अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें444 अपराजितपृच्छा (उक्त शालाओं के अतिरिक्त यदि) चौकोर क्षेत्र को नौ भागों में विभाजित किया जाए तो केवल नवशालाएँ बनती हैं। इसका नाम सुन्दरी दिव्या है। निष्कान्ता च चतुर्भद्रैर्यक्षी कार्या सुशोभना। भद्रे भद्रे दिशालानि सा मता रत्नसम्भवा ॥ 7 ॥ यक्षी सभा के चारों ओर की दीवारों में निकलने के लिए सुन्दर सुशोभन द्वार बनाने चाहिए। रत्नसम्भवा नामक सभा की प्रत्येक दीवार से सटी हुई दो शाला अर्थात् कमरे बने हुए होते हैं। तस्याश्च प्रत्येकशालं प्रतिभद्रविभूषितम्। उत्पला च समाख्याता महाराजेन्द्रवल्लभा ॥ 8 ॥ उत्पला नामकी सभा की भी प्रत्येक दीवार पर एक-एक शाला (प्रतिभद्र) से शोभा बढ़ाई जाती है, ऐसी सभा महाराजाओं को बड़ी प्रिय लगती है। लम्बिन्याख्यवितानानि विचित्राणि च मध्यतः। अनेकाकाररूपाश्च राजक्रीडोचिताः स्थिताः ॥ 9 ॥ इन सभाओं के ऊपर लम्बिनाख्य वितान अर्थात् झालरदार चन्दोवों से छतों की सजावट और बड़े ही विचित्र, विविध प्रकारों से सभा मध्य में की जाती है जिनमें अनेक तरह के रूपाकार जो राजक्रीड़ाओं से सम्बन्धित विषयाधारित होते हैं। शालभञ्ज्यादि प्रतिमा स्तम्भविमानसम्भवाः। मुक्तलूमच्छाद्योपरि घण्टाकूटैरलङ्कृताः ॥ 10 ॥ उन सभाओं के स्तम्भों पर शालभञ्जिका (शालद्रुम की शाखा तोड़ती युवती) की मूर्तियों से सजावट होती है। स्तम्भशीर्षों पर विमानों की रचना और छत से लटकती हुई मुक्तलूम अर्थात् मोतियों की मालाओं के लूम-लुम्बक लटकते हुए और घण्टा, घण्टियों के समूह से सजे हुए बनाए जाते हैं। दिव्यसौवर्णकलशैर्मत्तवारणसम्युताः । सुरसद्मोपमाश्चैव नृपसद्माग्रमण्डपाः ॥ 11 ॥ इति सभाष्टकम् ।
- समराङ्गणसूत्रधार में आठ सभाओं के नाम आए हैं किन्तु नामों में भेद है, भाविता, दक्षा, प्रवरा व विदुरा— ये चार अन्य नाम हैं और इनमें नन्दादि चार के लिए क्षेत्र को सोलह भागों में और भावितादि के लिए क्षेत्र को छह भागों में विभाजित कर कर्णभित्ति करने विभाजित करने का निर्देश है— नन्दा भद्रा जया पूर्णा सभा स्याद्भाविता तथा। दक्षा च प्रवरा तद्वद् विदुरा चाष्टमी मता ॥ चतुरश्रीकृते क्षेत्रे ततः षोढा विभाजिते। मध्ये पदचतुष्कं स्यात् सीमालिन्दस्तु भागिकः ॥ तद्वाह्योऽलिन्दकस्तद्वद् भवेत्