भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 535 में से

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पृष्ठ 488

सूत्र-७७ 443 सभाष्टकवेदीनिर्णयो नाम सप्तसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 77 ॥ विश्वकर्मोवाच – नन्दा-भद्रा-जया-पूर्णा-दिव्या-यक्षी च रत्नजा । उत्पला तदनुज्ञेया सभा अष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ 1 ॥¹ विश्वकर्मा बोले कि आठ सभाएँ होती हैं, जिनके नाम हैं— (1.) नन्दा, (2.) भद्रा, (3.) जया, (4.) पूर्णा, (5.) दिव्या, (6.) यक्षी, (7.) रत्नजा और (8.) उत्पला। सभा निर्माण प्रकारलक्षणञ्च – चतुरश्रीकृते क्षेत्रे द्विरष्टपदभाजिते । मध्यमपदचतुष्केण चतुष्कोऽलिन्दशेषतः ॥ 2 ॥ सभाओं के लिए किसी चौकोर क्षेत्र को सोलह भागों में विभाजित करें। मध्य के चार पदों की चौकड़ी के बाद शेष चार अलिन्द या चबूतरे हो जाते हैं। नन्दा नाम समाख्याता सर्वकामफलप्रदा । चतुष्के भद्रविस्तार एकोभागश्च निर्गमः ॥ 3 ॥ इनमें नन्दा नाम से विख्यात् सभा में चौकड़ी की दीवार का एक भाग निर्गम, द्वार युक्त होता है। यह सभी सर्वकाम फलप्रद करने वाली होती है। भद्रा त्वेवं समाख्याता तेजःप्रतापवर्धका । भद्रं भद्रं चतुष्के तु जया नित्यं जयावहा ॥ 4 ॥ इसी तरह भद्रा नाम की सभा भी तेज और प्रताप को बढ़ाने वाली होती है। उसके समान ही जया नामक सभा के भी प्रत्येक दीवार में निर्गम, द्वार होते हैं जो नित्य ही जय कराने वाले कहे गए हैं। अलिन्दैर्वेष्टितं सर्वं निर्यूहाच्छाद्यकं तथा । तथा पूर्णा भवत्येवं सर्व कल्याणकारिका ॥ 5 ॥ पूर्णा नामक सभा के सभी ओर के अलिन्दों, बरामदों में निर्व्यूह निकले होते हैं जिन पर छज्जे बने होते हैं। ऐसी सभा भी सर्व कल्याणकारक होती है। नवांशानुसारेण सुन्दरीशालाः – चतुरश्रं समं क्षेत्रं विभक्तं च नवांशकैः । केवला नवशालाश्च दिव्या नामापि सुन्दरी ॥ 6 ॥

  1. सभादि का वर्णन समराङ्गणसूत्रधार (अध्याय 27, 1) में भी आया है।
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