भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-७७ 445 उन सभाओं के द्वारों पर चमकदार स्वर्ण के घड़े हुए कलशों से कुम्भों से सजे हुए मत्तवारण शोभायमान होते हैं जिससे ये राजमहलों के आगे बने मण्डप स्वर्ग के सुन्दर मण्डपों की समानता करते हुए उपमा लिए प्रतीति देते हैं। इत्यमनन्तर वेदीलक्षणं - तन्मध्ये याम्यभद्रे तु वेदी सिंहासनान्विता। श्रीधर्याद्या तथा चैव वैराजकुलसम्भवा ॥ 12 ॥ इन सभाओं के मध्य में दक्षिणी भद्र या दीवार से सटी हुई वेदी बनाई जाए जिस पर सिंहासन रखा हुआ हो। ये श्रीधरादि वैराज्यकुल से उत्पन्न होने वाली वेदियाँ कही जाती हैं। स्वस्तिका भद्रिका चैव श्रीधरी पद्मिनी तथा। चतुर्विधा भवेद् वेदी सर्वशान्तिकरी नृणाम् ॥ 13 ॥ वेदियाँ चार प्रकार की हैं- (1.) स्वस्तिका, (2.) भद्रिका, (3.) श्रीधरी और (4.) पद्मिनी। ये राजाओं को सभी प्रकार से सुख-शान्ति प्रदान करने वाली हैं। स्वस्तिका चतुरश्रा स्याद् भद्रिका भद्रसम्युता। श्रीधरी विंशतिकोणा प्रतिभद्रैर्विभूषिता ॥ 14 ॥ पद्मिनी वै पद्मदला ह्यष्टकोणैर्विभूषिता। इन वेदियों में स्वस्तिका वेदी चौकोर होती है; भद्रिका वेदी भद्रों सहित अर्थात् दीवारों वाली होती है; श्रीधरी वेदी बीस कोणों वाली होती है और उसका प्रत्येक भद्र या दीवार अलंकृत होती है। पद्मिनी वेदी पद्म-कमल की आठ पङ्खुड़ियों के आकार वाली अर्थात् आठ कोणों से अलंकृत होती है। वर्णानुसारेण वेदीप्रमाणमाह - विप्राणां सप्तहस्ता₇ च क्षत्रियाणां तु षट्करा₆ ॥ 15 ॥ ¹वैश्यानां पञ्चहस्ता₅ च शूद्राणां वेदहस्तिका₄। प्रतिसराभिधः। प्राग्ग्रीवाख्यस्तृतीयश्च बहिः क्षेत्राच्चतुर्दिशम्॥ निसृष्टसौर्ध(धे) यैर्वा स्यादेकस्यां वा यदा दिशि। नन्दा भद्रा जया पूर्णा क्रमेण स्युः सभास्तदा॥ षड्भागभाजिते क्षेत्रे कर्णीभित्तिं निवेशयेत्। सभा स्याद् भाविता नाम सप्राग्ग्रीवात्र पञ्चमी॥ स्तम्भान् षट्त्रिंशदेतासु पञ्चस्वपि निवेशयेत्। स्तम्भान् प्राग्ग्रीवसम्बद्धान पृथगेभ्यो विनिर्दिशेत्॥ दक्षेति षष्ठी परितस्तृतीयालिन्दवेष्टिता। प्रवरा सप्तमी द्वारैर्युक्तेषा परिकीर्तिता॥ प्राग्ग्रीवद्वारसंयुक्ता विदुरेत्यष्टमी सभा। सभानामिदमष्टानां लक्षणं समुदाहृतम्॥ इत्यष्टानां लक्ष्म सम्यक् सभानामेतत् प्रोक्तं दिग्भवालिन्दभेदात्। तद्वद् द्वारालिन्दसंयोगतश्च ज्ञातेऽत्र स्याद् भूभृतां स्थानयोगः॥ (समराङ्गण. 27, 1-9)

  1. विप्रेषु सप्तहस्ता च षड्हस्ता क्षत्रियेषु। पञ्चहस्ता भवेद्वैश्ये शूद्रे वेदाः प्रकीर्तिताः॥ इति पाठः।