिशा की ओर स्थापित होता है और इस वेदिका के आसन के आगे राजा के समस्त भक्त-सेवक अपने स्वामी के स्थल पर सामने ही विराजित होंगे। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सभाष्टकवेदीनिर्णयाधिकारो नाम सप्तसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 77 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सभा अष्टक वेदी निर्णय अधिकार नामक सतत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 77 ॥ महाराजाधिकाराजो नामाष्टसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 78 ॥ विश्वकर्मोवाच – सभामध्ये तथा वेदी तत ऊर्ध्वे सिंहासनम्। पौती¹ पुष्पजाड्यकुम्भं सिंहवक्त्रं कनालिकम् ॥ 1 ॥

  1. 'पौती ?' इति प्रकाशित पाठः। पोतिका स्तम्भाङ्ग के रूप में स्वीकृत है। मयमतं, मनुष्यालयचन्द्रिका इत्यादि में बोधिका या पौती जैसे पर्याय इसी सन्दर्भ में आए हैं। पोतिका के विषय में ईशानशिवगुरुदेवपद्धति और वास्तुविद्या प्रभृति ग्रन्थों में विस्तृत उल्लेख पाया जाता है। ईशानशिवगुरुदेवपद्धति में स्तम्भ पर स्थापित की जाने वाली पोतिका के लक्षण बताते हुए कहा गया है कि स्तम्भ के विस्तार से तीन, चार या पाँच गुणा मान प्रमाण वाली पोतिका क्रमशः नीच, मध्यम और उत्तम नाम से जानी जाती है। ये क्रमशः नागवृत्ता, पत्रचित्रा और समुद्रोर्मि संज्ञक होती हैं- तदूर्ध्वं पोतिका स्थाप्या तस्या लक्षणमुच्यते। सा च स्यात्

448 अपराजितपृच्छा विश्वकर्मा आगे बोले कि सभा के मध्य में वेदी हो, उस वेदी पर सिंहासन हो और जो कि पोतिका, पुष्प और जाड्यकुम्भ, सिंहमुख और लड़ियों से अलंकृत हो। गजाश्वनरपीठाढ्यं सिंहव्याघ्रैरलंकृतम्। अनेकसिंहरूपैश्च क्रमतो विकृतानना ॥ २ ॥ इस जाड्यकुम्भ के ऊपर के भद्रभाग पर प्रासाद मण्डोवर के अलंकरण की भाँति ही विविध स्तरों पर गजथर, अश्वथर, नरथर, सिंहथर, व्यालथर (रासमुख) अनेक सिंहों के रूप में विकृत भयङ्कर मुखाकृतियों में बने अलंकरण हों। सिंहासने महाराजः शोभते मणिदीप्तिभिः । यथा शक्रः सुरैर्युक्तो बालार्ककिरणोदिती ॥ ३ ॥ ऐसे सिंहासन पर महाराज एक प्रकार से अपनी मणिदीप्ति से ऐसे प्रभविष्णुमयता के विराजित हों, मानों स्वयं इन्द्र अपने देवगणों के मध्य में उदित होते हुए सूर्य की लालिमायुक्त किरणों से प्रकाशित हो रहे हों। चक्रवर्त्यादीनां नृपकोटयः — चक्रवर्त्यर्धपतिश्च भूरिभक्त्या महीपतिः । एते वै तु महाराजा शेषाश्च मण्डलेश्वराः ॥ ४ ॥ स्तम्भविस्तारात् त्रिगुणं वा चतुर्गुणम्॥ दीर्घा पञ्चगुणं वापि नीचमध्योत्तमा स्मृता। नागवृत्ता पत्रचित्रा समुद्रोर्मिश्च पोतिकाः॥ त्रिविधा नामभिर्ज्ञेयास्तासां लक्षणमुच्यते। स्तम्भव्याससमोत्सेधविस्तारा श्रेष्ठपोतिका॥ शरांशोना मध्यमा स्याद्गनद्व्यंशा कनिष्ठिका। भूतेभमकरव्यालरत्नस्रग्विचित्रिता ॥ वल्लीचित्राग्रपट्टा च सा ख्याता चित्रपोतिका। केवलं पत्रवल्लीभिर्विचित्रा पत्रपोतिका ॥ तरङ्गमात्रचित्रा या पोतिका स्यात् तरङ्गिणी। तरङ्गाश्चात्र वेदर्तुव(स्वा? स्वङ्का) शादिसंख्यया॥ कार्यास्तृभयतस्तुल्याः , पट्टिकाछात्रमध्यगाः। त्रिभागे पोतिकोत्सेधे सार्द्धांशेनाग्रपट्टकम् ॥ तदर्धार्धेन तदधः क्षेपच्छायान्वितं भवेत्। तदुच्छ्रार्धात् त्रिभिर्वांशैरंशाभ्यां वात्र कल्पयेत् । स्वव्यासाधत् त्रिपादाद् वा कुर्यात् तास्वग्रमण्डनम् ॥ 'वास्तुविद्या' में इसका नाम 'बोधिका' है। पोतिका अपने न्यूनाधिक विस्तार के अनुसार तीन नामों वाली होती है। ये भित्ति के स्तम्भाग्र के आधार पर दण्डसंज्ञक, स्तम्भाग्र विस्तार के अनुसार उशन्तिदण्ड और चरणाग्रप्रतान से दण्ड नाम वाली हो जाती है। ग्रन्थान्तर में भी कहा गया है। प्रतिलोम क्रम से इनके नाम होते हैं— अधम प्रकार की त्रिदण्ड पोतिका पत्री कही जाती है। मध्यम प्रकार की चतुर्दण्ड पोतिका चित्री नामक और उत्तम प्रकार की पञ्चदण्ड पोतिका महार्णवी संज्ञक होती है— पोतिका तु त्रिधा ज्ञेया नामभेदेन दैर्ध्यतः। त्रिदण्डा च चतुर्दण्डा पञ्चदण्डा यथाक्रमम्॥ महार्णवी च चित्री च पत्री च प्रतिलोमतः। (वास्तुविद्या : सम्पादक - श्रीकृष्ण 'जुगनू', 8, 44-45) पोतिकेत्यादि । 'बोधिके'ति क्वचित् पाठः । नामभेदेन दैर्ध्यत इति। दैर्ध्यस्य न्यूनत्वाधिकत्वाभ्यां कृतेन नामभेदेनेत्यर्थः । तादृशं दैर्घ्यमेवाह- त्रिदण्डेनेत्यादि। इह दण्डप्रमाणं तु 'कुड्यस्तम्भाग्रतारोऽप्यथ तदवयवाकल्पने दण्डसंज्ञः', 'स्तम्भाग्र- विस्तारमृशन्ति दण्डम्', 'चरणाग्रप्रतानो दण्डः' इत्यादि ग्रन्थान्तरोक्तं ग्राह्यम् । त्रिदण्डादीनां संज्ञा आह— महार्णवीत्यादि । प्रतिलोमत इति । प्रतिलोमक्रममनुसृत्येत्यर्थः । तथाच त्रिदण्डा पोतिका पत्री नामधमा। चतुर्दण्डा पोतिका चित्री नाम मध्यमा। पञ्चदण्डा पोतिका महार्णवी नाम उत्तमेति सिद्धम्। (तत्रैव विवृत्ति)

