अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें442 राजकार्य के लिए (श्रीकरणादिकं) कार्यालय भवन हो, वप्रकरण व सन्मुख सूर्य पद भाग पर कोषाधिकारी तथा सत्य पद भाग पर धर्माधिकारी का भवन भी दूसरी ओर मुख किए हुए बनाएँ अर्थात् सत्य पद भाग और श्री मन्दिर, परकोटे के साथ न्यायालय के भवन (धर्माधिकरण) बनाएँ जाएँ। कर्णोर्ध्वे भूमिश्चैव तदग्रार्धे चतुष्किका ॥ ३७॥ जयस्य बाह्यपक्षे तु कुर्यात् कारागृहं तथा। कात्यायनी च माहेन्द्रे प्रतोल्याः ¹पुरतबुधः ? ॥ ३८ ॥ इसके पास ही वास्तुपद विन्यास के कोने के आधे भाग में ऊँची भूमि पर चौकी बनाकर जय पद भाग के बाहर की ओर कारागृह भवनों का निर्माण कराएँ और पूर्व दिशा में (महेन्द्र पद ?) प्रतोली या पोल बनाएँ जिसके पास कात्यायनी देवी का मन्दिर भी बनाएँ- ऐसा विद्वानों का मत है। आदित्याग्रे च बाह्ये तु कुर्याद् द्वयकरणाद्यकम् ? । रूपकं दुःसाध्यकानां चतुष्कं तु राजादिकम् ? ॥ ३९ ॥ इसी प्रकार वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के सूर्य पद भाग के बाहर की ओर आगे दोनों कोनों पर दो लेखागार भवन (दस्तावेजों के लिखित प्रमाणीकरण हेतु बनाएँ अर्थात् आधुनिक पञ्ज्यक कार्यालय भवन की तरह के दो भवन बनाएँ) जिसके चौक में दुःसाध्य को अर्थात् गुण्डे-बदमाशों को राजादिकों अर्थात् राजकर्मचारियों, पुलिस विभाग के अधिकारियों द्वारा बन्दी बनाए और दण्डित करने की अवस्था में बेड़ी, हथकड़ी युक्त दशा में दिखाए जाएँ- ऐसी मूर्तियाँ बनाएँ। ऐसी मूर्तियों से रूपकों से दुःसाहसी गुण्डे बदमाशों में भय उत्पन्न हो सके और राजतन्त्र का दब-दबा प्रकट हो सके। मरीचिस्थ गर्भोत्तरे देवी राजकुलार्चिता। पृथ्वीयजाख्यः प्रासादस्तेजःप्रतापवर्धकः ॥ ४० ॥ वास्तुपद विन्यास क्षेत्र के गर्भभाग अर्थात् ब्रह्म क्षेत्र के उत्तर-पूर्व (मरीचिस्थ) भाग में राजकुल की अर्चिता देवी की प्रतिमा स्थापित की जाए। उसका नाम पृथ्वीजय प्रासाद रखें जो राजा के प्रताप और तेज का वर्धक स्वरूप हो। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महाराजवेशाधिकारो नाम षट्सप्ततितमं सूत्रम्॥ ७६ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महाराज निवेश अधिकार नामक छिहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥
- 'पुरतबधुः ?' इति प्रकाशित पाठः।