सूत्र-७८ 449 महाराज का विरुद धारण करने वाले राजाओं में चक्रवर्ती अधिपति, भूमि के तीनों भागों को धारण करने वाले (षष्ठांश प्राप्तकर्ता) महीपति कहलाने के अधिकारी हैं। इनसे अतिरिक्त जो शेष भूपाल हैं, मण्डलेश्वर पद के अधिकारी हैं। मण्डलीकोऽधिसामन्तः सामन्तो लघुसञ्ज्ञकः। चतुरंशिकाऽल्पराजाः शेषास्तु राजपुत्रकाः ॥ ५ ॥ इनके नीचे मण्डलीक, उनसे नीचे के सामन्त तथा उनसे नीचे के भी लघु सामन्त कहलाते हैं और चतुर्थ अंश भाग के अधिकारी को अल्पराजा और इनके बाद शेष बचे सभी को केवल राजपुत्रक कहा गया है। स्वके स्वभुक्तानुसारे राज्यं कुर्वन्ति स्वेच्छया। अनेकभोगभोक्तारो राजक्रीडामनेकधा ॥ ६ ॥ ये सभी अपने-अपने प्राप्त भाग के प्रदेश पर अपनी इच्छा के अनुसार राज्य करते हैं और अनेक प्रकार के भोग-आनन्द को भोगते हैं तथा नाना प्रकारेण राजक्रीड़ाओं की मौज-मस्ती मनाते हैं। तपसाराधितः पूर्वं महात्मभिरुमापतिः। तपसोऽर्थानुरूपैश्च राज्यं कुर्वन्ति भूतले ॥ ७ ॥ इन सभी भाग्यवान् महीपतियों ने अपने पूर्व जन्म में तपस्या से उमापति महादेव की जो आराधना का पुण्य अर्जित किया था, उसी के अनुरूप उनको इस जन्म में यह सौभाग्य मिला और वे इस भूतल पर आज राज कर रहे हैं। देवपूजार्चनं दानं पूज्यषड्दर्शनादिकम्। पुराणागमग्रन्थादि राजनीतिरनेकधा ॥ ८ ॥ ऐसे सौभाग्य के लिए अनेक प्रकार की देवपूजा, अर्चन, अनेक प्रकार के दान-पुण्य करने के अवसर, अनेक साधनाओं, षड्दर्शनादि के विधि-विधान, अनेक पुराण और आगम शास्त्र-ग्रन्थादि और अनेक राजनीतिक व्यवस्थाएँ पाई जाती हैं। राज्योत्पतिमाह - पञ्चमातृद्भवं राज्यं नैककलादिकौशलम्। मातु ( ? ) रैकैकोक्तगुणा नटेश्वरसमुद्भवाः ॥ ९ ॥ राज्य की सामान्यतया उत्पत्ति पाँच मातृकाओं से हुई है और उन्हीं से अनेक कला-कौशलों की भी रचना हुई है। ये माताएँ भी अपने एक-एक गुणों के साथ भगवान् शिव-नटेश्वर से समुद्भूत हुई हैं।